अनमोल वचन

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Updated: 47 min 9 sec ago

सत्‍य का आचरण

14 May, 2017 - 07:40

एक दिन मैं खेल रहा था। मेरी आयु चार पाँच साल कि रही होगी, उससे अधिक नहीं। जिस समय किसी ने दरवाजे पर दस्‍तक दी, उस समय मेरे पिता अपनी दाढ़ी बना रहे थे। मेरे पिता ने मुझसे कहा, जरा चले जाओ और उनसे कह दो, ‘मेरे पिता जी धर पर नहीं है।’
      मैं बहार चला गया और मैंने कहा: ‘मेरे पिता दाढ़ी बना रहे है और वे आपको बताने के लिए कह रहें है कि मेरे पिता घर पर नहीं है।‘
      उस व्‍यक्ति ने कहा: ‘क्‍या? वे भीतर है।’
      मैंने कहा: ‘हां लेकिन जो उन्‍होंने मुझसे कहा वह यही है। मैंने आपको पूरा सत्‍य बता दिया है।’
      वह व्‍यक्ति‍ भीतर आया और मरे पिता ने मेरी और देखा, क्‍या हो गया, और वह व्‍यक्ति बहुत क्रोधित हो गया था, उसने कहा: ‘जरूर कोर्इ बात है, आपने मुझको इस समय घर आने को कहा था, और आपने इस लड़के के द्वारा मुझे खबर भेज दी कि आप बाहर चले गए है।’   
      मेरे पिता ने उससे पूछा, लेकिन आप को किस तरह पता चला कि मैं घर के भीतर हूं।
      उसने कहा: ‘इस लड़के ने मुझको पूरी बात बता दी है कि मेरे पिता भीतर है। वे अपनी दाढ़ी बना रहे है और उन्‍होंने मुझको आपसे यह बताने के लिए कहा है कि वे बाहर गए हुए है।’
      मेरे पिता ने मेरी और देखा। मैं समझ गया कि वह कह रहे हैं, जरा प्रतीक्षा करो, इन सज्‍जन को जाने दो और मैं तुम्‍हें बताऊंगा।‘
      और मैंने उनसे कहा: ‘इससे पूर्व कि ये सज्‍जन जाएं मैं जा रहा हूं।’
      उन्‍होंने कहा: ’लेकिन मैंने तो तुमसे कुछ नहीं कहा।‘
      मैंने कहा: ‘लेकिन मैं सब समझ गया हूं।’
      मैंने उन सज्‍जन से कहा: ‘जरा यहीं रुकिए, पहले मुझको बाहर निकलने दीजिए, क्‍योंकि मेरे लिए परेशानी खड़ी होने वाली है। लेकिन जाते समय मैंने अपने पिता से कहा: आप मुझको सिखाते है, सत्‍य का आचरण करो......लेकिन, ‘मैंने कहा, यह सत्‍य का आचरण का अवसर है और यह इस बात की जांच का भी एक मौका है क्‍या आपका वास्‍तव में यही अभि‍प्राय है कि मैं सत्‍य का आचरण करुँ या आप मुझकेा चालाकी सिखाने की कोशिश कर रहे है? ’
            निस्‍संदेह वे समझ गए कि उस समय चुप रहना ही बेहतर था, तब‍ उन सज्‍जन के सामने मुझसे झगड़ना ठीक नहीं है। क्‍योंकि जब वे सज्‍जन विदा हो जाएंगे मुझको लौट कर घर आना ही पड़ेगा। मैं दो तीन घंटे बाद लौट कर आया, जिससे कि वे शांत हो चुके हों या वहां पर और लेाग भी  रहे। ओरा कोई समस्‍या न खड़ी हो। वे अकेले थे। मैं भीतर गया और उन्‍होंने कहा: ’चिंता मत करो, मैं अब कभी तुमसे उस तरह की बात नहीं कहूंगा। तुमको मुझे क्षमा करना ही पड़ेगा। इस प्रकार से वे एक श्रेष्‍ठ व्‍यकित थे। वरना चार या पाँच वर्ष के बच्‍चे की चिंता कौन करता है।’
      और अपने पूरे जीवन में उन्‍होंने इस तरह की कोई बात नहीं कही। वे जानते थे कि मेरे प्रति दूसरे बच्‍चों से भिन्‍न होना पड़ेगा।
 

एक बार मेरे पिता ने

14 May, 2017 - 06:05

एक बार मेरे पिता ने मेरी सभी सलवारें और मेरे कुर्ते और मेरी तीनों तुर्की टोपियों एक पोटली में बाँध कर घर के तहखाने में ऐसे स्‍थान पर रख दीं जहां अनेक प्रकार की बेकार टूटी-फूटी चीजें पड़ी हुई थी। मुझे पहनने के लिए उनमें से कुछ नहीं मिला, इसलिए जब मैं स्‍नानगृह से बहार आया तो अपनी आंखें बंद करके नग्नावस्था में दुकान में पहुंच गया। जैसे ही मैं बाहर निकल रहा था, मेरे पिता ने कहा: ‘ठहरो, जरा भीतर तो आओ, अपने वस्‍त्र लिए जाओ।’
      मैंने कहा: ‘वे जहां कहीं भी हैं आप उनको लेकर आइए।’
      उन्‍होंने कहा: ‘मैंने कभी न सोचा था कि तुम ऐसा करोगे। मैंने सोचा कि तुम चारों और देखोगे और कपड़ों की खोज करोगे, और जब वे तुम्‍हें नहीं मिलेंगे—क्‍योंकि मैंने उनको ऐसे स्‍थान पर रख दिया है कि तुम्‍हें वह नहीं मिल पाते, तब स्‍वभावत: तुम उन सामान्‍य से वस्‍त्रों को पहन लोगे जो तुम्‍हें पहनना चाहिए। मैंने कभी नहीं सोचा तुम ऐसा कर ड़ालोगे।’
      मैंने कहा: ‘मैं सीधे ही कर डालता हूं, मैं अनावश्‍यक वार्ता में भरोसा नहीं करता; मैं किसी से पूछता भी नहीं कि मेरे वस्‍त्र कहां रखे है। मुझे क्‍यों पूछना चाहिए? मेरी नग्‍नता यही उद्देश्‍य पूरा कर देगी।’
      उन्‍होंने कहा: ‘ये लो अपने वस्‍त्र और अब तुम्‍हारे वस्‍त्रों के बारे में तुमको कोई परेशान नहीं करेगा, लेकिन कृपया नग्‍न होकर चलना मत आरंभ कर देना, क्‍योंकि उससे और अधिक परेशानियां निर्मित होगी—कि कपड़ा बेचने वाले के पुत्र के पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं है। तुम बदनाम हो और अपने साथ हमें भी बदनाम कर दोगे; बेचारे बच्‍चे को तो देखो, प्रत्‍येक व्‍यक्ति सोचेगा कि हम तुम्‍हें वस्‍त्र नहीं दे रहे है।’
      उसके बाद से उन्‍होंने मेरे वस्‍त्रों पर आपति करना बंद कर दिया। जब मैंने मैट्रिक्‍यूलेशन पास कर लिया तो मैंने वे वस्‍त्र पहनना छोड़ दिए। जैसे मैंने वह नगर छोड़ा मैंने अपने वस्‍त्रों को अपने कालेज के जीवन के अनुसार परिवर्तित कर लिया। मैं जिस पहले कालेज में पढ़ने गया तब मुझे पता लगा कि वहां पर छात्रों के लिए टोपी अनिवार्य थी—तुम टोपी लगाए बिना कालेज में नहीं आ सकते। यह एक विचित्र खयाल था। तुमको उचित प्रकार के वस्‍त्र, जूते पहन कर, शर्ट के बटन बंद करके, टोपी लगा कर ही कालेज आना पड़ता था। मैं वहां बिना बटन का कुर्ता पहन कर, बिना टोपी लगाए, अपनी लकड़ी की खड़ाऊँ पहन कर चला गया—और तुरंत ही मैं वहाँ विख्‍यात हो गया।
      प्रधानाचार्य ने तुरंत मुझको बुलवाया। ‘उन्‍होंने कहा: यह क्‍या है।’
      मैंने कहा: ‘यह बस आपसे परिचित होने का उपाय है, वरना इस काम में वर्षो लग सकते थे। पहले वर्ष के छात्र के बारे में कौन चिंता करता है।’
      उन्‍होंने कहा: ‘हो सकता है कि इसके पीछे तुम्‍हारा कोई ख्‍याल होगा, लेकिन कालेज में इस प्रकार के वेश की अनुमति नहीं है; तुम्‍हें टोपी पहनना पड़ेगी और बटन बंद रखना पड़ेंगे।’
      मैंने कहा: ‘आपको मेरे सम्‍मुख सिद्ध करना पड़ेगा कि टोपी पहनने का कोई वैज्ञानिक कारण है। क्‍या इससे किसी प्रकार से आपको बुद्धि मता के विकास में कोई सहायता मिलती है। तब मैं पगड़ी तक बाँध सकता हूं। टोपी तो क्‍या है, यदि यह आपके मस्तिष्‍क की शक्ति को बढ़ाती है तो, लेकिन तथ्‍य यह है कि भारत में सबसे अधिक मूर्ख पंजाब में पाए जाते है, और वे कस कर बंधी हुई पगड़ी का प्रयोग करते है। संभवत: पूरे संसार में वे एकमात्र लोग है जो इतना कस कर पगड़ी बाँधते है। उनका दिमाग पूरी तरह से कारागृह में होता हे, इस लिए दिमाग बचता ही नहीं। और भारत में सर्वाधि‍क बुद्धिमान हैं बंगाली लोग, जो टोपी का प्रयोग नहीं करते। मैंने कहा: आप बस मुझको बता दें कि इसके मूलभूत वैज्ञानिक कारण क्‍या है, कि मुझे टोपी पहल लेनी चाहिए।’
      उन्‍होंने कहा: ‘अजीब बात है यह, किसी ने टोपियों के बारे में मूलभूत वैज्ञानिक कारण कभी नहीं पूछे। इस कालेज में हमारी बस एक परंपरा है यह।’
      मैंने कहा: ‘परंपराओं की परवाह नहीं करता। यदि परंपरा अवैज्ञानिक है और लोगों की बुद्धि मता नष्‍ट कर रही है, तो मैं वह पहला व्‍यक्ति हूं जो उसके विरोध में विद्रोह करेगा। और जल्‍दी ही आप कालेज से टोपियों को गायब होता हुआ देखेंगे। मैं लोगों को बताने जा रहा हूं, देखो, बंगाली लोगों के पास सर्वश्रेष्‍ठ बुद्धि मता होती है और वह टोपी का प्रयोग नहीं करते है।’
      ‘भारत में पहला नोबल पुरस्‍कार बंगाली व्‍यक्ति को मिला है। मैं कभी नहीं सोचता कि भविष्‍य में कभी भी नोबल पुरस्‍कार किसी पंजाबी व्‍यक्ति को मिलेगा। मैं इस आंदोलन को फैलाने जा रहा हूं। लेकिन यदि आप खामोश रहें और मुझे जैसा मैं हूं वैसा ही रहने की अनुमति प्रदान कर दें तो मैं कोई उपद्रव पैदा नहीं करूंगा, वरना यहां पर एक आंदोलन होगा। आप अपने कार्यालय के सामने आग जलती हुई देखेंगे, टोपियों की होली जलेगी।’
      उन्‍होंने मुझे देखा और बोले: ‘ठीक है, कोई गड़बड़ी मत करना, जैसे तुम हो वैसे ही जारी रखो, लेकिन मैं परेशानी में पड़ जाऊँगा, क्येांकि आज नहीं तो कल दूसरे लोग पूछने बाले है: आपने इनको बिना टोपी के आने की अनुमति क्‍येां दे दी?’
      मैंने कहा: ‘सच्‍ची बात तो यह है कि यदि आप एक ईमानदार आदमी है, तो आपको स्‍वयं टोपी लगाना बंद कर देना चाहिए। क्योंकि आपके पास इसके लिए कोई विज्ञानिक आधार नहीं है। वरना जो आता है इसके वै‍ज्ञानिक मूलभूत कारण खोजने के लिए कह दें—कि किसी ढंग से यह बुद्धि के विकास के लिए सहयोगी है। और कालेज का अर्थ है लोगों की बुद्धि को तेज करने में सहायता देना। वह बुद्धि को अवरूद्ध कर देती है। तो टोपी किस भांति सहायता कर सकती है।‘
      किंतु, वे बोले: ‘कम से कम बटन......’
      मैंने कहा वे मुझे पसंद नहीं है, मुझे हवा का सीधे ही मेरे सीने तक आना पसंद है, मैं इसका आनंद लेता हूं, मुझको बटन पसंद नहीं है। और कालेज कोड़ में कहीं भी नहीं लिखा है कि तुम्‍हें बटनों को प्रयोग करना पड़ेगा।‘
      लेकिन वहां कभी किसी ने सोचा भी न था कि कालेज में लोग बिना बटन के आ सकते है।
 

