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Updated: 10 hours 27 min ago

मशरूम की खेती बनी फायदे का सौदा

22 February, 2018 - 12:41

किसान मशरूम की खेती कर कम लागत में लाखों का मुनाफा कमा सकते हैं। इस वक्त जिले में आठ बडे़ फार्म मशरूम की खेती कर रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि सही जानकारी हो तो किसान थोड़ी सी जगह में लाखों रुपए का मुनाफा ले सकते हैं। बागवानी विभाग भी मशरूम की खेती को बढ़ावा देने के लिए शिविर लगाकर किसानाें को प्रशिक्षित करता है। मशरूम की खेती करने वाले किसानों का भी कहना है कि थोडे़ समय में मशरुम की खेती से सब्जियों के मुकाबले ज्यादा फायदा होता है।पांच साल से मशरूम की खेती कर रहे आसन निवासी मनोज का कहना है कि उन्होंने अधिकतर सब्जियों की खेती करके देख ली है, लेकिन जो फायदा मशरूम की खेती में है वह किसी अन्य फसल में नहीं है। 
ऐसे होती है मशरूम की खेती
मशरूम की खेती करने में सबसे पहले शैड बनाए जाते हैं और उन्हें पूरी तरह से बंद रखा जाता है। इन शैडों में दो फुट लंबी व तीन फुट चौड़ी प्लेट रखी जाती है। एक प्लेट में चार से पंाच किलो मशरूम की पैदावार की जा सकती है। प्लेट के हिसाब से जगह तैयार की जाती है। इसके लिए किसी पुराने मकान में या छप्पर डालकर शैड तैयार किए जा सकते हैं, जो बिल्कुल बंद होते हैं। मशरूम की बिजाई के लिए गेहूं के भूसे को सड़ाकर उसकी काम्पेक्ट खाद बनाई जाती है जो प्लेटों में भरकर शैड के अंदर रखी जाती है। उसमें एक सप्ताह तक कार्बन डाईऑक्साइड गैस तैयार हो जाती है। बाद में इसे निकाल कर उसमें मशरूम का बीज (सपान) डाला जाता है। शैड का तापमान 18 से 20 डिग्री सेल्सियस रखा जाता है और बिजाई के बाद रोजाना फव्वारों से पानी का छिड़काव किया जाता है। 
जिला उद्यान विभाग के अधिकारी दीपक कुमार ने बताया कि मशरूम की खेती का अनुकूलन समय सितंबर व अक्तूबर माह होता है। इस दौरान कम्पेक्ट तैयार कर सपान की बिजाई कर दी जाती है और यह खेती तीन से चार माह में तैयार हो जाती है। 

कई बीमारियों में लाभदायक है मशरूम
मशरूम सब्जी ही नहीं बल्कि कई बीमारियों की रामबाण दवा भी साबित होती है। मेडिसन के वरिष्ठ डाक्टक हरीश शर्मा का कहना है कि मशरूम में प्रोटीन सबसे अधिक होता है और इसमें शूगर की मात्रा बिल्कुल नहीं होती। दिल व शूगर के मरीजों के लिए यह फायदेमंद है।

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जामुन की खेती कैसे करें

22 February, 2018 - 12:27

लीची के फल अपने आकर्षक रंग, स्वाद और गुणवत्ता के कारण भारत ही नहीं बलिक विश्व में अपना विशिष्ट स्थान बनाये हुये हैं इसमें प्रचुर मात्राा में कैल्शियम पाया जाता है। इसके अलावे प्रोटीन, खनिज पदार्थ, फास्फोरस, विटामिन-सी इत्यादि पाये जाते हैं। इसका उपयोग डिब्बा बंद, स्क्वैश, कार्डियल, शिरप, आर.टी.एस., रस, लीची नट इत्यादि बनाने में किया जाता है। लीची को भी सघन बागवानी के रूप में सफलतापूर्वक लगाया जा सकता है, परन्तु इसकी खेती के लिए विशिष्ट जलवायु की आवश्यकता होती है, जो देश के कुछ ही क्षेत्रों में है। अत: इसकी खेती बहुत ही सीमित भू-भाग में की जा रही है। देश में लीची की बागवानी सबसे अधिक बिहार में ही की जाती है। इसके अतिरिक्त देहरादून की घाटी उत्तर प्रदेश के तरार्इ क्षेत्र तथा झारखण्ड के छोटानागपुर क्षेत्र में की जाती है। फलों की गुणवत्ता के आधार पर अभी तक उत्तरी बिहार की लीची का स्थान प्रमुख है।

 

भूमि की तैयारी

भूमि की तैयारी परम्परागत बाग लगाने के जैसे ही होता है। रेखांकन में अंतर रहता है क्योंकि सघन बागवानी में पौधे से पौधे एवं कतार से कतार की दूरी परम्परागत बागवानी के अपेक्षा कम होती है। इसे भी आम के तरह 5 × 5 मीटर पर लगाया जा सकता है।

पौधा रोपण

यह कार्य भी परम्परागत बागवानी के तरह किया जाता है। पौध लगाने का उत्तम समय जून और जुलाई का महिना है ।पौधे से पौधे और लाइन से लाइन कि दूरी भूमि कि उपजाऊ शक्ति के अनुसार 10 से 12 मीटर रखनी चाहिए । मई से जून के प्रथम सप्ताह तक 10 से 12 मीटर कि दूरी पर एक मीटर व्यास और एक मीटर गहराई के गड्ढ़े खोदकर 8 से 15 दिनों तक खुले रहने चाहिए । तत्पश्चात मिटटी व अच्छी सड़ी हुई गोबर कि खाद - बराबर बराबर मात्रा में लेकर कम से 2 ग्राम आर्गेनिक खाद मिश्रण डालकर गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये और उसमे पुन किलो : मिटटी व खाद का मिश्रण डालकर भर दिया जाये कम । दोवारा भरने के बाद भी सिंचाई आवश्यक है ।ताकि गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये तत्पश्चात जुलाई में पौधा का रोपण किया जा सकता है ।यदि खेत कि मिटटी चिकनी हो तो खेत कि मिटटी खाद व बालू रेत बराबर - बराबर मात्रा में मिला देना चाहिए .

सावधानियां

जैसा कि ऊपर पहले ही बताया जा चुका है कि लीची के पौधों में मृत्यु दर बहुत अधिक होती है । इसलिए रोपाई करते समय निम्न सावधानियां रखना आवश्यक है -

  1. खेत में केवल वही पौधे लगाये जाये तो पेड़ से गुटी काटने के बाद कम से कम 6 से 8 माह तक गमलो में अथवा भूमि में लगाये गए हो क्योंकि लीची कि गुटी पेड़ से अलग होने के पश्चात् बहुत कम अधिक जीवित रह पाती है । और कभी - कभी तो 60 प्रतिशत तक मर जाती है । इस प्रकार पुराने पौधे भी खेत में लगाने के बाद शत प्रतिशत जीवित नहीं रह पाते है ।
  2. जहाँ तक संभव हो लीची के दो वर्ष के पौधे खेत में लगाये जाना चाहिए, इससे कम पौधे मरेंगे ।
  3. रोपाई के समय पौधे को गड्ढ़े में रखकर उसके चारों और खाली जगह में बारीक़ मिटटी डालकर इतना पानी डाल देना चाहिए कि गड्ढ़ा पानी से भर जाये । इससे मिटटी नीचे बैठ जाएगी और खाली हुए गड्ढ़े में : पुन बारीक़ मिटटी डालकर गड्ढ़े को जमीन कि सतह तक भर देना चाहिए ।
  4. पेड़ के चारों और मिटटी डालकर मिटटी को हाथ से नहीं दबाना चाहिए क्योंकि इससे : प्राय पौधे कि मिटटी का खोल पिंडी टूट जाती है । जिससे पौधे कि जड़ टूट जाती है । और पौधा मर जाता है । इसलिए मिटटी को पानी द्वारा उपरोक्त विधि से सेट कर भर देना चाहिए ।
  5. लीची का नया बाग लगने हेतु गड्ढ़ों को भरते समय जो मिटटी व खाद आदि का मिश्रण बनाया जाता है उसमे लीची के बाग़ कि मिटटी अवश्य मिला देना चाहिए क्योंकि लीची कि जड़ों में एक प्रकार कि कवक जिसे माइकोराइजा कहते है पाई जाती है । इस कवक द्वारा पौधे अच्छी प्रकार - फलते फूलते हैऔर नए पौधे में भी कवक अथवा लीची के बाग़ कि मिटटी मिलाने से मृत्युदर कम हो जाती है ।

रोपाई के बाद पौधों कि रोपाई के बाद निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए ताकि पौधों में म्रत्यु दर कम हो सके और पौधे अच्छी प्रकार फल फुल सके ---