विश्वास चमत्‍कार और साईं बाबा

13 May, 2017 - 06:05

कल ही मेरी मां मुझे बता रही थीं.....ओर विवेक ने पहली बार इस उत्‍साह से इतनी देर तक बात‍ करते हुए सुना; वरना जो कुछ भी उनसे पूछा जाता है वह एक या दो वाक्‍यों में, हां या नहीं में उत्‍तर दिया करती है और वार्तालाप संपन्‍न हो जाता है। लेकिन कल उन्‍होंने लंबे समय बात की और वे काफी उत्‍साहित थी, इसलिए विवेक ने मुझसे पूछा, ‘आपकी मां आपको क्‍या बता रही थी।’
      मैंने उससे कहा: ‘वे कुछ बातें याद कर रही थी। मैंने उसे अभी तक नहीं बताया कि वे मुझे क्‍या बता रही थी, क्‍योंकि यह एक लंबी कहानी थी। वे मुझको बता रही थी कि उनके गर्भ में जब मैं पाँच माह का था तब एक चमत्‍कार घटित हुआ था।’
      वे मेरे पिता के घर से अपने पिता के घर जा रही थी।  और यह बरसात का मौसम था। भारत में यह रिवाज है कि पहले बच्‍चे का जन्‍म नाना के घर पर हो, इसलिए यद्यपि बरसात का मौसम चल रहा था और जाना बहुत कठिन था, सड़कें नहीं थी और उन्‍हें घोड़े पर जाना पडा था। जितनी जल्‍दी वे पहुंच जातीं उतनी ही बेहतर होता, यदि उन्‍होंने और अधिक प्रतीक्षा की होती तो यह और कठिन हो जाता, इसलिए वे अपने चचेरे भाई के साथ चली गई।
      यात्रा के मध्‍य में एक बड़ी नदी थी, नर्मदा। इसमें बाढ़ आई हुई थी। जब वे नाव पर पहुंचे तो मल्‍लाह ने देखा कि मेरी मां गर्भवती है, और उसने मेरी मां के चचेरे भाई से पूछा, ‘आपका आपस में क्‍या रिश्‍ता है।‘         
      वे नहीं जानते थे कि वे परेशानी में पड़ जाएंगे, इसलिए उन्‍होंने बता दिया: ‘हम भाई और बहन है।’
      मल्‍लाह ने इनकार कर दिया, उसने कहा: ‘मैं आपको नहीं ले जा सकता, क्योंकि आपकी बहन गर्भवती है—इसका अर्थ हे आप दो नहीं है, आप तीन है।’
      भारत में यह एक रिवाज है, पुराना रिवाज है—शायद  यह कृष्‍ण के समय से आरंभ हुआ होगा—कि किसी को अपनी बहन के पुत्र के साथ पानी पर यात्रा, विशेषत: नाव के द्वारा नहीं करना चाहिए, ऐसा होने पर नाव डूबने का खतरा है।
      मल्‍लाह ने कहा: ‘इस बात का क्‍या प्रमाण है कि तुम्‍हारी बहन के गर्भ में जो शिशु है वह लड़की है लड़का नहीं है। यदि वह लड़का है तो मैं खतरा लेना नहीं चाहता, क्‍योंकि केवल मेरे जीवन का प्रश्‍न नहीं है, नाव में साठ अन्‍य लोग भी जा रहे है। या तुम आ सकते हो या तुम्‍हारी बहन आ सकती है। दोनों को मैं नहीं ले जाऊँगा।’
      नदी के दोनों किनारों पर जंगल और पहाड़ थे। और नाव दिन में केवल एक बार जाया करती थी। सुबह नाव जाती थी। और की चौडाई वास्‍तव में इतनी अधिक थी कि नाव शाम वक ही लौट पाती थी। अगली सुबह यह पुन: जाएगी, वह नाव। तो या तो मेरी मां को इस पार ठहरना पड़ता, जो खतरनाक था या अ‍केले ही उस पार जाना पड़ता, यह भी उतना ही खतरनाक था। अत: तीन दिनों तक वे मल्‍लाह से बात करते रहे, उससे निवेदन करते रहे, यह बताते रहें कि वे गर्भवती है और उसको दया करनी चाहिए।
      वह बोला: ‘इसमें मैं कोई सहायता नहीं कर सकता, ऐसा नहीं किया जाता है। यदि तुम मुझको यह प्रमाण दे दो कि इनके गर्भ में यह बच्‍चा लड़का नहीं है, तब मैं तुमको ले जा सकता हूं; लेकिन तुम मुझे प्रमाण किस प्रकार दे सकते हो।’ 
      इस लिए तीन दिनों तक उनको वहां एक मंदिर में रहना पडा। उस मंदिर में एक संत रहा करते थे, उन दिनों उस क्षेत्र में वे बहुत प्रसिद्ध थे। अब उस मंदिर के चारो और उस संत की स्‍मृति में एक नगर बस गया है—साई खेड़ा। साई खेड़े का अर्थ होता है, ‘संत का गांव।’ वे साईं बाबा के नाम से जाने जाते थे। ये वह साईं बाबा नहीं है जो विश्‍वविख्‍यात हो गए—शिरड़ी वाले साईं बाबा—किंतु वे समकालीन थे।
      शिरड़ी वाले साईं बाबा इस साधारण से संयोग के कारण विश्‍वविख्‍यात हो गए, क्‍योंकि शिरड़ी बंबई के निकट है,  और बंबई  के सभी के सभी प्रसिद्ध व्यक्तियों ने और बंबई के सभी धनी व्यक्तियों ने शिरड़ी बाले साईं बाबा के पास जाना आरंभ कर दिया था। और क्‍योंकि बंबई विश्‍व भर के लोगों के आवागमन का केंद्र था, शीध्र ही शिरड़ी वाले साईं बाबा का नाम भारत के बाहर पहुंचने लगा, ओरा उनके चारों और अनेक चमत्‍कार निर्मित कर दिए गए।
      उस मंदिर में रहने वाले साईं बाबा की भी वैसी ही प्रतिष्‍ठा थी। अंतत: मेरी मां को साईं बाबा से निवेदन करना पडा: क्‍या आप कुछ कर सकते है? तीन दिनों से हम लोग यहां पर पड़े हुऐ है। मैं गर्भवती हूं, और मेरे चचेरे भाई ने मल्‍लाह को बता दिया है कि वह मेरा भाई है, और वह हमें नाव में बिठाने को तैयार ही नहीं है। अब जब तक कि आप कुछ नहीं करेंगें, नाव वाले से कुछ न कहेंगे, हम यहीं फंसे रहेंगे। क्‍या किया जाए, मेरा भाई मुझको अकेला छोड़ नहीं सकता; मैं अकेली उस पार जा नहीं सकती। दोनों किनारों पर घने जंगल और जानवर है, और कम से कम चौबीस घंटे मुझको अकेले रह कर प्रतीक्ष करनी पड़ेगी।
      मेरी साईं बाबा से कभी भेंट नहीं हुई, लेकिन एक अर्थ में मैं उनसे मिल चुका हूं, उस समय मैं गर्भ में पाँच माह का था। उन्‍होंने मेरी मां के उदर को छू लिया। मेरी मां ने कहा: ‘यह आप क्‍या कर रहे है।’
      उन्‍होंने कहा: ‘मैं तुम्‍हारे बच्‍चे के चरण स्‍पर्श कर रहा हूं।’
      मल्‍लाह ने यह देखा और कहा: बाबा, आप यह क्‍या कर रहे है? आपने कभी किसी के चरण स्‍पर्श नहीं किए।‘
      और तब बाबा ने कहा: ‘यह बच्‍चा कोई साधारण नहीं है; और तुम मूढ़ हो, तुमको उन्‍हें दूसरी और ले जाना चाहिए। चिंता मर करो, इस गर्भ के भीतर जो आत्‍मा है वह हजारों लोगों को तारने में सक्षम है, इसलिए अपने उन साठ लोगों कि चिंता मत करो, उन्‍हें उस पार ले जाओ।’
      तो मेरी मां कह रह थी, ‘उसी समय मुझको पता लगा कि मेरे गर्भ में कोई विशिष्‍ट आत्‍मा है।’ 
            मैंने कहा: ‘जब तक मैं समझता हूं, साईं बाबा एक होशियार आदमी थे, उस मल्‍लाह को उन्‍होंने वास्‍तव में मूर्ख बना दिया। इसमें कोई चमत्‍कार नहीं है, ऐसा कुछ नहीं है। और नावें इसलिए नहीं डूबा करती हैं कि अपनी बहन के पुत्र के साथ यात्रा कर रहा है। इस खयाल का कोई तार्किक आधार नहीं है, असंगत है यह बात। शायद कभी संयोगवश ऐसा कुछ हो गया होगा, और तब यह एक नियमित ख्‍याल बन गया।‘
      मेरी अपनी समझ यह है, क्‍योंकि कृष्‍ण के जीवन में उनके मामा कंस को ज्योतिषियों ने बता दिया था कि तुम्‍हारी बहन की संतान में से कोई एक तुम्‍हें मार डालेगा, ‘तो उसने अपनी बहन और अपने जीजा को कारागृह में डाल दिया। उसने सात बच्‍चों, सात लड़कों को जन्‍म दिया और मामा ने उन सभी को मार डाला। आठवां बच्‍चा कृष्‍ण थे, और निस्‍संदेह जब स्‍वयं परमात्‍मा को जन्‍म लेना था, तो कारागृह के सभी ताले खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए, और कृष्‍ण के पिता उनको बाहर ले गए।’ 
      कंस के राज्‍य की सीमा में यमुना नदी थी। कंस वही व्‍यक्ति था जो अपनी बहन के पुत्र को इस भय के कारण मारने जा रहा था कि उसके पुत्रों में से कोई उसको मार डालने वाला है। यमुना में बाढ़ आई हुई थी, और यह भारत की विशालतम नदियों में से एक है। कृष्‍ण के पिता वसुदेव बहुत भयभीत थे, लेकिन किसी भी तरह बालक को नदी के उस पार, एक मित्र के घर जिसकी पत्नी ने एक बालिका को जन्‍म दिया था, पहुंचाना ही था—जिससे कि वे उनकी अदला-बदली कर सकें। वे बालिका को अपने साथ ले आते क्‍योंकि अगली सुबह कंस वहां आकर पूछता, बच्‍चा कहां है? और उसको मारने की सोचता। लेकिन वह बालिका को नहीं मारेगा, मारने के लिए बच्‍चे को लड़का होना चाहिए।
      लेकिन नदी पार कैसे की जाए, रात्रि में कोई नाव भी नहीं थी, किंतु नदी तो पार करनी ही थी। लेकिन जब परमात्‍मा कारागृह के तालों को बिना चाबी के, बिना किसी के द्वारा खोले हुए खोल सकता है—वे बस स्‍वय: खुल गए, द्वार खुल गए, रक्षक सो गए—परमात्‍मा कुछ करेगा।
      इसलिए उन्‍होंने बच्‍चे को एक टोकरी में रखा और नदी को पार कर लिया—कुछ वैसा ही हुआ जैसा मोजे़ज के साथ हुआ, जब सागर दो भागों में बट गया इस बार यह भारतीय ढंग से हुआ। ऐसा मोज़ेज के साथ नहीं हो पाया था। क्‍योंकि वह सागर भारतीय नहीं था, किंतु यह यमुना नदी भारतीय थी।
      जैसे ही उनहोंने बच्‍चे को एक टोकरी में रखा और नदी को पार कर लिया—कुछ वैसा कि यह क्‍या हो रहा है। उन्‍हें आशा थी कि नदी नीची हो जाएगी, किंतु यह ऊपर उठने लगी। वह उस बिंदु तक ऊपर उठती चली गई जहां पर उसने कृष्‍ण के चरणों को स्‍पर्श कर लिया, फिर वह वापस नीचे हो गई। यह है भारतीय ढंग, ऐसा और कहीं नहीं हो सकता। नदी यह अवसर कैसे चूक सकती थी, जब परमात्‍मा ने जन्‍म लिया है और उसमें से होकर गुजर रहा है, तो बस उसको रास्‍ता दे देना ही पर्याप्‍त नहीं है, शिष्‍टाचार नहीं है।
      उस समय ऐसा खयाल बन गया कि व्‍यक्ति और उसके भांजे में विरोध होता है, क्‍योंकि कृष्‍ण ने अपने मामा कंस को मार डाला। यमुना नदी पार कर ली गई, उसने रास्‍ता दे दिया; उसने शिशु के साथ सहयोग किया। तब से नदिया, भारत की सभी नदिया मामाओं से क्रृद्ध है। और यह अंधविश्‍वास अभी तक चला आ रहा था।
      मैंने अपनी मां से कहा: ‘एक बात तो तय है कि साईं बाबा एक बुद्धिमान और मजाकिया स्‍वभाव के व्‍यक्ति रहे होगें। लेकिन उनहोंने नहीं सुना। और जो कुछ भी हुआ वह सारे गांव को पता लग गया। और एक माह बाद इस चमत्‍कार के समर्थन में एक घटना और घट गई...जीवन में ऐसे अनेक संयोग होते हे जिनको तुम चाहो तो चमत्‍कार बना सकते हो। एक बार तुम तय कर लो कि चमत्‍कार बना लेना है, तो किसी भी संयोग को चमत्‍कार में बदला जा सकता है।’
      एक माह बाद बहुत बड़ी बाढ आई, और मेरी मां के घर के सामने बरसात के मौसम में एक नदी सी बहा करती थी। वहां एक झील थी, और घर तथा झील के माध्‍य के एक छोटी सी सड़क थी, लेकिन वर्षा ऋतु में इतना अधिक पानी आता था कि वह सड़क पूरी तरह से नदी की भांति हो जाती थी, और झील और सड़क मिल कर एक हो जाया करती थी। यह सागर जैसा बन जाता था और जितनी दूर तक तुम देख सको पानी ही पानी दिखाई देता था। और उस साल भारत में शायद तब‍ तक की सबसे बड़ी बाढ़ आई थी। 
      भारत में आमतौर पर प्रतिवर्ष बाढ़ें आया करती है। लेकिन उस वर्ष एक विचित्र बात देखने में आई कि बाढ़ों ने नदियों के पानी का प्रवाह उलटना आरंभ कर दिया। बरसात इतनी अधिक हो गई थी कि सागर में जितना पानी बह कर आ रहा था, उतनी तेजी से वह सागर में समा नहीं पा रहा था। इस लिए सागर की और प्रवाह अवरूद्ध हो गया और वह पीछे की और लौटने लगा था। जहां पर छोटी नदियों बड़ी नदियों में मिल जाती है, बड़ी नदियों ने पानी लेने से इनकार कर दिया, क्‍योंकि उनमें स्‍वयं का पानी ही नहीं समा रहा था। छोटी नदियों ने पीछे की और बहना आरंभ‍ कर दिया।
      मैंने कभी ऐसा नहीं देखा, मैं इससे चूक गया, लेकिन मेरी मां ने कहा कि पानी को पीछे की और बहते देखना एक अनूठी घटना थी। और वापस लौटता यह पानी घरों में घुसने लगा था, यह मेरी मां के धर में धूस गया। वह दो मंजिल में भरने लगा। जाने के लिए अब कोई स्‍थान न बचा था। इसलिए वे सभी लोग वहां पर उपलब्‍ध सबसे ऊंचे स्‍थानों, पलंगों पर बैठ गए। लेकिन मेरी मां ने कहा: यदि साईं बाबा की बात सही है तो कुछ चमत्‍कार हो जाएगा। और यह एक संयोग ही रहा होगा कि जैसे ही पानी ने मेरी गर्भवती मां के पेट का स्‍पर्श किया, वह वापस लौट गया।
      मेरे जन्‍म से पहले ये दो चमत्कार घटित हुए थे। घटित हुए थे। इसलिए मेरा उनसे कुछ भी लेना-देना नहीं है। लेकिन ये दोनों चमत्‍कार विख्‍यात हो गए थे। इसलिए, जब मेरा जन्‍म हुआ तो पूरे गांव में मैं करीब-करीब एक संत के रूप में स्‍थापित हो चुका था। प्रत्‍येक व्‍यक्ति बहुत आदरपूर्ण था, यहां तक कि बूढ़े लोग भी मेरे चरण स्‍पर्श किया करते थे। मुझे बाद में बताया गया, ‘सारे गांव ने तुमको एक संत के रूप में स्‍वीकार कर लिया था।’
      उस समय मैं कोई चार वर्ष का रहा होऊं गा, तब उस घर में मैं एकमात्र बच्‍चा था—करने को कुछ था भी नहीं, न जाने को कोई स्‍थान था, न स्‍कूल। मेरे नाना की एक बहु-उपयोगी दुकान थी। जिसमें हर प्रकार की वस्‍तु बिका करती थी। गांव की वह एकमात्र दुकान थी, इसलिए प्रत्‍येक प्रकार की वस्‍तु...तो यह एक दुकान के स्‍थान पर एक छोटा मोटा बाजार ही थी। इसलिए मैंने मिठाइयों तथा और दूसरी वस्‍तुओं के साथ खेलना शुरू कर दिया, और मैं नहीं जानता कि मेरे साथ ऐसा किस भांति होने लगा....लेकिन जल्‍दी ही मेरे पास ऐसे लोग लगातार आने लगे जो रोगी थे, और उस क्षेत्र में कोई चिकित्‍सक, कोई वैद्य, कोई अस्‍पताल नहीं था। सैकड़ों मील के क्षेत्र में दूर-दूर तक कोई अस्‍पताल नहीं था।
      किसी तरह मुझे यह समझ में आया कि लोग मुझको संत की भांति समझते थे। और वे मेरे पाँव छूते थे, मैंने उनको औषधि देना आरंभ कर दिया था। और यह औषधियां और कुछ नहीं बल्कि अच्‍छी तरह से कूट कर मिलाई गई मिठाइयों का मिश्रण थी। जिनको विभिन्‍न रेगों की शीशी यों में रख दिया गया था। और निस्‍संदेह वक लोग जिन्‍हें बुखार या सरदर्द या पेट दर्द होता है इसके कारण मर थोड़े ही जाते है। और वे ठीक होने लगे। वह तो वैसे ही ठीक हो जाते—यह कोई चमत्‍कार न था, लेकिन यह चमत्‍कार बन गया था।
      मेरे नाना कहने लगे—‘तुम मेरी दुकान चौपट कर ड़ालोगे, अब यह एक अस्‍पताल बन गर्इ है। सारे दिन लोग आते रहते है। और कभी तो मुझको भी तुम्‍हारी औषधियां देनी पड़ती है। और मुझको जरा भी नहीं पता है कि ये औषधियां कैसी है। तुम मेरी मिठाइयों और मेरी दुकान दोनों ही बरबाद कर रहे हो। लेकिन लोग ठीक हो रहे है इसलिए कोई नुकसान नहीं है, तुम अपना काम जारी रखो।’
      सात वर्ष का होने पर जब मैं अपने पिता के घर चला गया, तो मैंने औषधियों बांटने बाला अपनी काम छोड़ दिया, किंतु उस गांव से आने बाले लोग जब भी कभी आते मुझको याद दिलाया करते। मुझे वे लोग डाक्‍टर साहब कहा करते थे। और मैं कहता: ‘यहां पर कृपया यह शब्‍द प्रयोग मत करो, क्‍योंकि मैंने यह कार्य पूरी तरह से छोड़ दिया है। पहली बात तो यह कि यहां पर मिठाई नहीं है। मेरे पिता की कपड़ों की दुकान है, कपड़ों से मैं औषधि नहीं बना सकता। और यहां कोई नहीं जानता कि मैं चमत्‍कार कर सकता हूं। पहले लोगों को जानना पड़ता है, फिर तुम चमत्‍कार कर सकते हो, वरना तुम चमत्‍कार नहीं कर सकते।’
 

केंद्र में बुद्ध हों, तो ही संघ बनता है

28 April, 2017 - 06:05

मेरे पास इतने संन्यासी हैं। उनका कोई संबंध एक दूसरे से नहीं है। अगर एक दूसरे के पास हैं, तो सिर्फ इसी कारण कि दोनों मेरे पास हैं और कोई कारण नहीं है। तुम यहां बैठे हो, कितने देशों के लोग यहां बैठे हैं। तुम्हारे पास बैठा है कोई इंग्लैंड से है, कोई ईरान से है, कोई अफ्रीका से है, कोई जापान से है, कोई अमरीका से है, कोई स्वीडन से है, कोई स्विट्जरलैंड से है, कोई फ्रांस से, कोई इटली से। तुम्हारा पड़ोस में बैठे आदमी से कोई भी संबंध नहीं है, न पास में बैठी स्त्री से कोई संबंध है। तुम्हारा संबंध मुझसे है, उसका भी संबंध मुझसे है। तुम दोनों की नजर मुझ पर लगी है। यद्यपि तुम सब साथ बैठे हो, लेकिन तुम्हारा संबंध सीधा नहीं है।

लेकिन संघ का मौलिक आधार होता है, बुद्धपुरुष। केंद्र में बुद्ध हों, तो ही संघ बनता है।

दूसरा शब्द है, संगठन। जिस दिन बुद्ध विदा हो जाते हैं, जला दीया विलीन हो जाता है, निर्वाण को उपलब्ध हो जाता है, लेकिन उस जले दीए ने जो बातें कही थीं, जो व्यवस्था दी थी, जो अनुशासन दिया था, उस शास्ता ने जो कहा था, जो देशना दी थी, उसका शास्त्र रह जाता है; उस शास्त्र के आधार पर जो बनता है, वह संगठन। संघ की खूबी तो इसमें न रही। संघ के प्राण तो गए। संगठन मरा हुआ संघ है। कुछ कुछ भनक रह गयी, कभी जाना था किसी जाग्रतपुरुष का सान्निध्य, कभी उसके पास उठे बैठे थे, कभी उसकी सुगंध नासापुटों में भरी थी, कभी उसकी बांसुरी की मनमोहक तान हमारी तंद्रा में हमें सुनायी पड गयी थी, कभी किसी ने हमें प्रमाण दिया था अपने होने से कि ईश्वर है, कभी किसी की वाणी हमारे हृदय को गुदगुदा गयी थी, बंद कलिया खुली थीं, कभी कोई बरसा था सूरज की भांति हम पर और हम भी अंकुरित होने शुरू हुए थे, याद रह गयी, श्रुति रह गयी, स्मृति रह गयी, शास्त्र रह गया शास्ता गया, शास्त्र रह गया। शास्ता और शास्त्र शब्द का संबंध समझ लेना, वही संबंध संघ और संगठन का है।

फिर एक ऐसा समय भी आता है, जब ये भी नहीं रह जाते, जब कोई व्यवस्था नहीं रह जाती, व्यवस्थामात्र जब शून्य हो जाती है और जब अंधे एक दूसरे से टकराने लगते हैं, उसका नाम भीड़ है।

इन चार शब्दों का अलग अलग अर्थ है। संघ, शास्ता जीवित है। संगठन, शास्ता की वाणी प्रभावी है। समूह, शास्ता की वाणी भी खो गयी लेकिन अभी कुछ व्यवस्था शेष है। भीड़, व्यवस्था भी गयी; अब सिर्फ अराजकता है।

एस धम्मो सनंतनो 

ओशो

भगवान्! आप दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हो?