  • पौधों के थालों में नमी बनी रहनी चाहिए वर्षा न होने कि स्थिति में नए पौधों के थाले सूखने नहीं चाहिए । दुसरे अधिक वर्षा कि स्थिति में थालो में पानी रुकना नहीं चाहिए।
  • सर्दियों में पाले से बचाना आवश्यक है जिसके लिए 10 के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए दिन प्रति । गर्मियों में लू से बचाने के लिए प्रति सप्ताह सिंचाई करते रहना चाहिए।
  • प्रारंभिक अवस्था में में पौधों को पाले और लू से बचने के लिए पौधों को पूर्व कि ओर से खुला छोड़कर शेष तीनो दिशाओं में पुवाल , गन्ने कि पत्तियों और बॉस कि खप्पचियों अथवा अरहर आदि कि डंडियों कि मदद से ढ़क देना चाहिए
  • सूर्य कि तेज धुप से बचाने के लिए तनों को चुने के गाढ़े घोल से पोत देना चाहिए ।
  • उत्तर - पश्चिम व दक्क्षिण दिशा में जमौआ या शीशम आदि का सघन वृक्ष रोपण वायु अवरोधक के रूप में किया जाना चाहिए ।
  • फलत वाले पेड़ों में सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर और गर्मियों में फल बनने के पश्चात् लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए जल्दी जल्दी सिंचाई करते रहना चाहिए इस समय पानी कि कमी नहीं होना चाहिए। अन्यथा झड़ने और फटने का डर रहता है ।

सिंचार्इ

नये पौधों में थोड़ा-थोड़ा पर जल्दी-जल्दी सिंचार्इ की आवश्यकता होती है। अत: शुरू के दो वर्षों तक वर्षा शुरू होने से पहले सप्ताह में एक बार अच्छी सिंचार्इ करनी चाहिए।

कटार्इ-छँटार्इ

सघन बागवानी के अंतर्गत लीची के पेड़ों में फल क्षेत्र को बढ़ाना, वृक्ष उँचार्इ का प्रबंध इत्यादि प्रमुख है। अत: शुरूआत से ही वृक्ष को उचित आकार प्रदान करना तथा फलदार वृक्ष में फल तुड़ार्इ के बाद शाखाओं की छँटार्इ करना काफी महत्वपूर्ण है। लीची में एक साल के पौधों कीे 40-50 सेमी पर शीर्ष कटिंग किया जाना चाहिए। यह कार्य अगस्त सितम्बर में करना चाहिए। कटिंग के तुरंत बाद बोरडेक्स मिश्रण या कापर आक्सीक्लोराइड का लेप लगाना चाहिए। सशक्त तथा अच्छी दूरी वाले बाहरी प्ररोहों को मुख्य शाखा का गठन करने दिया जाए। मुख्य शाखा के साथ क्रोचेज बना रही सभी शाखाओं की छँटार्इ कर इसे नियमित आकार देना चाहिए। जब वृक्ष फलन में आ जाए तब फल तुड़ार्इ के समय 25-30 सेमी लम्बी फल-शाखाओं को हटा देना चाहिए। इस प्रकार 2-3 नए सिरे विकसित होंगे जिसके फलस्वरूप अगले मौसम में फलदार शाखाएँ विकसित होती है।

पोषण प्रबंधन

प्रारम्भ के 2-3 वर्षों तक लीची के पौधों को 30 किग्रा सड़ी हुर्इ गोबर की खाद 2 किग्रा करंज की खल्ली, 200 ग्राम यूरिया, 150 ग्राम सि.सु।फास्फेट तथा 150 ग्राम म्यूरेट आफ पोटाश प्रति पौधा प्रति वर्ष की दर से देना चाहिए। तत्पश्चात पौधों की बढ़वार के साथ-साथ खाद की मात्रा में वृद्धि करते जाना चाहिए। पूरी खाद एवं आधे उर्वरकों को जून तथा शेष उर्वरकों को सितम्बर में वृक्ष के छत्राक के नीचे गोलार्इ में देकर अच्छी तरह से मिला देना चाहिए। खाद देने के बाद सिंचार्इ अवश्य करनी चाहिए।

जिन बगीचों में जिंक की कमी के लक्षण दिखार्इ दे उनमें 150-200 ग्राम जिंक सल्फेट प्रति वृक्ष की दर से सितम्बर माह में देना लाभकारी पाया गया है।

समस्याएँ एवं निदान

फलों का फटना : फल विकसित होने के समय भूमि में नमी की कमी और तेज गर्म हवाओं से फल अधिक फटते हैं, यह समस्या फल विकास की द्वितीय अवस्था में आती है। जिसका सीधा संबंध भूमि में जल स्तर तथा नमी संधारण की क्षमता से भी है। इससे बचने के लिए भूमि में नमी बनाए रखने के लिए अप्रैल के प्रथम सप्ताह से फलों के पकने एवं उनकी तुड़ार्इ तक बाग की हल्की सिंचार्इ एवं पौधों पर जल छिड़काव करना चाहिए। यह भी देखा गया है कि अप्रैल में पौधों पर 10 पी.पी.एम., एन.ए.ए।एवं 0.4 प्रतिशत बोरेक्स के छिड़काव से भी फलों के पफटने की समस्या कम होती है।

लीची की मकड़ी और लीची माइट : मकड़ी के नवजात एवं वयस्क दोनों ही कोमल पत्तियों की निचली सतह, टहनियों तथा पुष्पवृन्त से चिपक कर लगातार रस चूसते हैं जिससे पत्तियाँ मोटी, लेदरी होकर मुड़ जाती है अैर उन पर मखमली रूआँ-सा निकल जाता है जो बाद में भूरे या काले रंग में परिवर्तित हो जाता है तथा पत्ती में गडढे बन जाते हैं। इसके निराकरण के लिए फल तुड़ार्इ के बाद जून में ग्रसित पत्तियों एवं टहनियों को काटकर जला देना चाहिए। सितम्बर-अक्टूबर में नर्इ कोपलों के आगमन के समय कैल्पेन 0.05 प्रतिशत या नुवान के घोल का 7-10 दिन के अंतराल पर दो छिड़काव करना चाहिए।

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राजमा की खेती कैसे करें

19 February, 2018 - 13:11

राजमा की खेती रबी ऋतु में की जाती है। अभी इसके लिए उपयुक्त समय है। यह मैदानी क्षेत्रों में अधिक उगाया जाता है। राजमा की अच्छी पैदावार हेतु 10 से 27 डिग्री सेंटीग्रेट तापमान की आवश्यकता पड़ती है। राजमा हल्की दोमट मिट्टी से लेकर भारी चिकनी मिट्टी तक में उगाया जा सकता है।

राजमा उन्नतशील प्रजातियां है

राजमा में प्रजातियां जैसे कि पीडीआर 14, इसे उदय भी कहते है। मालवीय 137, बीएल 63, अम्बर, आईआईपीआर 96-4, उत्कर्ष, आईआईपीआर 98-5, एचपीआर 35, बी, एल 63 एवं अरुण है।

खेत की तैयारी

खरीफ की फसल के बाद खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा बाद में दो-तीन जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करनी चाहिए। खेत को समतल करते हुए पाटा लगाकर भुरभुरा बना लेना चाहिए इसके पश्चात ही बुआई करनी चाहिए।

- राजमा के बीज की मात्र 120 से 140 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर लगती है। बीजोपचार 2 से 2.5 ग्राम थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की मात्र के हिसाब से बीज शोधन करना चाहिए।

- राजमा की बुआई बुआई लाइनों में करनी चाहिएढ्ढ लाइन से लाइन की दूरी 30 से 40 सेंट मीटर रखते है, पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखते है। इसकी बुआई 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर करते हैं।

खाद एवं उर्वरकों का प्रयोग

राजमा के लिए 120 किलोग्राम नत्रजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस एवं 30 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर तत्व के रूप में देना आवश्यक है। नेत्रजन की आधी मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा बुआई के समय तथा बची आधी नेत्रजन की आधी मात्रा खड़ी फसल में देनी चाहिए। इसके साथ ही 20 किलोग्राम गंधक की मात्रा देने से लाभकारी परिणाम मिलते है। 20 प्रतिशत यूरिया के घोल का छिड़काव बुवाई के बाद 30 दिन तथा 50 दिन में करने पर उपज अच्छी मिलती है।

¨सचाई कब करनी चाहिए और कितनी मात्रा में करनी चाहिए

राजमा में 2 या 3 ¨सचाई की आवश्यकता पड़ती है। बुआई के 4 सप्ताह बाद प्रथम ¨सचाई हल्की करनी चाहिए। बाद में ¨सचाई एक माह बाद के अंतराल पर करनी चाहिए खेत में पानी कभी नहीं ठहरना चाहिए।

 

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जौ की खेती

19 February, 2018 - 12:57

जौ की खेती

भारत में जौ (बारले) की खेती प्राचीनकाल (9000 वर्ष पूर्व ) से होती आ रही है। भारत में धार्मिक रूप से जौ  का विशेष महत्व है । चैत्र प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष के प्रारंभ के साथ ही बड़े नवरात्र शुरू होते हैं। ये नौ दिन माता की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्रि में देवी की उपासना से जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं और  उन्ही में से एक है नवरात्रि पर घर में जवारे या जौ लगाने की। नवरात्रि में जवारे इसलिए लगाते हैं क्योंकि माना जाता है कि जब शृष्टि की शुरूआत हुई थी तो पहली फसल जौ ही थी। इसलिए इसे पूर्ण फसल कहा जाता है। यह हवन में देवी-देवताओं को चढ़ाई जाती है । बसंत ऋतु  की पहली फसल  जौ ही होती हैं भारत की धान्य फसलों में  गेहूँ के बाद दूसरा स्थान जौ का आता है। प्राचीन काल से ही जौ का प्रयोग मनुष्यों के लिए भोजन तथा जानवरों के दाने के लिए किया जा रहा है। हमारे देश मे जौ का प्रयोग रोटी बनाने के लिए शुद्ध रूप मे और चने के साथ मिलाकर बेझर के रूप में किया जाता है। जौ और चना को भूनकर पीसकर सत्तू के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा जौ का प्रयोग माल्ट बनाने में किया जाता है जिससे बीयर एवं व्हिस्की का निर्माण किया जाता है। आमतौर पर  जौ का प्रयोग जानवरों के चारे व दाने तथा मुर्गी पालन हेतु उत्तम दाने के लिए किया जाता है। जौ के दाने में 11.12 प्रतिशत प्रोटीन, 1.8 प्रतिशत फाॅस्फोरस, 0.08 प्रतिशत कैल्सिश्म तथा 5 प्र्रतिशत रेशा पाया जाता है। जौ खाद्यान  में बीटा ग्लूकॉन की अधिकता और ग्लूटेन की न्यूनता जहाँ एक ओर मानव रक्त में कोलेस्ट्रॉल स्तर को कम करता है, वही दूसरी ओर सुपाच्यता व शीतलता प्रदान करता है। इसके सेवन से पेट सबंधी गड़वड़ी , वृक में पथरी बनना तथा आंतो की गड़वड़िया दूर होती है। आज जौ का सबसे ज्यादा उपयोग पर्ल बारले, माल्ट, बियर , हॉर्लिक्स , मालटोवा टॉनिक,दूध मिश्रित बेवरेज आदि बनाने में बखूबी से किया जा रहा है। मानव स्वस्थ्य के लिए बेहद उपयोगी इस खाद्यान्न फसल की सबसे बड़ी खूबी यह है की इसकी खेती कम पानी, सीमित खाद एवं उर्वरक एवं सभी तरह की भूमियों  में लहलहाती रहती है। वर्तमान जलवायु  परिवर्तन का इस फसल की बढ़वार एवं उत्पादन पर ख़ास फरक नहीं पड़ता है यानी कृषि जलवायु की कठिन परिस्थितियों में भी इसे सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है।

उपयुक्त जलवायु            
जौ शीतोष्ण  जलवायु की फसल है लेकिन उपोष्ण  जलवायु में भी इसकी खेती सफलतापूर्वक की जाती है। गेहूँ की अपेक्षा जौ की फसल प्रतिकूल वातावरण  अधिक सहन  कर सकती है।  इसलिए  उत्तर प्रदेश के पूर्वी नम और  गर्म भागों  में जहाँ गेहूँ की पैदावार ठीक नहीं होती है, जौ की फसल अच्छी होती है । बोने के समय इसे नम, बढ़वार  के समय ठंडी और फसल पकने के समय सूखा  तथा  अधिक तापमय शुष्क वातावरण की आवश्यकता होती है । फसल वृद्धि के समय 12 से 15 डिग्री  सेंटीग्रेडे तापक्रम तथा पकने के समय 30 डिग्री  सेंटीग्रेडे तापक्रम की आवयकता पड़ती है। जौ की खेती 60 से 100 सेमी. वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। इसकी जलमाँग कम होने के कारण सूखा ग्रस्त  क्षेत्रों के लिए यह उपयुक्त फसल है। नमी अधिक होने पर (विशेषकर पकने से पहले¨) रोगों  का प्रकोप अधिक होता है । जौ  सूखे के प्रति गेहूँ से अधिक सहनशील है, जबकि पाले  का प्रभाव इस फसल पर अधिक होता है ।
भूमि का चयन​
 जौ की खेती लगभग सभी   प्रकार की मिट्टियो में की जा सकती है परन्तु इसके लिए अच्छे जल निकास वाली  मध्यम दोमट मिट्टी जिसकी मृदा अभिक्रिया 6.5 से 8.5 के मध्य हो, सर्वोत्तम होती है। भारत में जौ की खेती अधिकतर रेतीली भूमि में कि जाती है। चूने की पर्याप्त  मात्रा वाली मृदाओं में जौ  की बढवार अच्छी होती है । इसमें क्षार सहन करने की शक्ति गेहूँ से अधिक होती है इसलिये इसे कुछ क्षारीय (ऊसर) भूमि में भी सफलता पूर्वक जा सकता है ।
भूमि की तैयारी

 जौ  के लिए गेहूँ की भाँति खेत  की तैयारी की आवश्यकता नहीं होती  है ।  खरीफ की फसल काटने के पश्चात् खेत में मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करने के बाद 3 - 4 बार देशी हल से जुताइयाँ करनी चाहिए। प्रत्येक जुताई के बाद पाटा चलाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए। इससे भूमि मे नमी संरक्षण भी होता है। भारी मृदाओ में बखर चलाकर भी खेत तैयार किया जाता है। भूमि की बारीक ज¨त ह¨ने पर फसल अच्छी आती है ।
खाद एवं उर्वरक

फसल की प्रति इकाई पैदावार बहुत कुछ खाद एवं उर्वरक की मात्रा  पर निर्भर करती है । जौ  में हरी खाद, जैविक खाद एवं रासायनिक खाद का प्रयोग किया जाता है । खाद एवं उर्वरक की मात्रा जौ  की किस्म, सिंचाई की सुविधा, बोने की विधि आदि कारकों पर निर्भर करती है।अच्छी उपज लेने के लिए  भूमि में कम से कम 35-40 क्विंटल गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद  50 किलो ग्राम नीम की खली और 50 किलो अरंडी की खली आदि इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर खेत में बुवाई से पहले इस मिश्रण को समान मात्रा में बिखेर लें  इसके बाद खेत में अच्छी तरह से जुताई कर खेत को तैयार करें इसके उपरांत बुवाई करें 

रासायनिक खेती की दशा में

जौ से अधिकतम उपज लेने के लिए बोआई की परिस्थिति के अनुसार खाद एवं उर्वरक का प्रयोग किया जाना चाहिए। सिंचित समय से बोआई हेतु 60 किग्रा. नत्रजन, 30 किग्रा. फाॅस्फोरस और 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना चाहिए। असिंचित (बारानी) दशा में 30 किग्रा. नत्रजन, 20 किग्रा. फाॅस्फोरस और 20 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर देना उचित रहता है। सिंचित दशा में नत्रजन की आधी मात्रा तथा फाॅस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय कूड़ में 8 - 10 सेमी. की गहराई पर बीज के नीचे देनी चाहिए। शेष आधी नत्रजन को दो बराबर भाग में बाँटकर पहली व दूसरी सिंचाई के समय देना लाभप्रद रहता है। असिंचित दशा में तीनों उर्वरकों को बोआई के समय कूड़ में दिया जाना चाहिए।
 सिंचाई                     
 जौ   को  गेहूँ की अपेक्षा कम पानी की आवश्यकता होती है परन्तु  अच्छी उपज लेने के लिए 2 - 3 सिंचाइयाँ की जाती है। पहली सिंचाई फसल में कल्ले फूटते समय  (बोने के 30 - 35 दिन बाद), दूसरी बोने के 60 - 65 दिन बाद व तीसरी सिंचाई बालियों में दूध पड़ते समय  (बोने के 80 - 85 दिन बाद) की जानी चाहिए। दो सिंचाई का पानी उपलब्ध होने पर पहली सिंचाई कल्ले फूटते समय बोआई  के 30 - 35 दिन बाद व दूसरी पुष्पागम  के समय की जानी चाहिये। यदि सिर्फ एक ही सिंचाई का पानी उपलब्ध है तब कल्ले फूटते समय (बोआई के 30 - 35 दिन बाद) सिंचाई करना आवश्यक है। प्रति सिंचाई 5 - 6 सेमी. पानी लगाना चाहिए। दूध पड़ते समय सिंचाई शान्त मौसम में करनी चाहिए क्योंकि इस समय फसल के गिरने का भय रहता है। जौ के खेत में जल निकासी का भी उचित प्रबन्ध आवश्यक है।
खरपतवार नियंत्रण
               जौ में प्रायः निराई-गुड़ाई की आवश्यकता नहीं होती है। सिंचित दशा में खरपतवार नियंत्रण हेतु नीदनाशक दवा 2,4-डी सोडियम साल्ट (80%) या 2,4-डी एमाइन साल्ट (72%) 0.75 किग्रा. प्रति हेक्टेयर को 700-800 लीटर पानी में घोलकर बोआई के 30 - 35 दिन बाद कतार में छिड़काव करना चाहिए, इससे । इससे चैड़ी पत्ती वाले खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। मंडूसी और जंगली जई के नियंत्रण के लिए आइसोप्रोटुरान  75   डव्लू पी 1 किग्रा या पेंडीमेथालिन (स्टोम्प) 30 ई सी 1. 5 किग्रा प्रति हेक्टेयर को 600 - 800 ली. पानी मे घोलकर बोआई के 2 -3 दिन बाद  छिड़काव करना चाहिए।
फसल चक्र     
              आमतौर पर जौ  के लिए वे सभी फसल चक्र अच्छे रहते है, जो  गेहूँ के लिए  उपयुक्त होते है । सामान्यतौर  पर खरीफ की  सभी फसलें  यथा धान, मक्का, ज्वार, बाजरा, मूंगफली, मूंग आदि के उपरांत जो  की फसल ली जा सकती है । रबी की सभी फसलें (गेहूँ, चना, मटर, सरसों  आदि ) के साथ जौ  की मिलवां या अंतरफसली खेती  की जा सकती है । असिंचित क्षेत्रों में जौ  को  प्रायः चना, मटर या मसूर के साथ ही मिलाकर ब¨या जाता है ।