28 April, 2017 - 06:05

मेरा संदेश संक्षिप्त है--ऐसे संक्षिप्त , ऐसे सारे शास्त्र भी उसमें समा जाते हैं। और किसी एक परंपरा के शास्त्र ही नहीं, सभी परंपराओं के शास्त्र समा जाते हैं। और अध्यात्मवादियों के शास्त्र ही नहीं, भौतिकवादियों के शास्त्र भी समा जाते हैं।

मैं ऐसा धर्म देना चाहता हूं, जो आस्तिक और नास्तिक दोनों के लिए समान रूप से उपलब्ध हो। अब तक तो सारे धर्म आस्तिक को उपलब्ध रहे हैं; जो मान सके उसको उपलब्ध रहे हैं। लेकिन उसका क्या जो न मान सके? क्या उसे छोड़ ही दोगे? क्या उसके लिए परमात्मा तक पहुंचने का कोई उपाय नहीं होगा? तब तो यह पृथ्वी पूरी की पूरी धार्मिक कभी भी न हो सकेगी। तब तो कुछ कमी बनी ही रहेगी। तब तो कुछ लोग अधार्मिक होने को मजबूर ही रहेंगे।

फिर, जो मान सकता है उसके जीवन की क्रांति भी कुनकुनी होती है। उसके जीवन की क्रांति में बड़ी ऊर्जा नहीं होती । एक अर्थों में उसकी क्रांति नपुंसक होती है। वह मान सकता है, इसलिए मान लेता है। उसके मानने में कोई संघर्ष नहीं होता। उसके मानने में कोई अभियान नहीं होता। उसके मानने में सत्य की कोई खोज, गवेषणा नहीं होती।

असली खोज तो वह करता है जो नहीं मान पाता है; जिसके भीतर से "नहीं' का स्वर उठता है। क्रांति तो वहीं घटित होती है। इस जगत् के जो परम धार्मिक लोग थे, वे वे ही थे, जो नास्तिकता से गुजरे। जिन्होंने आस्तिकता से शुरू किया उनकी आस्तिकता हमेशा लचर रही, कमजोर रही, लंगड़ी रही। मनुष्य यदि धार्मिक नहीं हो पाया तो इसी लचर आस्तिकता के कारण। विश्वास करो . . . जो कर सके, ठीक; लेकिन जो न कर सके वह कैसे करे? विश्वास कोई करने की बात है? हो जाए तो हो जाए। न हो तो फिर क्या? क्या परमात्मा तक पहुंचने का द्वार बंद ही हो गया? यह तो अन्याय होगा।

मैं एक ऐसा धर्म देना चाहता हूं, जो श्रद्धा का भी उपयोग करे और संदेह का भी; जो कहेः श्रद्धा से भी पहुंचा जा सकता है और संदेह से भी पहुंचा जा सकता है। क्योंकि सभी रास्ते उस तक ले जाते हैं।

ज्योति से ज्योति जले 

ओशो

सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति है।

28 April, 2017 - 06:05

प्रश्न :- एक दूसरे मित्र ने पूछा है कि सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति है। पति-पत्नी के संबंध में उसका क्रिएटिव उपयोग कैसे किया जाए?

यह बड़ी बहुमूल्य बात पूछी है। शायद ही ऐसे लोग होंगे, जो इस तरह के, जिनके लिए इस तरह का प्रश्न उपयोगी न हो, सार्थक न हो। दुनिया में दो ही तरह के लोग हैं। एक वे लोग हैं, जो सेक्स की, काम की शक्ति से पीड़ित हैं। और एक वे लोग हैं, जिन्होंने काम की शक्ति को प्रेम की शक्ति में परिणत कर लिया है।

आप जानकर हैरान होंगे,   प्रेम और काम,  प्रेम और सेक्स विरोधी चीजें हैं।  जितना प्रेम विकसित होता है, सेक्स क्षीण हो जाता है।  और जितना प्रेम कम होता है, उतना सेक्स ज्यादा हो जाता है।  जिस आदमी में जितना ज्यादा प्रेम होगा, उतना उसमें सेक्स विलीन हो जाएगा। अगर आप परिपूर्ण प्रेम से भर जाएंगे, आपके भीतर सेक्स जैसी कोई चीज नहीं रह जाएगी। और अगर आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है, तो आपके भीतर सब सेक्स है।

सेक्स की जो शक्ति है, उसका परिवर्तन,  उसका उदात्तीकरण प्रेम में होता है।  इसलिए अगर सेक्स से मुक्त होना है,  तो सेक्स को दबाने से कुछ भी न होगा। उसे दबाकर कोई पागल हो सकता है। और दुनिया में जितने पागल हैं, उसमें से सौ में से नब्बे संख्या उन लोगों की है, जिन्होंने सेक्स की शक्ति को दबाने की कोशिश की है। और यह भी शायद आपको पता होगा कि सभ्यता जितनी विकसित होती है, उतने पागल बढ़ते जाते हैं,  क्योंकि सभ्यता सबसे ज्यादा दमन सेक्स का करवाती है। सभ्यता सबसे ज्यादा दमन, सप्रेशन सेक्स का करवाती है! और इसलिए हर आदमी अपने सेक्स को दबाता है, सिकोड़ता है। वह दबा हुआ सेक्स विक्षिप्तता पैदा करता है, अनेक बीमारियां पैदा करता है, अनेक मानसिक रोग पैदा करता है।
सेक्स को दबाने की जो भी चेष्टा है,  वह पागलपन है।  ढेर साधु पागल होते पाए जाते हैं।  उसका कोई कारण नहीं है सिवाय इसके कि वे सेक्स को दबाने में लगे हुए हैं। और उनको पता नहीं है,  सेक्स को दबाया नहीं जाता। प्रेम के द्वार खोलें, तो जो शक्ति सेक्स के मार्ग से बहती थी, वह प्रेम के प्रकाश में परिणत हो जाएगी। जो सेक्स की लपटें मालूम होती थीं, वे प्रेम का प्रकाश बन जाएंगी। प्रेम को विस्तीर्ण करें। प्रेम सेक्स का क्रिएटिव उपयोग है, उसका सृजनात्मक उपयोग है। जीवन को प्रेम से भरें।
आप कहेंगे, हम सब प्रेम करते हैं। मैं आपसे कहूं, आप शायद ही प्रेम करते हों;  आप प्रेम चाहते होंगे। और इन दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है।  प्रेम करना और प्रेम चाहना,  ये बड़ी अलग बातें हैं।  हममें से अधिक लोग बच्चे ही रहकर मर जाते हैं।  क्योंकि हरेक आदमी प्रेम चाहता है।  प्रेम करना बड़ी अदभुत बात है। प्रेम चाहना बिलकुल बच्चों जैसी बात है।

छोटे-छोटे बच्चे प्रेम चाहते हैं। मां उनको प्रेम देती है। फिर वे बड़े होते हैं। वे और लोगों से भी प्रेम चाहते हैं, परिवार उनको प्रेम देता है। फिर वे और बड़े होते हैं। अगर वे पति हुए, तो अपनी पत्नियों से प्रेम चाहते हैं। अगर वे पत्नियां हुईं, तो वे अपने पतियों से प्रेम चाहती हैं। और जो भी प्रेम चाहता है,  वह दुख झेलता है।  क्योंकि प्रेम चाहा नहीं जा सकता,  प्रेम केवल किया जाता है।  चाहने में पक्का नहीं है, मिलेगा या नहीं मिलेगा।  और जिससे तुम चाह रहे हो, वह भी तुमसे चाहेगा।  तो बड़ी मुश्किल हो जाएगी। दोनों भिखारी मिल जाएंगे और भीख मांगेंगे। दुनिया में जितना पति-पत्नियों का संघर्ष है, उसका केवल एक ही कारण है कि वे दोनों एक-दूसरे से प्रेम चाह रहे हैं और देने में कोई भी समर्थ नहीं है।
इसे थोड़ा विचार करके देखना आप अपने मन के भीतर। आपकी आकांक्षा प्रेम चाहने की है हमेशा। चाहते हैं, कोई प्रेम करे।  और जब कोई प्रेम करता है, तो अच्छा लगता है। लेकिन आपको पता नहीं है, वह दूसरा भी प्रेम करना केवल वैसे ही है जैसे कि कोई मछलियों को मारने वाला आटा फेंकता है। आटा वह मछलियों के लिए नहीं फेंक रहा है। आटा वह मछलियों को फांसने के लिए फेंक रहा है। वह आटा मछलियों को दे नहीं रहा है, वह मछलियों को चाहता है, इसलिए आटा फेंक रहा है। इस दुनिया में जितने लोग प्रेम करते हुए दिखायी पड़ते हैं, वे केवल प्रेम पाना चाहने के लिए आटा फेंक रहे हैं। थोड़ी देर वे आटा खिलाएंगे, फिर…।

और दूसरा व्यक्ति भी जो उनमें उत्सुक होगा,  वह इसलिए उत्सुक होगा कि शायद इस आदमी से प्रेम मिलेगा। वह भी थोड़ा प्रेम प्रदर्शित करेगा।  थोड़ी देर बाद पता चलेगा,  वे दोनों भिखमंगे हैं और भूल में थे;  एक-दूसरे को बादशाह समझ रहे थे!  और थोड़ी देर बाद उनको पता चलेगा कि कोई किसी को प्रेम नहीं दे रहा है और तब संघर्ष की शुरुआत हो जाएगी।

दुनिया में दाम्पत्य जीवन नर्क बना हुआ है,  क्योंकि हम सब प्रेम मांगते हैं, देना कोई भी जानता नहीं है। सारे झगड़े के पीछे बुनियादी कारण इतना ही है। और कितना ही परिवर्तन हो, किसी तरह के विवाह हों,  किसी तरह की समाज व्यवस्था बने, जब तक जो मैं कह रहा हूं अगर नहीं होगा, तो दुनिया में स्त्री और पुरुषों के संबंध अच्छे नहीं हो सकते। उनके अच्छे होने का एक ही रास्ता है कि हम यह समझें कि प्रेम दिया जाता है, प्रेम मांगा नहीं जाता, सिर्फ दिया जाता है। जो मिलता है, वह प्रसाद है, वह उसका मूल्य नहीं है। प्रेम दिया जाता है। जो मिलता है, वह उसका प्रसाद है,  वह उसका मूल्य नहीं है। नहीं मिलेगा, तो भी देने वाले का आनंद होगा कि उसने दिया।
अगर पति-पत्नी एक-दूसरे को प्रेम देना शुरू कर दें और मांगना बंद कर दें,  तो जीवन स्वर्ग बन सकता है। और जितना वे प्रेम देंगे और मांगना बंद कर देंगे,  उतना ही–अदभुत जगत की व्यवस्था है–उन्हें प्रेम मिलेगा। और उतना ही वे अदभुत अनुभव करेंगे–जितना वे प्रेम देंगे, उतना ही सेक्स उनका विलीन होता चला जाएगा।
गांधी जी पीछे वहां लंका में थे। वे कस्तूरबा के साथ लंका गए। वहां जो व्यक्ति था, जिसने उनका परिचय दिया पहली सभा में, उसने समझा कि बा आयी हैं साथ, शायद ये गांधी जी की मां होंगी। बा से उसने समझा कि गांधी जी की मां भी साथ आयी हुई हैं। उसने परिचय में गांधी जी के कहा कि ‘यह बड़े सौभाग्य की बात है कि गांधी जी भी आए हैं और उनकी मां भी आयी हुई हैं।’
बा तो बहुत हैरान हो गयीं। गांधी जी के सेक्रेटरी जो साथ थे, वे भी बहुत घबड़ा गए कि भूल तो उनकी है, उनको बताना चाहिए था कि कौन साथ है। वे बड़े घबड़ा गए कि शायद बापू डांटेंगे। शायद कहेंगे कि ‘यह क्या भद्दी बात करवायी!’  लेकिन गांधी जी ने जो बात कही,  वह बड़ी अदभुत थी। उन्होंने कहा कि ‘मेरे इन भाई ने मेरा जो परिचय दिया, उसमें भूल से एक सच्ची बात कह दी है। कुछ वर्षों से बा मेरी पत्नी नहीं है,  मेरी मां हो गयी है।’ उन्होंने कहा, ‘कुछ वर्षों से बा मेरी पत्नी नहीं है, मेरी मां हो गयी है!’