 

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करेले की खेती कैसे करें

19 February, 2018 - 12:42

करेले की शंकर बीज की बुवाई करने के लिए बलुई दोमट या दोमट मिट्टी होनी चाहिए। खेत समतल तथा उसमें जल निकास व्‍यवस्‍था के साथ सिंचाई की समुचित व्‍यवस्‍था होनी चाहिए। करेले को गर्मी और वर्षा दोनो मौसम में उगाया जा सकता है। फसल में अच्‍छी बढवार, फूल व फलन के लिए 25 से 35 डिग्री सें ग्रेड का ताप अच्‍छा होता है। बीजों के जमाव के लिए 22 से 25 डिग्री सें.ग्रेड का ताप अच्‍छा होता है।

करेले के बीज की बुवाई करने से 25-30 दिन पहले 25-30 टन गोबर की खाद या कम्‍पोस्‍ट खाद को एक हैकटेयर खेत में मिलाना चाहिए। बुवाई से पहले नालियों में 50 किलो डीएपी, 50 किलो म्‍यूरेट आफ पोटास का मिश्रण प्रति हैक्‍टेयर के हिसाब से (500 ग्राम प्रति थमला) मिलाऐं। 30 किलो यूरिया बुवाई के 20-25 दिन बाद व 30 किलो यूरिया 50-55 दिन बाद पुष्‍पन व फलन के समय डालना चाहिए। यूरिया सांय काल मे जब खेत मे अच्‍छी नमी हो तब ही डालना चाहिए।

बीज की मात्रा व बुआई

करेले का 500 ग्राम बीज प्रति एकड़ पर्याप्‍त होता है। पौध तैयार करके बीज फसल लगाने पर बीज मात्रा मे कमी की जा सकती है। बुवाई से पहले बीजों को बाविस्‍टीन (2 ग्रा प्रति किलो बीज दर से) के घोल में 18-24 घंटे तक भिगोये तथा बुवाई के पहले निकालकर छाया में सुखा लेना चाहिए। बीज 2 से 3 इंच की गहराई पर करना चाहिए।

फसल अंतरण

नाली से नाली की दूरी 2 मी., पौधे से पौधे की दूरी 50 सेंमी तथा नाली की मेढों की ऊंचाई 50 सेंमी रखनी चाहिए। नालीयां समतल खेत में दोनो तरफ मिट्टी चढ़ाकर बनाऐं। खेत मे 1/5 भाग मे नर पैतृक तथा 4/5 भाग में मादा पैतृक की बुआई अलग अलग खण्‍डो में करनी चाहिए।

फसल के लिए मजबूत मचान बनाएं और पौधों को उस पर चढांए जिससे फल खराब नहीं होते हैं 

फल तुड़ाई व बीज निकालना

फल पकने पर फल चमकीले नारंगी रंग के हो जाते हैं। फल को तभी तोड़ना चाहिए जब फल का कम से कम दो तिहाई भाग नारंगी रंग का हो जाये क्‍योकि कम पके फल में बीज अल्‍प विकसीत रहते हैं। अधिक पकने पर फल फट जाते हैं और बीज का नुकसान होता है।

Category: खेती

कटहल की खेती कैसे करें और कब

16 February, 2018 - 14:40

कटहल की खेती

कटहल का पौधा एक सदाबहार, 8-15 मी. ऊँचा बढ़ने वाला, फैलावदार एवं घने क्षेत्रकयुक्त बहुशाखीय वृक्ष होता है जो भारत को देशज है। भारत वर्ष में इसकी खेती पूर्वी एवं पश्चिमी घाट के मैदानों, उत्तर-पूर्व के पर्वतीय क्षेत्रों, संथाल परगना एवं छोटानागपुर के पठारी क्षेत्रों, बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बंगाल के मैदानी भागों में मुख्य रूप से की जाती है। कटहल के वृक्ष की छाया में कॉफी, इलाइची, काली मिर्च, जिमीकंद हल्दी, अदरक इत्यादि की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है।

स्वाद एव पौष्टिकता की दृष्टि से कटहल का फल अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके फल बसंत ऋतु से वर्षा ऋतु तक उपलब्ध होते हैं। बसंत ऋतु में जब प्राय: सब्जी की अन्य प्रजातियों का अभाव रहता है, कटहल के छोटे एवं नवजात मुलायम फल एक प्रमुख एवं स्वादिष्ट सब्जी के रूप में प्रयोग किये जाते हैं। जैसे-जैसे फल बड़े होते जाते है इनमें गुणवत्ता का विकास होता जाता है एवं परिपक्व होने पर इसके  फलों में शर्करा, पेक्टिन, खनिज पदार्थ एवं विटामिन ‘ए’ का अच्छा विकास होता है। कटहल के फल एवं बीज में पाये जाने वाले विभिन्न पोषक तत्वों को नीचे की सारणी में दिया गया है:

पोषक तत्व

(प्रति 100 ग्राम)

कच्चे फल

पके फल

बीज

नमी (प्रतिशत)

84.0

77.2

64.5

कार्बोहाइड्रेड (ग्रा.)

9.4

18.9

25.8

प्रोटीन (ग्रा.)

2.6

1.9

6.6

कुल खनिज पदार्थ

0.9

0.8

1.2

कैल्शियम (मि.ग्रा.)

50.0

20.0

21.0

फ़ॉस्फोरस  (मि.ग्र.)

97.0

30

20.1

लौह तत्व (मि.ग्रा.)

1.5

500.0

20.1

विटामिन ‘ए’ (आइ.यू.)

0.0

540.0

17.0

थायमिन (मि.ग्रा.)

0.3

30.0

17.0

भूमि एवं जलवायु

कटहल के पौधे लगभग सभी प्रकार के भूमि में पनप जाते हैं परन्तु अच्छी जल निकास की व्यवस्था वाली गहरी दोमट मिट्टी इसके बढ़वार एवं पैदावार के लिए उपयुक्त होती है। मध्यम से अधिक वर्षा एवं गर्म जलवायु वाले क्षेत्र कटहल के खेती के लिए उपयुक्त होते है। यह देखा गया है कि छोटानागपुर एवं संथाल परगना तथा आस-पास के क्षेत्रों की टांड जमीन जिसमें मृदा पी.एच.मान सामान्य से थोड़ा कम, संरचना हल्का तथा जल का निकास अच्छा है, कटहल की खेती के लिए उपयुक्त पायी गयी है।

उन्नत किस्में

कटहल एक परपरागित फल वृक्ष होने तथा प्रमुखत: बीज द्वारा प्रसारित होने के कारण इसमें प्रचुर जैव विविधता है। अभी तक कटहल की कोई मानक प्रजाति का विकास नहीं हुआ था परन्तु फलन एवं गुणवत्ता का आधार पर विभिन्न शोध केन्द्रों द्वारा कटहल की कुछ उन्नतशील चयनित प्रजातियाँ इस प्रकार हैं:

संस्थान

विकसित प्रजातियाँ

बागवानी एवं कृषि-वानिकी

शोध कार्यक्रम, राँची

 

नरेन्द्र देव कृषि एवं

प्रौद्योगिकी वि.वि., फैजाबाद

केरल कृषि वि.वि., तिरुअनन्तपुरम

खजवा, स्वर्ण मनोहर, स्वर्ण पूर्ति (सब्जी के लिए)

एन.जे.-1, एन.जे.-2, एन.जे.-15 एवं एन.जे.-3

मत्तमवक्का

खजवा

इस किस्म के फल जल्दी पक जाते हैं। यह ताजे पके फलों के लिए एक उपयुक्त किस्म है।

स्वर्ण मनोहर

छोटे आकार के पेड़ में बड़े-बड़े एवं अधिक संख्या में फल देने वाली यह एक उम्दा किस्म हैं। इसके लगभग 15 वर्ष के पेड़ की ऊँचाई 5.5 मीटर, तने की मोटाई 86 सें.मी., क्षत्रक  फैलाव 25.4 वर्ग मी. तथा पेड़ का आयतन 71.2 घन मी. होता है। मध्यम घने क्षत्रक वाले इस किस्म में फरवरी के प्रथम सप्ताह में फल लग जाते हैं जिनको छोटी अवस्था में बेचकर अच्छी आमदनी प्राप्त की जा सकती है। फल लगने के 20-25 दिन बाद इसके एक पेड़ से 45-50 कि.ग्रा. फल सब्जी के लिए प्राप्त किया जा सकता है। इस किस्म के पूर्ण रूप से विकसित फल की लम्बाई 45.2 सें.मी., परिधि 70 से.मी. तथा वजन 15-20 कि.ग्रा. होता है। इसके कोये (फलैक्स) का आकार बड़ा (6.0 x 3.9 सें.मी.), संख्या अधिक (280-350 कोये/फल) तथा मिठास ज्यादा (20 डि. ब्रिक्स) होता है। यह किस्म छोटानागपुर एवं संथाल परगना तथा आस-पास के क्षेत्र के लिए अधिक उपयुक्त पाई गई है। इसकी प्रति वृक्ष औसत उपज 350-500 कि.ग्रा. (पकने के बाद) है।

स्वर्ण पूर्ति

यह सब्जी के लिए एक उपयुक्त किस्म है। इसका फल छोटा (3-4 कि.ग्रा.), रंग गहरा हरा, रेशा कम, बीज छोटा एवं पतले आवरण वाला तथा बीच का भाग मुलायम होता है। इस किस्म के फल देर से पकने के कारण लंबे समय तक सब्जी के रूप में उपयोग किये जा सकते हैं। इसके वृक्ष छोटे तथा मध्यम फैलावदार होते हैं जिसमें 80-90 फल प्रति वर्ष लगते हैं। फलों का आकार गोल एवं कोये की मात्रा अधिक होती है।

पौधा प्रसारण

कटहल मुख्य रूप से बीच द्वारा प्रसारित किया जाता है एक समान पेड़ तैयार करने के लिए वानस्पतिक विधि द्वारा पौधा तैयार करना चाहिए। वानस्पतिक विधि में कलिकायन तथा ग्रैफ्टिंग अधिक सफल पायी गयी है। इस विधि से पौध तैयार करने के लिए मूल वृंत की आवश्यकता होती है जिसके लिए कटहल के बीजू पौधों का प्रयोग किया जाता है। मूल वृंत को तैयार करने के लिए ताजे पके कटहल से बीज निकाल कर 400 गेज की 25x 12x 12 सें.मी. आकार वाली काली पॉलीथीन को थैलियों में बुआई करना चाहिए। थैलियों को बालू, चिकनी मिट्टी या बागीचे की मिट्टी तथा गोबर की सड़ी खाद को बराबर मात्रा में मिलाकर बुवाई से पहले ही भर देना चाहिए। चूँकि कटहल का बीज जल्दी ही सूख जाता है अत: उसे फल से निकालने के तुरन्त बाद थैलियों में 4-5 सें.मी. गहराई पर बुआई कर देना चाहिए। उचित देख-रेख करने से मूलवृंत लगभग 8-10 माह में बंडिंग/ग्रैफ्टिंग योग्य तैयार हो जाते है।

कटहल के पौधे को पैच बडिंग या क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग विधि द्वारा तैयार किया जा सकता है। पैच बडिंग के लिए मातृ वृक्ष से सांकुर डाली काटकर ले आते हैं जिससे 2-3 सें.मी. लम्बी कली निकाल कर मूलवृंत पर उचित ऊँचाई पर उसी आकार की छाल हटाकर बडिंग कर देते हैं। बडिंग के बाद कली को सफेद पालीथीन की पट्टी (100 गेज) से अच्छी तरह बांध देते हैं तथा मूलवृंत का ऊपरी भाग काट देते हैं। ग्रैफ्टिंग विधि से पौधा तैयार करने के लिए मातृ वृक्ष पर ही सांकुर डाली की पत्तियों को लगभग एक सप्ताह पहले पर्णवृंत छोड़कर काट देते हैं। जब पत्ती का पर्णवृंत गिरने लगे तब सांकुर डाली को काटकर ले आते है। मूलवृंत को उचित ऊँचाई पर काट देते हैं तथा उसके बीचो-बीच 3-4 सें.मी. लम्बा चीरा लगा देते हैं। सांकुर डाली के निचले भाग को दोनों तरफ से 3-4 सें.मी. लगा कलम बनाते हैं जिसे मूलवृंत के चीरे में घुसाकर 100 गेज मोटाई की सफेद पालीथीन की पट्टी से बांध देते है। छोटानागपुर क्षेत्र में बडिंग के लिए फरवरी-मार्च तथा ग्राफ्टिंग के लिए अक्टूबर-नवम्बर का महीना उचित पाया गया है।

पौधा रोपण एवं देखरेख

कटहल का पौधा आकार में बड़ा तथा अधिक फैलावदार होता है अत: इसे 10x 10 मी. की दूरी पर लगाया जाता है। पौध रोपण के लिए समुचित रेखांकन के बाद निर्धारित स्थान पर मई-जून के महीने में 1x 1x 1 मीटर आकार के गड्ढे तैयार किये जाते हैं। गड्ढा तैयार करते समय ऊपर की आधी मिट्टी एक तरफ तथा आधी मिट्टी दूसरी तरफ रख देते हैं। इन  गड्ढों को 15 दिन खुला रखने के बाद ऊपरी मिट्टी दूसरी तरफ रख देते हैं। इन गड्ढों को 15 दिन खुला रखने के बाद ऊपरी मिट्टी में 20-30 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद, 1-2 कि.ग्रा. करंज की खली तथा 100 ग्रा.एन.पी. के मिश्रण अच्छी तरह मिलाकर भर देना चाहिए। जब गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह दब जाये तब उसके बीचो-बीच में पौधे के पिण्डी के आकार का गड्ढा बनाकर पौधा लगा दें। पौधा लगाने के बाद चारों तरफ से अच्छी तरह दबा दें और उसेक चारों तरफ थाला बनाकर पानी दें। यदि वर्षा न हो रही हो तो पौधों को हर तीसरे दिन एक बाल्टी (15 लीटर) पानी देने से पौध स्थापना अच्छी होती है।

पौधा लगाने के बाद से एक वर्ष तक पौधों की अच्छी देख-रेख करनी चाहिए। पौधों के थालों में समय-समय पर खरपतवार निकाल कर निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। पौधों को जुलाई-अगस्त में खाद एवं उर्वरक तथा आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए। नये पौधों में 3 वर्ष तक उचित ढांचा देने के लिए काट-छांट करना चाहिए ढांचा देते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तने पर 1.5-2.0 मी. ऊँचाई तक किसी भी शाखा को नहीं निकलने दें। उसके ऊपर 3-4 अच्छी शाखाओं को चारों तरफ बढ़ाने देना चाहिए जो पौधों का मुख्य ढांचा बनाती हैं। कटहल के पौधों के मुख्य तनों एवं शाखाओं से निकलने वाले उसी वर्ष के कल्लों पर फल लगता है। अत: इसके पौधों में किसी विशेष काट-छांट की आवश्यकता नहीं होती है। फल तोड़ाई के बाद फल से जुड़े पुष्पवृंत टहनी को काट दें जिससे अगले वर्ष अच्छी फलत हो सके। पुराने पेड़ों पर पनपने वाले परजीवी जैसे बांदा (लोरेन्थस), सूखी एवं रोगग्रस्त शाखाओं को समय-समय पर निकालते रहना चाहिए।

खाद एवं उर्वरक

कटहल के पेड़ में प्रत्येक वर्ष फलन होती है अत: अच्छी पैदावार के लिए पौधे को खाद एवं उर्वरक पर्याप्त मात्रा में देना चाहिए। प्रत्येक पौधे को 20-25 कि.ग्रा. गोबर की सड़ी हुई खाद, 100 ग्रा. यूरिया, 200 ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 100 ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष की दर से जुलाई माह में देना चाहिए। तत्पश्चात पौधे की बढ़वार के साथ खाद की मात्रा में वृद्धि करते रहना चाहिए। जब पौधे 10 वर्ष के हो जाये तब उसमें 80-100 कि.ग्रा. गोबर की खाद, 1 कि.ग्रा. यूरिया, 2 कि.ग्रा. सिंगल सुपर फास्फेट तथा 1 कि.ग्रा. म्यूरेट ऑफ़ पोटाश प्रति वर्ष देते रहना चाहिए। खाद एवं उर्वरक देने के लिए पौधे के क्षत्रक के नीचे मुख्य तने से लगभग 1-2 मी. दूरी पर गोलाई में 25-30 सें.मी. गहरी खाई में खाद के मिश्रण को डालकर मिट्टी से ढक देना चाहिए।