सच्चा संन्यासी वह है, जिसकी एक दिन पत्नी मां हो जाए; पत्नी को छोड़कर भाग जाने वाला नहीं। सच्चा संन्यासी वह है, जिसकी एक दिन पत्नी मां बन जाए। सच्ची संन्यासिनी वह है, जो एक दिन अपने पति को अपने पुत्र की तरह अनुभव कर पाए।

पुराने ऋषि सूत्रों में एक अदभुत बात कही गयी है। पुराना ऋषि कभी आशीर्वाद देता था कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए।’  बड़ी अदभुत बात थी।  ये आशीर्वाद देते थे वधु को विवाह करते वक्त कि ‘तुम्हारे दस पुत्र हों और ईश्वर करे, तुम्हारा ग्यारहवां पुत्र तुम्हारा पति हो जाए।’  यह अदभुत कौम थी और अदभुत विचार थे।  और इसके पीछे बड़ा रहस्य था।
अगर पति और पत्नी में प्रेम बढ़ेगा, तो वे पति-पत्नी नहीं रह जाएंगे,  Iउनके संबंध कुछ और हो जाएंगे। और उनसे सेक्स विलीन हो जाएगा और वे संबंध प्रेम के होंगे। जब तक सेक्स है, तब तक शोषण है। सेक्स शोषण है! और जिसको हम प्रेम करते हैं, उसका शोषण कैसे कर सकते हैं? सेक्स एक व्यक्ति का, एक जीवित व्यक्ति का अत्यंत गर्हित और निम्न उपयोग है। अगर हम उसे प्रेम कर सकते हैं, तो हम उसके साथ ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं? एक जीवित व्यक्ति का हम ऐसा उपयोग कैसे कर सकते हैं अगर हम उसे प्रेम करते हैं? जितना प्रेम गहरा होगा, वह उपयोग विलीन हो जाएगा। और जितना प्रेम कम होगा, वह उपयोग उतना ज्यादा हो जाएगा।
इसलिए जिन्होंने यह पूछा है कि सेक्स एक सृजनात्मक शक्ति कैसे बने, उनको मैं यह कहूंगा कि सेक्स बड़ी अदभुत शक्ति है। शायद इस जमीन पर सेक्स से बड़ी कोई शक्ति नहीं है। मनुष्य जिस चीज से क्रियमाण होता है, मनुष्य के जीवन का नब्बे प्रतिशत हिस्सा जिस चक्र पर घूमता है, वह सेक्स है; वह परमात्मा नहीं है। वे लोग तो बहुत कम हैं, जिनका जीवन परमात्मा की परिधि पर घूमता है। अधिकतर लोग सेक्स के केंद्र पर घूमते और जीवित रहते हैं।
सेक्स सबसे बड़ी शक्ति है। यानि अगर हम ठीक से समझें, तो मनुष्य के भीतर सेक्स के अतिरिक्त और शक्ति ही क्या है, जो उसे गतिमान करती है, परिचालित करती है। इस सेक्स की शक्ति को, इस सेक्स की शक्ति को ही प्रेम में परिवर्तित किया जा सकता है। और यही शक्ति परिवर्तित होकर परमात्मा तक पहुंचने का मार्ग बन जाती है।
इसलिए यह स्मरणीय है कि धर्म का बहुत गहरा संबंध सेक्स से है। लेकिन सेक्स के दमन से नहीं–जैसा समझा जाता है–सेक्स के सब्लिमेशन से है। सेक्स के दमन से धर्म का संबंध नहीं है। ब्रह्मचर्य सेक्स का विरोध नहीं है, ब्रह्मचर्य सेक्स की शक्ति का उदात्तीकरण है। सेक्स की ही शक्ति ब्रह्म की शक्ति में परिवर्तित हो जाती है। वही शक्ति, जो नीचे की तरफ बहती थी, अधोगामी थी, ऊपर की तरफ गतिमान हो जाती है। सेक्स ऊर्ध्वगामी हो जाए, तो परमात्मा तक पहुंचाने वाला बन जाता है। और सेक्स अधोगामी हो, तो संसार में ले जाने का कारण होता है।
वह प्रेम से परिवर्तन होगा। प्रेम करना सीखें। और प्रेम करने का मतलब, अभी हम जब आगे भावनाओं के संबंध में बात करेंगे, तो आपको पूरी तरह समझ में आ सकेगा कि प्रेम करना कैसे सीखें। लेकिन इतना मैं अभी फिलहाल कहूं।

ध्यान-सूत्र, 
तीसरा प्रवचन, ओशो
 

स्वयं को निर्भार करो।

28 April, 2017 - 06:05

अपने को भार-मुक्‍त करो। मैं एक सूफी संत की कहानी पढ़ रहा था। वह एक सुनसान रास्‍ते से यात्रा कर रहा था। रास्‍ता निर्जन हो चला था, तभी उसे एक किसान अपनी बैलगाड़ी के पास दिखाई पडा। बैलगाड़ी कीचड़ में फंस गई थी। रास्‍ता उबड़-खाबड़ था। किसान अपनी गाड़ी में सेब भर कर ला रहा था; लेकिन रास्‍ते में कहीं गाड़ी का पिछला तख्‍ता खुल गया था और सेब गिरते गए थे। लेकिन उसे इसकी खबर नहीं थी। किसान को इसका पता नहीं था। जब गाड़ी कीचड़ मे फंसी तो पहले तो उसने उसे निकालने की भरसक चेष्‍टा कि, लेकिन उसके सब प्रयत्‍न व्‍यर्थ गए। तब उसने सोचा कि मैं गाड़ी को खाली कर लूं तो निकालना आसान हो जाएगा।
      उसने जब लौटकर देखा तो मुश्‍किल से दर्जन भर सेब बचे थे। सब बोझ पहले ही उतर चूका था। तुम उसकी पीड़ा समझ सकते हो। उस सूफी ने अपने संस्‍मरणों में लिखा है कि थके-हारे किसान ने एक आह भरी: ‘नरक में गाड़ी फंसी और उतारने को कुछ भी नहीं है।’यही एक आशा बची थी कि गाड़ी खाली हो तो कीचड़ से निकल आएगी। पर अब खाली करने को भी कुछ नहीं है।
 सौभाग्‍य से तुम इस तरह नहीं फंसे हो। तुम खाली कर सकते हो। तुम्‍हारी गाड़ी बहुत बोझिल है। तुम मन को खाली कर सकते हो। और जैसे ही मन गया कि तुम उड़ सकते हो। तुम्‍हें पंख लग जाते है।

ओशो

हम जीवन से परिचित क्यों नहीं हैं?

28 April, 2017 - 06:05

हम जीवन से इसलिए परिचित नहीं हैं कि जीवन हमेशा वर्तमान में होता है, और हम? हम या तो अतीत में होते हैं या भविष्य में होते हैं। जीवन हमेशा वर्तमान में है। समय के ये तीन खंड हैं--अतीत है, जो बीत गया; भविष्य है, जो अभी नहीं आया; और वर्तमान का छोटा सा क्षण है, जो मौजूद है। वह जो लिविंग प्रेजेंट है, वह जो जीवित वर्तमान का क्षण है, उसमें हम कभी नहीं होते। वह बहुत छोटा सा क्षण है। इसके पहले कि हम होश में आएं, वह अतीत हो जाएगा। लेकिन हमारा चित्त या तो अतीत में होता है, या तो हम पीछे की बातें सोचते रहते हैं, या हम आगे की बातें सोचते रहते हैं। इसलिए उससे वंचित रह जाते हैं, जो है, जो इसी क्षण है। 

अमृत की दशा 

ओशो

संबंध के कई स्तर हैं

27 April, 2017 - 06:05

शरीर सब कुछ नहीं है 
कामुकता संबंध की शुरुआत मात्र है !
लेकिन कई लोग वहाँ अंत कर लेते हैं, 
और कई लोग कभी जान नहीं पाते 
कि भीतर और गहरी मुलाकात है, घनिष्ठता है !

अनेक लोग कभी नहीं जान पाते कि क्या होता है जब दो हृदय मिलते हैं। लोग यह तक नहीं जानते कि क्या होता है जब दो मन मिलते हैं। और जब दो प्राण मिलते हैं, एक ऐसा बिंदु है जहाँ दो किनारे एक-दूसरे के भीतर बस खो जाते हैं और कोई नहीं जानता कि कौन कौन है -- पुरूष स्त्री हो जाता है, स्त्री पुरूष हो जाती है; और प्रेम प्रार्थना बन जाता है।

अनेक लोग संबंध को शरीर के साथ खत्म कर लेते हैं; यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रेम अनेक द्वार खोल सकता है। यदि प्रेम है तो वह हमेशा अनेक द्वार खोलता है।

इसलिए जब तुम प्रेम में हो तब जितना अधिक हो सके उतना खुले रहो, जितना संभव हो उतना भयरहित रहो; ताकि प्रेम का तीर तुम्हारे बहुत भीतर तक उतर सके और उन पर्तों को छू सके जो कभी नहीं छुई गई !
परम प्यारे ओशो.....
गॉड इज नॉट फॉर सेल !

अपने आनंद और प्रेम के लिए काम करो।

27 April, 2017 - 06:05

काम को खेल की तरह खेलो और  उसका मजा लो 

                                 जो भी काम करो उसमे अपना प्रेम उडेल दो,अपना होश उसमें जोड दो।बस पैसे के लिए काम मत करो।अपने आनंद और प्रेम के लिए काम करो।यदि पूरे ध्यान से काम करो तो किसी अौर ध्यान की जरूरत नहीं ,तुम्हारा काम ही ध्यान बन जाता है।
यदि तुम अपने काम को ध्यान बना सको तो उससे बेहतर कोई परिस्थिति नहीं हो सकती। फिर तुम्हारे आन्तरिक और बाह्य जीवन में कोई विरोध  नहीं होता।ध्यान कोई अलग चीज नही है,तुम्हारे जीवन का हिस्सा है।हर आती जाती श्वास की तरह ध्यान भी लगातार चल सकता है।
और बस थोडी सी बदलाहट की जरूरत है; कोई बहुत ज्यादा कुछ करना भी नहीं है।जो भी चीज तुम बेहोशी में करते रहे हो,उन्हें जरा होश से करने लगो ।अौर तुम जब साधारणतया कुछ करते हो तो कुछ पाने के लिए - जैसे कि पैसा है _  _ _ पैसा ठीक है,लेकिन उसे उद्देश्य मत बनाओ ,बस बाइप्रोड्क्ट की तरह आने दो । पैसे की जरूरत है लेकिन पैसा सब कुछ नहीं है _ मजे के लिए काम करो, और फिर देखो कितनी खुशियां बिना मोल चली आती हैं,उन्हें क्यों चूकते हो ? 
काम को खेल की तरह खेलो और उसका मजा लो।यह प्रयोग हर काम के लिए किया जा सकता है हर काम एक चुनौती है।

    ओशो

आनन्द से भरा हुआ चित्त आस्तिक हो जाता है

27 April, 2017 - 06:05

यह बड़े मजे की बात है कि जब फूल खिलता है, तो आकाश की तरफ उठता है। और जब मुरझाता है, सूखता है, तो जमीन की तरफ गिर जाता है। आदमी जीवित होता है, तो आकाश की तरफ उठा हुआ होता है। मर जाता है, तो जमीन में दफना दिया जाता है, मिट्टी में गिर जाता है। वृक्ष उठते हैं, जीवित होते हैं, तो आकाश की तरफ उठते हैं। फिर जराजीर्ण होते हैं, गिरते और मिट्टी में सो जाते हैं। ऊपर और नीचे। कुछ ऊपर की तरफ खींच रहा है, कुछ नीचे की तरफ खींच रहा है।

 

विषाद जब चित्त में होता है, तो आदमी का हृदय पत्थर की तरह हो जाता है, नीचे की तरफ गिरने लगता है। जब भी आप दुख में रहे हैं, तब आपने अनुभव किया होगा कि हृदय पर हजारों मनों का बोझ हो जाता है। फिर जमीन तो नीचे की तरफ खींचती है, लेकिन परमात्मा फिर ऊपर की तरफ खींचता हुआ मालूम नहीं पड़ता। इसलिए दुख में आदमी मरना चाहता है। मरना चाहता है मतलब, जमीन के ग्रेविटेशन में दफन हो जाना चाहता है। दुख में आत्महत्या कर लेना चाहता है; मतलब, डस्ट अनटु डस्ट, मिट्टी मिट्टी में लौट जाए, इसके लिए आतुर हो जाता है।

ठीक इससे उलटी घटना भी घटती है। जब कोई आनंद से भरता है, तो कांशसनेस अनटु कांशसनेस–मिट्टी में मिट्टी नहीं–परमात्मा में परमात्मा मिलने को आतुर हो जाता है। जब कोई फूल खिलता है आनंद का, तो ऊपर से अनुग्रह की वर्षा होने लगती है। वह खिली हुई फूल की पंखुड़ियों पर अमृत बरसने लगता है प्रभु के प्रसाद का। आनंद में मन खिल जाता है फूल की तरह।

इसलिए तो जिन्होंने भी अनुभव किया है परम आनंद का, वे कहेंगे कि मस्तिष्क में सहस्रदल कमल खिल जाता है। वह प्रतीक है, सिंबालिक है। वह केवल काव्य में प्रकट किया गया अनुभव है। मस्तिष्क के ऊपर खिल जाता है फूल हजारों पंखुड़ियों वाला; उस खिले हुए फूल में बरसा होने लगती है अनुग्रह की।