पुष्पण एवं फलन

कटहल एक मोनोसियस पौधा है जिसमें नर एवं मादा पुष्पक्रम (स्पाइक) एक ही पेड़ पर परन्तु अलग-अलग स्थानों पर आते हैं। नर फूल, जिसकी सतह अपेक्षाकृत चिकनी होती है, नवम्बर-दिसम्बर में पेड़ की पतली शाखाओं पर आते हैं। ये फूल कुछ समय बाद गिर जाते हैं। मादा फूल मुख्य तने एवं मोटी डालियों पर जनवरी-फरवरी में आते है। मादा फूल अधिक ओजपूर्ण वृंत, जिसे ‘फुटस्टॉक’ कहते है, पर एकल एवं गुच्छे में आते हैं जिनके साथ नर पुष्प भी निकलते हैं। कटहल एक परपरागित फल है जिसमें परागण समकालीन नर पुष्प से ही होता है। यदि मादा फूल में समान परागण नहीं होता है तो फल विकास सामान्य नहीं होता है। परागण के पश्चात पुष्पक्रम का आधार, अंडाशय और द्लाभ एक साथ विकसित होकर संयुक्त फल का विकास होता है। फल जनवरी-फरवरी से जून-जुलाई तक विकसित होते रहते हैं। इसी समय में फल के अंदर बीज, कोया इत्यादि का विकास होता है और अंतत: जून-जुलाई में फल पकने लगते हैं।

परिपक्वता एवं उपज

कटहल के फलों को विकास के साथ कई प्रकार से उपयोग में लाया जाता है अत: इसकी परिपक्वता एवं तोड़ाई को उपयोग के आधार पर कई वर्गो में बांटा जा सकता है। अतिनवजात एवं मध्यम उम्र के फल, जिसे सब्जी के लिए प्रयोग किया जाता है, को उस समय तोड़ना चाहिए जब उसके डंठल का रंग गहरा हरा, गूदा कठोर और कोर मलायम हो। इसके साथ-साथ बाजार में मांग के आधार पर तोड़ाई को नियंत्रित कर सकते हैं। कटहल के पूर्ण विकसित फल पेड़ पर एवं तोड़ने के बाद भी पकते हैं। अत: ताजा फल खाने के लिए फलों को पूर्ण परिपक्वता पर तोड़ना चाहिए। साधारणत: फल लगने के 100-120 दिनों बाद तोड़ने लायक हो जाते हैं। इस समय तक डंठल तथा डंठल से लगी पत्तियों का रंग हल्का पीला हो जाता है। फल के ऊपर के कांटे विरल हो जाते हैं एवं काँटों का नुकीलापन कम हो जाता है। कटहल के कच्चे फल को छड़ी से मारने पर खट-खट एवं पके फल से धब-धब की आवाज आती है। फलों को किसी तेज चाक़ू से लगभग 10 सें.मी. डंठल के साथ तोड़ने से दूध का बहाव कम हो जाता है। तोड़ते समय फलों के सीधा जमीन पर गिरने से फल फट जाते है इसलिए फल के वृंत को रस्सी से बांध कर धीरे-धीरे नीचे सावधानीपूर्वक उतार कर किसी छायादार स्थान पर रखना चाहिए। फलों के आपस में रगड़ से छिलके के भूरे होने का भय रहता है जिससे फल की गुणवत्ता पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। कटहल के बीजू पौधे में 7-8 वर्ष में फलन प्रारम्भ होता है जबकि कमली पौधों में 4-5 वर्ष में ही फल मिलने लगते है। रोपण के 15 वर्ष बाद पौधा पूर्ण विकसित हो जाता है। ऐसा देखा गया है कि जिन वृक्षों में छोटे आकार के फल लगते हैं उनमें संख्या अधिक एवं जिन वृक्षों के फल का आकार बड़ा होता है उनमें फलों की संख्या कम होती है। एक पूर्ण विकसित वृक्ष से लगभग 150 से 250 कि.ग्रा. फल प्रति वर्ष प्राप्त होता है।

कीट रोग एवं नियंत्रण

तना वेधक

इस कीट के नवजात पिल्लू कटहल के मोटे तने एवं डालियों में छेद बनाकर नुकसान पहुँचाते हैं। उग्रता की अवस्था में मोटी-मोटी शाखायें सूख जाती हैं एवं फसल को प्रभावित करती है। इसके नियंत्रण के लिए छिद्र को किसी पतले तार से साफ़ करके नुवाक्रान का घोल (10 मि.ली./ली.) अथवा पेट्रोल या किरोसिन तेल के चार-पाँच बूंद रुई में डालकर गीली चिकनी मिट्टी से बंद कर दें। इस प्रकार वाष्पीकृत गंध के प्रभाव से पिल्लू मर जातें हैं एवं तने में बने छिद्र धीरे-धीरे भर जाते है।

गुलाबी धब्बा

इस रोग में पत्तियों को निचली सतह पर गुलाबी रंग का धब्बा बन जाता है जिससे प्रकाश संश्लेषण की क्रिया प्रभावित होती है और फल विकास सुचारू रूप से नहीं हो पाता। इसके नियंत्रण के लिए कॉपर जनित फफूंद नाशी जैसे कॉपर आक्सीक्लोराइड या ब्लू कॉपर के 0.3: घोल का पणीय छिड़काव करना चाहिए।

फल सड़न रोग

यह रोग राइजोपस आर्टोकार्पी नामक फफूंद के कारण होता है जिसमें नवजात फल डंठल के पास से धीरे-धीरे सड़ने लगते हैं। कभी-कभी विकसित फल को भी सड़ते हुए देखा गया है। इसके नियंत्रण के लिए फल लगने के बाद लक्षण स्पष्ट होते ही ब्लू कॉपर के 0.3: घोल का दो छिड़काव 15-20 दिनों के अंतराल पर करें।

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आलू की खेती कैसे करें

12 February, 2018 - 13:55

आलू भारत की सबसे महत्‍वपूर्ण फसल है। तमिलनाडु एवं केरल को छोडकर आलू सारे देश में उगाया जाता है। भारत में आलू की औसत उपज 152 क्विंटल प्रति हैक्‍टेयर है जो विश्‍व औसत से काफी कम है। अन्‍य फसलों की तरह आलू की अच्‍छी पैदावार के लिए उन्‍नत किस्‍मों के रोग रहित बीजो की उपलब्‍धता बहुत आवश्‍यक है। इसके अलावा उर्वरकों का उपयोग, सिंचाई की व्‍यवस्‍था, तथा रोग नियंत्रण के लिए दवा के प्रयोग का भी उपज पर गहरा प्रभाव पडता है।

भूमि एवं जलवायू सम्‍बंधी आवश्‍यकताऐं :

आलू की खेती के लिए जीवांश युक्‍त बलूई-दोमट मिट्टी ही अच्‍छी होती है। भूमि में जलनिकासी की अच्‍छी व्‍यवस्‍था होनी चाहिए । आलू के लिए क्षारीय तथा जल भराव अथवा खडे पानी वाली भूमि कभी ना चुने। बढवार के समय आलू को मध्‍यम शीत की आवश्‍यकता होती है। 

आलू की खेती के लिए उन्‍नत किस्‍म का बीज :

आलू की काश्‍त में सबसे महत्‍वपूर्ण बात यह है कि इसका बीज अच्‍छी श्रेणी का हो। अच्‍छे बीज विशेषकर रोगाणूमुक्‍त बीज का प्रयोग करके आलू की पैदावार बढाई जा सकती है। अच्‍छी उपज के लिए जलवायू खण्‍ड या क्षेत्र के अनुसार केवल सिफारिश की गई उपयुक्‍त किस्‍में ही चुने। 

उपयुक्‍त माप के बीज का चुनाव :

आलू के बीज का आकार और उसकी उपज से लाभ का आपस मे गहरा सम्‍बंध है। बडे माप के बीजों से उपज तो अधिक होती है परन्‍तु बीज की कीमत अधिक होने से पर्याप्‍त लाभ नही होता। बहूत छोटे माप का बीज सस्‍ता होगा परन्‍तु रोगाणुयुक्‍त आलू पैदा होने का खतरा बढ जाता है। प्राय: देखा गया है कि रोगयुक्‍त फसल में छोटै माप के बीजो का अनुपात अधिक होता है। इसलिए अच्‍छे लाभ के लिए 3 से.मी. से 3.5 से.मी.आकार या 30-40 ग्राम भार के आलूओंको ही बीज के रूप में बोना चाहिए। 

आलू बुआई का समय एवं बीज की मात्रा :

उत्‍तर भारत में, जहॉ पाला पडना आम बात है, आलू को बढने के लिए कम समय मिलता है। अगेती बुआई से बढवार के लिए लम्‍बा समय तो मिल जाता है परन्‍तु उपज अधिक नही होती क्‍योंकि ऐसी अगेती फसल में बढवार व कन्‍द का बनना प्रतिकूल तापमान मे होता है साथ ही बीजों के अपूर्ण अंकुरण व सडन का खतरा भी बना रहता है। अत: उत्‍तर भारत मे आलू की बुआई इस प्रकार करें कि आलू दिसम्‍बर के अंत तक पूरा बन जाऐ। उत्‍तर-पश्चिमी भागों मे आलू की बुआई का उपयुक्‍त समय अक्‍तूबर माह का पहला पखवाडा है। पूर्वी भारत में आलू अक्‍तूबर के मध्‍य से जनवरी तक बोया जाती है। 