और जब कोई उतने आनंद से भरता है, तो परमात्मा को धन्यवाद दे पाता है। कहना चाहिए, धन्यवाद देने के लिए परमात्मा को स्वीकार कर पाता है। अनुग्रह फिर किसके प्रति प्रकट करे? जब भीतर आनंद की वर्षा होने लगे और हृदय का कोना-कोना नाच उठे और अंधकार विदा हो जाए और पंखुड़ी-पंखुड़ी खिल जाए, फिर धन्यवाद किसके प्रति प्रकट करे? उस धन्यवाद को प्रकट करने के लिए परमात्मा को खोजना पड़ता है।

आनंद से भरा चित्त आस्तिक हो जाता है; दुख से भरा चित्त नास्तिक हो जाता है। नास्तिकता ग्रेविटेशन है। जमीन की ताकत नीचे की तरफ खींचती है। आस्तिकता ग्रेस, प्रसाद है, अनुग्रह है; ऊपर की तरफ ले जाता है।

गीता दर्शन 

ओशो 

संसार को दोष मत दो

27 April, 2017 - 06:05

मन
संसार को दोष मत दो ! अपने मन को समझो।
मन ही तुम्हारा असली संसार है।
लेकिन मन की तो हम चिंता नहीं करते, मन को तो लिए फिरते है, मन को तो सजाते है, संसार को गालियां देते है।
संसार जिसने तुम्हारा कुछ भी बिगाड़ा नहीं।
यह वृक्षों का संसार, यह चांद - तारों का संसार, ये आकाश में सूरज ये बदलियां, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
यह विराट की अदभुत लीला, इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा ?
इसको गाली देते हो, कहते हो, यह सब माया।
और भीतर तुम्हारे जो माया का मूल स्रोत है, तुम्हारी कल्पनाओं का जाल, तुम्हारी आकांक्षाओं का जाल, तुम्हारी तृष्णाओं का अनंत - अनंत फैलाव, उसको गटके बैठे हो।
उसको उगलो, उसको थूको, वही है भूल।
मैं तुम्हारे मन को संसार कहता हूं।
|| ओशो ||

सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें

27 April, 2017 - 06:05

सुबह उठते ही पहली बात, कल्पना करें कि तुम बहुत प्रसन्न हो। बिस्तर से प्रसन्न-चित्त उठें-- आभा-मंडित, प्रफुल्लित, आशा-पूर्ण-- जैसे कुछ समग्र, अनंत बहुमूल्य होने जा रहा हो। अपने बिस्तर से बहुत विधायक व आशा-पूर्ण चित्त से, कुछ ऐसे भाव से कि आज का यह दिन सामान्य दिन नहीं होगा -- कि आज कुछ अनूठा, कुछ अद्वितीय तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है;  वह तुम्हारे करीब है। इसे दिन-भर बार-बार स्मरण रखने की कोशिश करें।  सात दिनों के भीतर तुम पाओगे कि तुम्हारा पूरा वर्तुल, पूरा ढंग, पूरी तरंगें बदल गई हैं।

जब रात को तुम सोते हो तो कल्पना करो कि तुम दिव्य के हाथों में जा रहे हो…जैसे अस्तित्व तुम्हें सहारा दे रहा हो, तुम उसकी गोद में सोने जा रहे हो। बस एक बात पर निरंतर ध्यान रखना है कि नींद के आने तक तुम्हें कल्पना करते जाना है ताकि कल्पना नींद में प्रवेश कर जाए, वे दोनों एक दूसरे में घुलमिल जाएं।

किसी नकारात्मक बात की कल्पना मत करें, क्योंकि जिन व्यक्तियों में विधायक  कल्पना करने की क्षमता होती है, अगर वे ऐसी कल्पना करते हैं तो वह वास्तविकता में बदल जाती है। अगर तुम कल्पना करते हो कि तुम दिव्य शक्ति से भरपूर आनंद पूर्ण उत्सव पूर्ण हो तो तुम तुरंत ही खुशी आनंद सब तरह की विधायक शक्तियो के लिए खुल जाते हो। तुम्हारी कल्पना उसे साकार कर देगी।

तो जब भी कोई नकारात्मक विचार आए तो उसे एकदम सकारात्मक सोच में बदल दें। उसे नकार दें, छोड़ दें उसे, फेंक दें उसे।

एक सप्ताह के भीतर तुम्हें अनुभव होने लगेगा कि तुम बिना किसी कारण के प्रसन्न रहने लगे हो— बिना किसी कारण..........

 ओशो  

संस्कार

27 April, 2017 - 06:05

माता-पिता के संस्कार (कंडीशनिंग) दुनिया में सबसे बड़ी गुलामी है। यदि बच्चे का पालन-पोषण गलत ढंग से होता है तो सारी मानवता गलत हो जाती है। बच्चा बीज है। शुभ-आकांक्षाओं से भरे लोगों द्वारा, शुभ-कामनाओं से भरे लोगों द्वारा यदि बीज को ही जहरीला और भ्रष्ट कर दिया जाए, तब मुक्त व्यक्ति की कोई आशा नहीं बचती। भय यह है कि यदि बच्चे को प्रारंभ से संस्कार मुक्त रखा जाए तो वह इतना प्रतिभावन होगा, वह इतना सजग और सचेत होगा कि उसकी सारी जीवन शैली विद्रोही की होगी। और कोई भी विद्रोही नहीं चाहता; सभी आज्ञाकारी लोग चाहते हैं। 
 
माता-पिता आज्ञाकारी बच्चे को प्रेम करते हैं। लेकिन याद रखो, विद्रोही बच्चा प्रतिभावान है। विद्रोही बच्चे को सम्मान या प्रेम नहीं मिलता। शिक्षक उसे प्रेम नहीं करते, समाज उन्हें सम्मान नहीं देता। उसे दबाया जाता है। 
 
जिनियस बहुत ही कम होते हैं, इसलिए नहीं कि जिनियस बहुम कम पैदा होते हैं। जिनियस बहुत कम होते हैं क्योंकि समाज के संस्कारों की प्रक्रिया से बचकर निकलना बहुत कठिन है! सिर्फ कभी-कभार ही कोई बच्चा इस पकड़ से छूट पाता है। 
 
यदि बच्चे को उसकी निजता को विकसित करने में सहायता दी जाए बगैर दूसरों के अवरोधों के, हमारी दुनिया बहुत सुंदर होगी। तब हमारे यहां बहुत सारे बुद्ध, बहुत सारे सुकरात और बहुत सारे जीसस होंगे। हमारे यहां महानतम विविध जिनियस होंगे।

OSHO 
—Zen: Zest Zip Zap and Zing, Talk #14

शुभ लक्षण है, चिंता की कोई बात नहीं है।

27 April, 2017 - 06:05

पहला प्रश्‍न:
हर बार बोलने के बाद ऐसा अनुभव होता है कि मैंने बेईमानी की; चुप रहने पर ही अपने साथ ईमानदारी, पूरी ईमानदारी करती मालूम होती हूं। ऐसा क्यों है?

 शुभ लक्षण है, चिंता की कोई बात नहीं है।
      बोलते ही दूसरा महत्वपूर्ण हो जाता है। बोलते ही मन वही बोलने लगता है जो दूसरे को प्रीतिकर हो। बोलते ही मन शिष्टाचार, सभ्यता की सीमा में आ जाता है। बोलते ही हम स्वयं नहीं रह जाते, दूसरे पर दृष्टि अटक जाती है। इसलिए बोलना और ईमानदार रहना बड़ा कठिन है। बोलना और प्रामाणिक रहना बड़ा कठिन है। अच्छा है, इतनी समझ आनी शुरू हुई। शुभ लक्षण है। ज्यादा से ज्यादा चुप रहना उचित है। पहली कला चुप होने की सीखनी पड़ेगी। उतना ही बोलो जितना अत्यंत अनिवार्य हो। जिसके बिना चल जाता हो उसे छोड़ दो, उसे मत बोलो। और तुम अचानक पाओगे कि नब्बे प्रतिशत से ज्यादा तो व्यर्थ का है, न बोलते तो कुछ हर्ज न था, बोल के ही हर्ज हुआ।

      बड़े विचारक पैस्कल ने कहा है कि दुनिया की नब्बे प्रतिशत मुसीबतें कम हो
जाएं, अगर लोग थोड़े चुप रहें। झगड़े—फसाद कम हो जाएं, उपद्रव कम हो जाएं, अदालतें कम हो जाएं, अगर लोग थोड़े चुप रहें।
      जमीन का बहुत सा उपद्रव बोलने के कारण है; बोले कि फंसे। बोलने से एक सिलसिला शुरू होता है।
      सारी बात मौन सीखने की है। मौन प्रामाणिक होगा। क्योंकि मौन में दूसरे की मौजूदगी नहीं है; झूठे होने की कोई जरूरत नहीं है। बोलने में झूठ बोला जाता है। मौन में झूठ का क्या सवाल है? मौन तो सच होगा ही। जब चुप हो, तो दूसरे से मुक्त हो; जब बोलते हो, दूसरे की परिधि में आ गए। जैसे ही बोले कि समाज शुरू हुआ। अकेले हो, चुप हो, तो बस आत्मा है।
             एस धम्‍मो सनंतनो--(प्रवचन--026)

प्रत्येक व्यक्ति अलग इंद्रिय से मरता है।

27 April, 2017 - 05:29

यह जानकर तुम हैरान होओगे कि प्रत्येक व्यक्ति अलग इंद्रिय से मरता है। किसी की मौत आंख से होती है, तो आंख खुली रह जाती है—हंस आंख से उड़ा। किसी की मृत्यु कान से होती है। किसी की मृत्यु मुंह से होती है, तो मुंह खुला रह जाता है। अधिक लोगों की मृत्यु जननेंद्रिय से होती है, क्योंकि अधिक लोग जीवन में जननेंद्रिय के आसपास ही भटकते रहते हैं, उसके ऊपर नहीं जा पाते। तुम्हारी जिंदगी जिस इंद्रिय के पास जीयी गई है, उसी इंद्रिय से मौत होगी। औपचारिक रूप से हम मरघट ले जाते हैं किसी को तो उसकी कपाल—क्रिया करते हैं, उसका सिर तोड़ते हैं। वह सिर्फ प्रतीक है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु उस तरह होती है। समाधिस्थ व्यक्ति की मृत्यु सहस्रार से होती है।

जननेंद्रिय सबसे नीचा द्वार है। जैसे कोई अपने घर की नाली में से प्रवेश करके बाहर निकले। सहस्रार, जो तुम्हारे मस्तिष्क में है द्वार, वह श्रेष्ठतम द्वार है। जननेंद्रिय पृथ्वी से जोड़ती है, सहस्रार आकाश से। जननेंद्रिय देह से जोड़ती है, सहस्रार आत्मा से। जो लोग समाधिस्थ हो गए हैं, जिन्होंने ध्यान को अनुभव किया है, जो बुद्धत्व को उपलब्ध हुए हैं, उनकी मृत्यु सहस्रार से होती है।

उस प्रतीक में हम अभी भी कपाल—क्रिया करते हैं। मरघट ले जाते हैं, बाप मर जाता है, तो बेटा लकड़ी मारकर सिर तोड़ देता है। मरे—मराए का सिर तोड़ रहे हो! प्राण तो निकल ही चुके, अब काहे के लिए दरवाजा खोल रहे हो? अब निकलने को वहां कोई है ही नहीं। मगर प्रतीक, औपचारिक, आशा कर रहा है बेटा कि बाप सहस्रार से मरे; मगर बाप तो मर ही चुका है। यह दरवाजा मरने के बाद नहीं खोला जाता, यह दरवाजा जिंदगी में खोलना पड़ता है। इसी दरवाजे की तलाश में सारे योग, तंत्र की विद्याओं का जन्म हुआ। इसी दरवाजे को खोलने की कुंजियां हैं योग में, तंत्र में। इसी दरवाजे को जिसने खोल लिया, वह परमात्मा को जानकर मरता है। उसकी मृत्यु समाधि हो जाती है। इसलिए हम साधारण आदमी की कब्र को कब्र कहते हैं, फकीर की कब्र को समाधि कहते हैं—समाधिस्थ होकर जो मरा है।

प्रत्येक व्यक्ति उस इंद्रिय से मरता है, जिस इंद्रिय के पास जीया। जो लोग रूप के दीवाने हैं, वे आंख से मरेंगे; इसलिए चित्रकार, मूर्तिकार आंख से मरते हैं। उनकी आंख खुली रह जाती है। जिंदगी—भर उन्होंने रूप और रंग में ही अपने को तलाशा, अपनी खोज की। संगीतज्ञ कान से मरते हैं। उनका जीवन कान के पास ही था। उनकी सारी संवेदनशीलता वहीं संगृहीत हो गई थी। मृत्यु देखकर कहा जा सकता है—आदमी का पूरा जीवन कैसा बीता। अगर तुम्हें मृत्यु को पढ़ने का ज्ञान हो, तो मृत्यु पूरी जिंदगी के बाबत खबर दे जाती है कि आदमी कैसे जीया; क्योंकि मृत्यु सूचक है, सारी जिंदगी का सार—निचोड़ है—आदमी कहां जीया.........