आलू की फसल में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 50 से.मी. व पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. होनी चाहिए। इसके लिए 25 से 30 क्विंटल बीज प्रति हैक्‍टेयर पर्याप्‍त होता है।

आलू बुआई की विधि :

पौधों में कम फासला रखने से रोशनी,पानी और पोषक तत्‍वों के लिए उनमें होड बढ जाती है फलस्‍वरूप छोटे माप के आलू पैदा होते हैं। अधिक फासला रखने से प्रति हैक्‍टेयर में पौधो की संख्‍या कम हो जाती है जिससे आलू का मान तो बढ जाता है परन्‍तु उपज घट जाती है। इसलिए कतारों और पौधो की दूरी में ऐसा संतुलन बनाना होता है कि न उपज कम हो और न आलू की माप कम हो। उचित माप के बीज के लिए पंक्तियों मे 50 से.मी. का अन्‍तर व पौधों में 20 से 25 से.मी. की दूरी रखनी चाहिए। 

उर्वकों का प्रयोग:

फसल में प्रमुख तत्‍व अर्थात नत्रजन, फास्‍फोरस व पोटाश पर्याप्‍त मात्रा में डालें। नत्रजन से फसल की वानस्‍पतिक बढवार अधिक होती है और पौधे के कंदमूल के आकार में भी वृद्धि होती है परन्‍तु उपज की वृद्धि में कंदमूल के अलावा उनकी संख्‍या का अधिक प्रभाव पडता है। फसल के आरम्भिक विकास और वानस्‍पतिक भागों को शक्तिशाली बनाने में पोटाश सहायक होता है। इससे कंद के आकार व संख्‍या मे बढोतरी होती है। आलू की फसल में प्रति हैक्‍टेयर 120 कि.ग्रा. नत्रजन, 80 कि.ग्रा. फास्‍फोरस और 80 कि.ग्रा. पोटाश डालनी चाहिए। उर्वरकों की मात्राा मिट्टी की जांच के आधार पर निर्धारित करते है। बुआई के समय नत्रजन की आधी मात्रा तथा फास्‍फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा डालनी चाहिए।नत्रजन की शेष आधी मात्रा पौधों की लम्‍बाई 15 से 20 से.मी. होने पर पहली मिट्टी चढाते समय देनी चाहिए। 

आलू में सिंचाई :

आलू में हल्‍की लेकिन कई सिंचाईयों की आवश्‍यकता होती है परन्‍तु खेत में पानी कभी भी भरा हुआ नही रहना चाहिए। खूडों या नालियों में मेढों की उंचाई के तीन चौथाई से अधिक उंचा पानी नही भरना चाहिए। पहली सिंचाई अधिकांश पौधे उगजाने के बाद करें व दूसरी सिंचाई उसके 15 दिन बाद आलू बनने व फूलने की अवस्‍था में करनी चाहिए। कंदमूल बनने व फूलने के समय पानी की कमी का उपज पर बुरा प्रभाव पडता है। इन अवस्‍थाओं में पानी 10 से 12 दिन के अन्‍तर पर दिया जाना चाहिये । पूर्वी भारत में अक्‍तूबर के मध्‍य से जनवरी तक बोई जाने वाली आलू की फसल मे सिंचाई की उपयुक्‍त मात्रा 50 से.मी. ( 6 से 7 सिंचाइयॉ) होती है। 

आलू में खरपतवारों की रोकथाम :

आलू की फसल में कभी भी खरपतवार न उगने दें। खरपतवार की प्रभावशाली रोकथाम के लिए बुआई के 7 दिनों के अन्‍दर, 0.5 किलोग्राम सिमैजिन 50 डब्‍ल्‍यू.पी. (Cizamin 50 w.p.) या लिन्‍यूरोन (Linuron) का 700 लिटर पानी मे घोल बनाकर प्रति हैक्‍टेयर के हिसाब से छिडकाव कर दें। 

आलू कटाई या खुदाई:

पूरी तरह से पकी आलू की फसल की कटाई उस समय करनी चाहिए जव आलू के कन्‍दो के छिलके सख्‍त पड जायें। पूर्णतया पकी एवं अच्‍छी फसल से लगभग 300 क्विंटल प्रति हैक्‍टेयर उपज प्राइज़ होती है। 

आलू की फसल में कीट पतगें, सुत्रकृमि तथा बीमारीयॉ:

आलू की फसल में कंद वाले शलभ (Tubber Moth), कटुवा कीडे, जैसिड (Jassid) और माहू या चेंपा (Afid) से बहुत नुकसान होता है। 

टयूबर मॉथ कीडे के लारवा कंदमूल मे सुराख बना देते हैं। यदि कंद को मिट्टी से ढका न गया तो ये कीडे फसल को बहुत नुकसान पंहुचाते है। कंद वाले शलभ जैसे ही दिखाई दें इन पर 0.07 प्रतिशत ऐन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव करें और कंद को मिट्टी से ढक दें। 

कटुवा कीडे पौधों का उनकी जडों के पास, भूमि के निचे ही काट देते हैं। इनकी रोकथाम के लिए बुआई से पहले 5 प्रतिशत एल्ड्रिन या हैप्‍टाक्‍लोर 20 से 25 किलोग्राम प्रति हैक्‍टेयर की दर से खेत की मिट्टी में मिलाऐं। खडी फसल में कटुवा का प्रकोप होने पर उपरोक्‍त दवा का बुरकाव पौधों की निचली सतह पर करते है। 

जैसिड नर्म शरीर वाले हरे रंग के कीडे होते हैं जो पौधों के पत्‍तों और अन्‍य कोमल भागों का रस चूस लेते हैं। 

माहू या चेंपा ( एफिड): आलू में लगने वाले हरे रंग के किडे होते हैं जो पत्‍ती की निचली सतह पर पाए जाते हैं और पत्‍तों का रस चूसते हैं। इनके कुप्रभाव से प‍त्तियां उपर को मुड जाती हैं और उनकी बढवार रूक जाती है। माहू या चेंपा लगने पर 0.07 प्रतिशत ऐन्‍डोसल्‍फान या 0.05 प्रतिशत मैलाथियान का छिडकाव करें। 

जड गांठ सुत्रकृमि (Root Knote Nematode) प्रभावित पौधें की पत्तियां सामान्‍य पौधों की पत्तियों से बडी हो जाती हैं पौधों की बढवार रूक जाती है तथा गर्म मौसम में रोगी पौधे सूख जाते हैं। जडों मे अत्‍यधिक गॉठे हो जाती हैं। जडों की दरारों में प्राय दूसरे सूक्ष्‍मजीव जैसे फफूंद, जीवाणू आदि का आक्रमण होता है। बचाव के लिए फसल चक्र में मोटे अनाज वाली फसलों को लाना चाहिए। ग्रीटिंग्स ऋतु में 2-3 बार जुताई करनी चाहिए । बुआई से पहले एल्‍डीकार्ब, कार्बोफ्यूरान का 2 किलोग्राम सक्रिय भाग प्रति हैक्‍टेअर की दर से खेत में डालना चाहिए। 

आलू की फसल मे अनेक बीमारीयॉ जैसे झुलसा, पत्‍ती मुडना व मोजेक आदि लगती हैं। इन बीमारियों से फसल को बहुत नुकसान होता है। इनसे फसल को बचाना बहुत आवश्‍यक जरूरी है।

 

Source : IARI in

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अरहर की खेती का सुझाव

12 February, 2018 - 13:37

कृषि विज्ञान केन्द्र द्वारा ग्राम कीरतपुर, अजयगढ़ में अरहर की उन्नत तकनीक पर किसानों को प्रशिक्षण दिया गया। कृषि विज्ञान केन्द्र समन्वयक डॉ. बीएस किरार, डॉ. आरके. सिंह एवं डॉ. केपी. द्विवेदी आदि वैज्ञानिकों द्वारा कृषकों को प्रशिक्षण दिया गया। इस दौरान कार्यक्रम में भाजपा अध्यक्ष सतानंद गौतम, जनपद सदस्य एवं उप सरपंच उपस्थित रहे। इस मौके पर डॉ. किरार द्वारा अरहर की उन्नत किस्म राजीव लोचन की विषेषताएं और बीज को फफूंदनाशक दवा कार्बोक्सीन थायरम 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करने की सलाह दी। इसके बाद जैव उर्वरक राइजोवियम एवं स्फु र घोलक जीवाणु से उपचारित कर शीघ्र बुवाई करें। पकी गोबर खाद उपलब्ध हो तो 30 से 40 क्विंटल प्रति एकड़ खेत में डालकर बुवाई करें। भूमि ढालू एवं असमतल होने के कारण वर्षात के पानी से खेत की उपजाऊ मिट्टी बह जाती हैं। जिससे फ सल कमजोर और उत्पादन कम मिलता है। खेतो में मेड़बंदी करने से मृदा क्षरण एवं जल प्रबंधन कार्य के साथ फ सल उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी होगी। डॉ. सिंह ने बताया, अरहर फ सल के लिये संतुलित उर्वरक में यूरिया 20 किग्रा सिंगल सुपर फास्फेट 100-125 कि.ग्रा. और म्युरेट ऑफ पोटाश 15 किग्रा प्रति एकड़ आधार रूप में बुवाई के समय देना चाहिए। खेत में दीमक की समस्या होने पर फोरेट 10 जी 4 कि.ग्रा प्रति एकड़ बुवाई के समय खेत मे मिला देना चाहिए। डॉ. द्विवेदी ने बताया, अरहर की बुवाई सीडड्रिल या हल से करते समय कतार से कतार की दूरी 60-70 सेमी. और पौधा से पौधा का अंतराल 20-25 सेमी. रखना चाहिए। बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निंदाई गुड़ाई करें।