कहै वाजिद पुकार, प्रवचन-७  

 ओशो  

शरीर और आत्मा जब साथ-साथ हों,

26 April, 2017 - 06:05

मैं हमेशा ऐसा अनुभव क्यों करता हूं, जैसे कि मेरा एक हिस्सा दूसरे हिस्से के विरुद्ध लड़ रहा है? मनुष्य का इतिहास एक अत्यंत दुखद घटना रहा है, और इसके दुखद होने का कारण समझना बहुत कठिन नहीं है। उसे खोजने के लिए तुम्हें ज्यादा दूर जाना न पड़ेगा, वह प्रत्येक व्यक्ति में मौजूद है। मनुष्य के पूरे अतीत ने मनुष्य में एक विभाजन पैदा कर दिया है, हर आदमी के भीतर निरंतर एक शीत युद्ध चल रहा है। यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है, तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है। तुम्हारी बीमारी सामाजिक है। और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है, वह है: तुम्हें दुश्मनों के दो खेमों में बांटना-भौतिकवादी और अध्यात्मवादी, जोरबा और बुद्ध। वस्तुतः तुम बंटे हुए नहीं हो। वास्तविकता यह है कि तुम अखंड हो - एक स्वर में, एक लय में आबद्ध। लेकिन तुम्हारे मन में यह संस्कार गहरा बैठा है कि तुम एक नहीं हो, अखंड नहीं हो, पूर्ण नहीं हो। तुम्हें अपने शरीर के खिलाफ लड़ना होगा। यदि आध्यात्मिक होना चाहते हो तो तुम्हें अपने शरीर को हर संभव तरीके से जीतना पड़ेगा, उसे हराना पड़ेगा, उसे सताना और नष्ट करना पड़ेगा। पूरी दुनिया में यह धारणा स्वीकृत रही है। विभिन्न धर्मों में, विभिन्न संस्कृतियों में उसके रंग-रूप भिन्न- भिन्न हो सकते हैं, किंतु आधारभूत सिद्धांत वही है- मनुष्य को विभाजित करो, उसमें संघर्ष पैदा करो, जिससे एक हिस्सा श्रेष्ठ अनुभव करने लगे, पवित्र बन जाए, पुण्यात्मा बन जाए, और दूसरे हिस्से की पापी की तरह निंदा करना शुरू कर दे। मगर कठिनाई यह है कि तुम एक हो, तुम्हें खंडित करने का कोई उपाय नहीं है। हर विभाजन तुम में दुख पैदा करने वाला है। विभाजन का अर्थ होगा कि तुम्हारी आत्मा का आधा भाग, दूसरे आधे भाग से लड़ रहा है। और यदि तुम स्वयं के भीतर लड़ रहे हो, तो कैसे विश्राम को उपलब्ध होओगे? पूरी की पूरी मनुष्यता अब तक स्किजोफ्रेनिक ढंग से, खंडित-मानसिकता में जीती रही है। प्रत्येक व्यक्ति टुकड़ों में, खंडों में तोड़ दिया गया है। तुम्हारे धर्म, तुम्हारे दर्शनशास्त्र, तुम्हारे सिद्धांत, घाव भरने वाले नहीं, वरन घाव करने के साधन रहे हैं-वे अंतर्युद्ध और संघर्ष के कारण रहे हैं। तुम खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारते रहे हो। तुम्हारा दायां हाथ, बाएं हाथ को चोट पहुंचाता है, बायां हाथ, दाएं हाथ को घायल करता है, और अंतत: तुम्हारे दोनों हाथ लहूलुहान हो जाते हैं। पश्चिम ने चार्वाक को चुना, जोरबा को चुना। विक्षिप्तता से बचने का दूसरा रास्ता न था-एक हिस्से को पूर्णतः नष्ट करना पड़ा । पश्चिम ने मनुष्य के आंतरिक सत्य को, उसकी चेतना को अस्वीकार कर दिया-आदमी केवल शरीर है, कहीं कोई आत्मा नहीं है-खाओ, पीओ, और मौज करो, बस यही एकमात्र धर्म है।

यह मन की शांति पाने का एक उपाय था, संघर्ष से बाहर आने का, एक निर्णय और निष्कर्ष पर पहुंचने का-क्योंकि यह स्वीकृत हो गया कि तुम एक हो-केवल पदार्थ, केवल शरीर। ऊपर-ऊपर से देखो तो ऐसा लगता है कि पूरब और पश्चिम अलग-अलग चीजें कर रहे हैं, किंतु गहराई से समझो तो वे एक ही चीज कर रहे हैं। सचाई यह है कि वे एक होने का बौद्धिक रूप से प्रयास कर रहे हैं। क्योंकि "दो' होने का मतलब है निरंतर बेचैनी में, सतत संघर्ष में होना; इससे बेहतर है कि "दूसरे' का ख्याल ही भूल जाओ। इसी संदर्भ में तुम्हें यह स्मरण दिलाना महत्वपूर्ण होगा कि आधुनिक विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि पदार्थ का होना एक भ्रम है। पदार्थ का अस्तित्व नहीं है, वह केवल दिखाई देता है। वे इस निष्पत्ति पर एक बिलकुल भिन्न मार्ग से पहुंचे हैं- पदार्थ का सूक्ष्म अन्वेषण करते हुए उन्होंने पाया कि जैसे-जैसे पदार्थ में गहरे जाते हैं, वैसे-वैसे उसकी भौतिकता; उसका पदार्थ-पन कम से कम होता जाता है, और परमाणु के बाद एक ऐसा बिंदु आता है जहां कोई पदार्थ नहीं बचता, सिर्फ इलेक्ट्रॉन रह जाते हैं, जो विद्युत कण हैं, वे पदार्थ नहीं, सिर्फ ऊर्जा तरंगें हैं। पश्चिमी प्रतिभा को केवल पदार्थ के साथ काम करने की छूट थी। पूरब में प्रतिभा के लिए पहली चुनौती थी-अंतर्यात्रा। सिर्फ द्वितीय श्रेणी के लोगों ने, मध्यम कोटि के लोगों ने बाहरी सांसारिक चीजों के लिए श्रम किया। जो वास्तव में बुद्धिमान थे, उन्होंने सदा ध्यान की दिशा में गति की। धीरे-धीरे दूरी बढ़ती गई। पश्चिम भौतिकवादी हो गया-इसकी पूरी जिम्मेवारी ईसाई चर्च की है, और पूर्वीय मनुष्यता अधिक से अधिक अध्यात्मवादी हो गई। प्रत्येक व्यक्ति में जो विभाजन, जो विखंडन किया गया था; वही विस्तृत पैमाने पर पूरब और पश्चिम का विभाजन बन गया। एक महान कवि ने लिखा है: "पूरब" पूरब है; और "पश्चिम" पश्चिम है; और दोनों कभी नहीं मिलेंगे। और इस कवि रुडयार्ड किपलिंग की पूरब में अत्यधिक रुचि थी। वह कई वर्षों तक भारत में रहा-वह सरकारी नौकरी में था। पर इस भेद को देख कर-कि संपूर्ण पूर्वीय चेतना भीतर गति करती है, और पश्चिमी चेतना बहिर्मुखी है...वे कैसे मिल सकते हैं? मेरा पूरा काम रुडयार्ड किपलिंग को गलत सिद्ध करना है। मैं कहना चाहूंगा कि न पश्चिम पश्चिम है; न पूरब पूरब है-वे दोनों पहले से ही मिले हुए हैं। न कोई पूरब है, न कोई पश्चिम है। उनके दृष्टिकोण बहुत भिन्न रहे लेकिन वे समझे जा सकते हैं। मेरी दृष्टि यह है, मेरा सारा प्रयास यह है कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर एक सेतु निर्मित हो, ताकि तुम एक हो जाओ, पूर्ण हो जाओ। देह से दुश्मनी न करो, वह तुम्हारा घर है। अपनी आत्मा से शत्रुता न साधो, क्योंकि बिना चेतना के हो सकता है तुम्हारा घर खूब सजा-धजा हो, पर वह खाली मकान होगा - बिना मालिक के - सूना।

शरीर और आत्मा जब साथ-साथ हों, तो एक सौंदर्य पैदा होता है-एक पूर्ण जीवन! एक भरा-पूरा जीवन!! प्रतीक रूप में मैंने शरीर के लिए जोरबा को और आत्मा के लिए बुद्ध को चुना है। चाहे मैं जोरबा के विषय में कहूं, या बुद्ध के बारे में बोलूं, मेरे प्रत्येक वक्तव्य में वे दोनों ही स्वतः समाहित हो जाते हैं, क्योंकि मेरे लिए वे अभिन्न हैं। यह सिर्फ बल देने की बात है कि किस पर ज्यादा जोर देना है। जोरबा केवल शुरुआत है। यदि तुम अपने जोरबा को पूर्णरूपेण अभिव्यक्त होने की स्वीकृति देते हो, तो तुम्हें कुछ बेहतर, कुछ उच्चतर, कुछ महत्तर सोचने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। वह मात्र वैचारिक चिंतन से पैदा नहीं हो सकता, वह तुम्हारे अनुभव से जन्मेगा- क्योंकि वे छोटे-छोटे, क्षुद्र अनुभव उकताने वाले हो जाएंगे। गौतम बुद्ध स्वयं इसीलिए बुद्ध हो पाए, क्योंकि वे जोरबा की जिंदगी खूब अच्छी तरह जी चुके थे। पूरब ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि उनतीस वर्षों तक बुद्ध इस तरह जीए, जैसा कोई जोरबा कभी न जीया होगा। गौतम बुद्ध के पिता ने पूरे राज्य की सारी सुंदर लड़कियों को एकत्रित करके बुद्ध के भोग-विलास की व्यवस्था की थी। उन्होंने भिन्न-भिन्न ऋतुओं के लिए, अलग-अलग जगहों पर तीन शानदार महल बनवाए। उनके पास सुंदर बाग-बगीचे और झीलें थीं। बुद्ध का पूरा जीवन सुख-सुविधा संपन्न था, शुद्ध भोग-विलास था! पर उससे वे उकता गए, और यह प्रश्न उनके मन में महत्वपूर्ण होने लगा कि क्या यही सब कुछ है? फिर मैं कल के लिए क्यों जीए जा रहा हूं। जीवन का कुछ अर्थ, कुछ और अभिप्राय होना चाहिए, अन्यथा जीवन सारहीन है। बुद्धत्व की खोज प्रारंभ होती है-जोरबा को भरपूर जी लेने से। हर आदमी बुद्ध नहीं हो पाता, उसका मूल कारण है कि जोरबा अनजीया रह जाता है। मेरा तर्क देखते हो न! मैं कहता हूं कि जोरबा को जी भर के, पूर्णता से जी लो, तो तुम स्वाभाविक ढंग से बुद्ध के जीवन में प्रवेश कर जाओगे। अपने शरीर का सुख लो, अपने पार्थिव अस्तित्व को भोगो, इसमें कोई पाप नहीं है। इसके पर्दे में, इसके पीछे छिपा है तुम्हारा आध्यात्मिक विकास, तुम्हारा आत्मिक आनंद! जब तुम भौतिक सुखों से थक जाओगे, केवल तब तुम पूछोगे, "क्या इसके अतिरिक्त कुछ और भी है?" स्मरण रहे, यह प्रश्न मात्र बुद्धिगत नहीं हो सकता, इसे अस्तित्वगत होना पड़ेगा। "क्या कुछ और भी है?" जब यह प्रश्न अस्तित्वगत होगा, तभी तुम अपने भीतर वह "कुछ और" उपलब्ध कर पाओगे। निश्चित ही बहुत कुछ और भी है। जोरबा तो केवल शुरुआत है। एक बार बुद्धत्व की ज्योति जल जाए, जागरण की आभा तुम्हारी आत्मा पर फैल जाए, तब तुम जानोगे कि सांसारिक सुख छाया भी न था... वहां इतना अधिक आनंद है, परमानंद! लेकिन वह आनंद सुख के विपरीत नहीं है। वस्तुतः वह सुख ही है जो तुम्हें इस आनंद तक ले आया है। जोरबा और बुद्ध के बीच में कोई संघर्ष नहीं है, कोई झगड़ा नहीं है। जोरबा तीर का निशान है, एक संकेत है - यदि तुम उस दिशा में ठीक से अनुसरण करो, तो बुद्ध तक पहुंच जाओगे।

ओशो

बियांड एनलाइटनमेंट, #7

भीतर के आकाश में रमने लगे

26 April, 2017 - 06:05

जो व्यक्ति अपने साथ बहुत
आनंद अनुभव करता है,
दूसरे उसके साथ बड़ा आनंद पाएँगे। 

तुम तो अपने साथ ही परेशान हो,
तुम दूसरों के साथ उनको भी
परेशान ही करोगे। करोगे क्या?
तुम उनको उबा रहे हो,
वे तुमको उबा रहे हैं।
वे तुम्हारी सुन रहे हैं,
क्योंकि उनको
अपनी कहनी है।
तुम भी अपने एकांत से
घबड़ाकर भाग आए हो,
वे भी अपने एकांत से
घबड़ाकर भाग आए हैं।

समझदार वही है,
जो अपने भीतर जीने की
सुविधा बनाने लगे,
अपने भीतर के
आकाश में रमने लगे;
क्योंकि वहीं तुम्हारे
प्राणों का प्राण है,
वहीं तुम्हारा जीवन-स्रोत है,
वहीं तुम्हारा उद्गम है,
वहीं तुम्हारा अंत है,
वहीं है मंदिर,
वहीं है विराजमान प्रभु -- अगर कहीं है, वहीं सबकुछ है। उसको जिसने गँवाया, सब गँवाया। उसे जिसने पाया,
सब पाया।

एस धम्मो सनंतनो~

ओशो.....

परमात्मा प्रति क्षण हो रहा है

14 April, 2017 - 05:00

दुनिया में दूसरे धर्म हैं, जो भारत के बाहर पैदा हुए: ईसाइयत, यहूदी, इस्लाम, वे तीन बड़े धर्म भारत के बाहर रौदा हुए हैं। तीन बड़े धर्म भारत में पैदा हुए हैं: हिंदू, बौद्ध,जैन। इन दोनों के बीच एक बुनियादी फर्क है। और वह बुनियादी फर्क है कि यहूदी,ईसाई और इस्लाम परमात्मा को पीछे देखते हैं—आदि कारण की तरह—जिसने जगत को बनाया। हम परमात्मा को आगे देखते हैं—अंतिम फल की तरह। इससे बड़ा फर्क पड़ता है। परमात्मा भविष्य है, अतीत नहीं। परमात्मा बीज नहीं है, फूल है। इसलिए हमने बुद्धों को फूल पर बिठाया है कमल का फूल, सहस्रदल जिसके खिल गये हैं।

अगर परमात्मा पीछे है, दुनिया को उसने बनाया, तो वह एक है। तब दुनिया एक तरह की तानाशाही होगी। और इस दुनिया में मोक्ष घटित नहीं हो सकता; क्योंकि स्वतंत्रता कैसी जब तुम बनाये गये हो। बनाये हुए की कोई स्वतंत्रता होती है? जिस दिन बनानेवाला मिटाना चाहेगा, मिटा देगा। जब वह बना सका तो मिटाने में क्या बाधा पड़ेगी? तब तुम खेल—खिलौने हो, कठपुतलियां हो। तब तुम्हारी आत्‍मा और स्वतन्‍त्रता का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए हम परमात्मा को स्रष्टा की तरह नहीं देखते,हम परमात्मा को अंतिम निष्पत्ति की तरह देखते हैं। वह तुम्हारा अंतिम विकास है।

तो परमात्मा विकास का प्रथम चरण नहीं, अंतिम शिखर है। वह गौरीशंकर है। वह कैलाश है। वह आखिरी शिखर है जहां सभी चेतनाएं अंततः पहुंच जायेगी, जिस तरफ सभी की यात्रा चल रही है। देर अबेर सभी को वहां पहुंच जाना है। तुम रोज रोज हो रहे परमात्मा हो।

तो परमात्मा कोई एक घटना नहीं है जो घट गयी; परमात्मा एक प्रवाह है जो प्रतिपल घट रहा है। परमात्मा प्रति क्षण हो रहा है। वह तुम्हारे भीतर बढ़ रहा है। तुम परमात्मा के गर्भ हो।

इसलिए यह शिव सूत्र पूरा होता है इस अंतिम बात पर। यहीं सारे शास्त्र पूरे होते हैं। तुमसे शुरू होते हैं, परमात्मा पर पूरे होते हैं। तुम जैसे अभी हो, वह पहला चरण है;तुम जैसे अंततः हो जाओगे, वह अंतिम चरण है। बीज की तरह तुम हो, वह तुम्हारा भटकाव है, वृक्ष की तरह तुम जब खिल जाओगे अपनी समग्रता में, वह तुम्हारी निष्पत्ति है, वह तुम्हारा फुलफिलमेंट है; तुम्हारा आप्तकाम होना है, सब पूरा हो गया।

फूल जब खिलता है तो वृक्ष के प्राण पूरे हो गये। उसके खिलने में वृक्ष ने अपनी पूरी सुगंध पा ली। वृक्ष जिस चीज के लिए पैदा हुआ था, वह घटित हो गया। फूल के खिलने के साथ वृक्ष एक नृत्य से भर जाता है। उसका रोआं—रोआं पुलकित है। वह व्यर्थ नहीं गया, सार्थक हुआ, फलीभूत हुआ; सुगंध, सौंदर्य उसमें खिल गये!

और जब एक वृक्ष एक फूल के खिलने पर इतना आनंदित होता है, जो कि क्षणभर टिकेगा और गिर जायेगा; जो फूल अभी खिला और सांझ के पहले मुरझा जायेगा! कितना आनंद है कि जब कोई वर्द्धमान 'महावीर' होता है—जब फूल खिलता है, जब कोई गौतम सिद्धार्थ 'बुद्ध' होता है—जब फूल खिलता है! और ऐसा फूल जो कभी नहीं मुरझायेगा, उस फूल को ही हम शिवत्व कहते हैं। वही परमात्मा है।

तुम्हारे भीतर परमात्मा को छिपाये तुम चल रहे हो; सम्हाल कर चलना, सावधानी से चलना। जैसे गर्भणी सी संभल कर चलती है, वैसा साधक संभलकर चलता है। क्योंकि तुम्हारे ही जीवन का सवाल नहीं है, तुम्हारे भीतर सारे अस्तित्व ने दांव लगाया है। सारा अस्तित्व तुम्हारे भीतर खिलने को आतुर है। उत्तरदायित्व बहुत बड़ा है, बहुत सावधानी से, संभलकर, होशपूर्वक एक—एक कदम रखना, क्योंकि तुमसे परमात्मा का जन्म होना है।

शिव सूत्र 

ओशो 

किसी पर प्रभुत्व करने के लिए ऊर्जा का उपयोग मत करो।

13 April, 2017 - 11:51

स्मरण रहे, किसी पर प्रभुत्व करने के लिए ऊर्जा का उपयोग मत करो।

 यही कारण है कि बुद्ध, महावीर, जीसस निरंतर कहते रहे, जोर देकर कहते रहे कि जिस क्षण तुम आध्यात्मिक खोज पर निकलो, सबके लिए—शत्रुओं के लिए भी—प्रेम से भरकर निकलो। अगर तुम प्रेम से भरे रहोगे तो तुम उस आंतरिक हिंसा के खिंचाव से बच जाओगे जो मालकियत करना चाहता है। उस आंतरिक हिंसा का एंटीडोट सिर्फ प्रेम है। अन्यथा जब तुम्हें ऊर्जा प्राप्त होगी, जब तुम ऊर्जा से भर जाओगे, तो तुम दूसरों पर मालकियत करने लगोगे।

ऐसा रोज होता है; ऐसे अनेक लोग मेरे संपर्क में आए हैं। उन्हें मैं मदद देता हूं वे थोड़ी प्रगति करते हैं। और ज्यों ही उन्हें लगता है कि उन्हें ऊर्जा मिली, वे झट दूसरों पर प्रभुत्व जमाने लगते हैं। वे अब इस ऊर्जा का उपयोग करने लगते हैं।

ध्यान रहे, दूसरों पर प्रभुत्व करने के लिए आध्यात्मिक ऊर्जा का उपयोग मत करो। तुम नाहक अपनी शक्ति नष्ट करोगे। देर—अबेर तुम फिर चुक जाओगे, रिक्त हो जाओगे। और सहसा फिर तुम्हारा पतन हो जाएगा। और यह शुद्ध अपव्यय है।

लेकिन जब तुम्हें लगता है कि अब मैं कुछ कर सकता हूं तो अपने पर अंकुश रखना कठिन होता है। अगर तुम किसी बीमार को छूते हो और वह तुम्हारे छूते ही स्वस्थ हो जाता है तो अब तुम दूसरों को छूने से अपने को कैसे रोकोगे? अब तुम अपने को बस में न रख सकोगे। और बस में न रख सकोगे तो तुम ऊर्जा का अपव्यय करोगे। तुम्हें कुछ घटित हुआ है; लेकिन तुम जल्दी ही उसे गंवा दोगे और नाहक गंवा दोगे।

और मनुष्य का मन इतना चालाक है कि तुम सोच सकते हो कि मैं दूसरों का उपचार कर रहा हूं, दूसरों की मदद कर रहा हूं। वह मन की महज चालाकी हो सकती है। अगर तुम्‍हारे दिल में प्रेम नहीं है तो तुम दूसरों की बीमारी, दूसरों के स्वास्थ्य की फिक्र नहीं कर सकते। तुम्हें इससे कुछ मतलब नहीं है। सच तो यह है कि तुम्हें शक्ति मिल गई है और उपचार के जरिए तुम दूसरों पर प्रभुत्व पैदा करना चाहते हो। तुम भले कहते होओ कि मैं उनकी मदद कर रहा हूं; लेकिन तुम मदद के नाम पर दूसरों पर आधिपत्य जमा रहे हो। और उससे तुम्हारा अहंकार तृप्त होगा; वह तुम्हारे अहंकार के लिए भोजन बन जाएगा।

इसलिए सभी पुराने धर्मग्रंथ सावधान करते हैं। वे कहते हैं कि सावधान रहो; क्योंकि जब शक्ति आती है तो तुम एक खतरनाक जगह पर पहुंच जाते हो। तुम उसे फेंक दे सकते हो, गंवा दे सकते हो। इसलिए जब शक्ति प्राप्त हो तो उसे गुप्त ही रखो, उसके बारे में किसी को कुछ मत जानने दो।

जीसस ने कहा है कि अगर तुम्हारा दाहिना हाथ कुछ करे तो उसे बाएं हाथ को भी मत जानने दो। सूफी संत परंपरा में वे कहते हैं कि जब शक्ति आने लगे तो दूसरों के सामने प्रार्थना भी मत करो, दूसरों के सामने मस्जिद भी मत जाओ। क्यों? क्योंकि जब शक्ति के आने पर कोई प्रार्थना करता है और बहुत लोगों की मौजूदगी में करता है तो दूसरों को तुरंत पता चलने लगता है कि कुछ हो रहा है। तो सूफी कहते हैं कि तब तुम्हें रात के अंधेरे में, आधी रात में अपनी नमाज कहनी चाहिए जब सब सोए हों और किसी को पता न चले कि तुम्हें कुछ हो रहा है। किसी को बताओ भी मत कि तुम्हें क्या हो रहा है।

लेकिन मन बहुत बकवादी है। अगर तुम्हें कुछ घटित होगा तो तुम तुरंत दूसरों को इसका शुभ समाचार देने निकल पड़ोगे। लेकिन तभी चूक हो जाएगी। यह शक्ति का अपव्यय होगा। और अगर लोग तुमसे प्रभावित भी होंगे तो तुम्हें उसकी वाहवाही मिलेगी, और कुछ भी नहीं। वह कोई बढ़िया सौदा नहीं है।

अभी रुको। एक क्षण आएगा जब तुम्हारी ऊर्जा संगृहीत हो जाएगी, जब वह अखंड हो जाएगी, रूपांतरित हो जाएगी, तब तुम्हारे आस—पास तुम्हारे कुछ किए बिना ही बहुत कुछ घटित होगा। जब तुम अपने मालिक हो जाओगे तभी तुम दूसरों को अपना मालिक बनने में सहयोग दे सकोगे।

#-का सोवे दिन रैन
ओशो 

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