 

भूमि की तैयारी

हल्की दोमट अथवा मध्यम भारी प्रचुर स्फुर वाली भूमि, जिसमें समुचित पानी निकासी हो, अरहर बोने के लिये उपयुक्त है। खेत को 2 या 3 बाद हल या बखर चला कर तैयार करना चाहिये। खेत खरपतवार से मुक्त हो तथा उसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था की जावे। 

  जातियाँ :-

बीज दर- 10 से 12 किलो बीज प्रति एकड़ लगता है। शीघ्र पकने वाली जातियों के लिये 30-45 से.मी. तथा पौधों से पौधों की दूरी 10-15 से.मी. मध्यम तथा देर से पकने वाली जातियों के लिये 60-75 से.मी. कतार से कतार तथा पौधे से पौधे की दूरी 20-25 से.मी. रखते हैं।

किस्म
शीघ्र पकने वाली जातियां
 

औसत उपज क्विंटल प्रति एकड़
गुण

                        शीघ्र पकने वाली जातियां

आई.सी.पी. एल-151
 

120-125
8 - 9

  1. फली हरे रंग की एवं बेंगनी मूंग की धारियां होती है।
  2. दाने गोल बड़े एवं धूसर सफेद रंग के होते हैं।

पूसा-33
 
135-140
8 - 9

  1. फली मध्यम आकार की एवं फलियों पर महरुम लाल धारियां होती है।
  2. दाने लाल रंग के होते हैं।

आई.सी.पी. एल- 87
125-135
8-9

  1. फली मध्यम आकार की एवं महरुम एवं लाल रंग की धारियां होती हैं।
  2. दाना हल्के लाल रंग का मध्यम गोल होता है।

पूसा-885
140-145
9-10

  1. उक्टा के लिये के लिये सहनशील
  2. दाना मोटा

                        मध्यम पकने वाली जातियां

सी-11
190-200
6-7.5

  1. उक्टा अवरोधी

आई.सी.पी. एल 87-119
190-195
8-9

  1. फलियों पर महरुम एवं लाल धारियां होती है।
  2. दाने लाल रंग के होते हैं।

नं-148
160-180
7-8

  1. दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  2. पौधे मध्यम आकार के एवं घने होते हैं।

जवाहर-4
165-175
7-8

  1. दाने भूरे लाल एवं मध्यम आकार के होते हैं।
  2. पौधे मध्यम आकार के एवं घने होते हैं।

जे.के.एम. -7
 
180-190
7-8

  1. दाने गहरे भूरे लाल रंग के मध्यम एवं गोल आकार के होते हैं।
  2. पौधे लम्बे आकार के होते हैं।

खरगोन-2
150-160
4-5

  1. दाना लाल
  2. असीमित वृध्दि वालादाना लाल

                          देर से पकने वाली जातियां

एम.ए.-3 
220-250
10-12

  1. दाने लाल रंग के मध्यम आकार के होते हैं।
  2. यह किस्म फली मक्खी के लिये सहनषील है।

बीज की मात्रा एवं बीजोपचार

अरहर की फसल में उन्नत किस्मों का प्रमाणित बीज 10-12 किलोग्राम एकड़ प्रति एकड़ लगता है । बीज को बीजोपचार करने के बाद ही बोये । बीजोपचार ट्रायकोडर्मा बिरिडी 10 ग्राम/किलो या 2 ग्राम थाइरम/एक ग्राम बेबीस्टोन (2:1) में मिलाकर 3 ग्राम प्रति किलो की दर से बीजोपचार करने से फफूंद नष्ट हो जाती है । बीजोपचार के उपरांत अरहर का राइजोबियम कल्चर 5 ग्राम एवं पी.एस.बी. कल्चर 5 ग्राम प्रति किलो बीज की दर से बीजोपचार करें । बीज को कल्चर से उपचार करने के बाद छाया में सुखाकर उसी दिन बोनी करें।

बोवाई का समय एवं तरीका

 

 

अरहर की बोनी का समय वर्षा पर निर्भर करता है। अरहर की बोनी सामान्यत: जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना चाहिए । सिंचित क्षेत्रों में जल्दी पकने वाली अरहर की बोनी जून के प्रथम सप्ताह सर द्वितिय सप्ताह में करने से अच्छी उपज मिलती है । यदि वर्षा अधिक होने से समय पर अरहर की बोनी कृषक न कर सकें तो फिर इसकी बोनी अगस्त के प्रथम सप्ताह तक की जा सकती है ।

उर्वरक का प्रयोग

बुवाई के समय 8 कि.ग्रा. नत्रजन, 20 कि.ग्रा. स्फुर, 8 कि.ग्रा. पोटाष व 20 कि.ग्रा. गंधक प्रति एकड़ कतारों में बीज के नीचे दिया जाना चाहिये। तीन वर्ष में एक बार 10 कि.ग्रा. जिंक सल्फेट प्रति एकड़ आखिरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी होती है। 

सिंचाई 

जहां सिंचाई की सुविधा हो वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी फलियां बनने की अवस्था पर करने से पैदावार अच्छी होती है। 

खरपतवार प्रबंधन :-

खरपतवार नियंत्रण के लिये 20-25 दिन में पहली निदाई तथा फूल आने से पूर्व दूसरी निदाई करें। 2-3 बार खेत में कोल्पा चलाने से निदाओं पर अच्छा नियंत्रण रहता है व मिट्टी में वायु संचार बना रहता है। पेंडीमेथीलिन 500 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ बोनी के बाद प्रयोग करने से नींदा नियंत्रण होता है। निदानाषक प्रयोग के बाद एक निदाई लगभग 30 से 40 दिन की अवस्था पर करना चाहिये।

अंतरवर्तीय फसल :-

अंतरवर्तीय फसल पध्दति से मुख्य फसल की पूर्ण पैदावार एवं अंतरवर्तीय फसल से अतिरिक्त पैदावार प्राप्त होगी। मुख्य फसल में कीटो का प्रकोप होने पर या किसी समय में मौसम की प्रतिकूलता होने पर किसी फसल से सुनिष्चित लाभ होगा। साथ-साथ अंतरवर्तीय फसल पध्दति में कीटों और रोगों का प्रकोप नियंत्रित रहता है। 

अरहर / मक्का या ज्वार 2:1 कतारों के अनुपात में, (कतारों के बीच की दूरी 40 से.मी.), अरहर/मूंगफली या सोयाबीन 2:4 कतारों के अनुपात में, अरहर / उड़द या मूंग 1:2 कतारों के अनुपात में मध्य प्रदेश के उत्तम अंतवर्तीय फसल पध्दतियां हैं। 
 

पौध संरक्षण -

अ. रोग

उकटा रोग

इस रोग का प्रकोप अधिक होता है। यह फ्यूजेरियम नामक कवक से फैलता है। रोग के लक्षण साधारणता फसल में फूल लगने की अवस्था पर दिखाई देते हैं। नवम्बर से जनवरी महीनों के बीच में यह रोग देखा जा सकता है। पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसमें जड़े सड़ कर गहरे रंग की हो जाती है तथा छाल हटाने पर जड़ से लेकर तने की उंचाई तक काले रंग की धारियां पाई जाती है। इस बीमारी से बचने के लिये रोग रोधी जातियां जैसे सी-11, जवाहर के.एम.-7, बी.एस.एम.आर.-853, आषा आदि बोयें। उन्नत जातियों का बीज बीजोपचार करके ही बोयें। गर्मी में खेत की गहरी जुताई व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का संक्रमण कम होता है।

बांझपन विषाणु रोग:-

 यह रोग विषाणु से फैलता है। इसके लक्षण पौधे के उपरी शाखाओं में पत्तियां छोटी, हल्के रंग की तथा अधिक लगती है और फूल-फली नहीं लगती है। ग्रसित पौधों में पत्तियां अधिक लगती है। यह रोग, मकड़ी के द्वारा फैलता है। इसकी रोकथाम हेतु रोग रोधी किस्मों को लगाना चाहिये। खेत में उग आये बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिये। मकड़ी का नियंत्रण करना चाहिये।

फायटोपथोरा झुलसा रोग

  रोग ग्रसित पौधा पीला होकर सूख जाता है। इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम मेटेलाक्सील फफूंदनाशक दवा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें। बुवाई पाल (रिज) पर करना चाहिये और मूंग की फसल साथ में लगायें।   

ब. कीट

फली मक्खी

यह फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। इल्ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खाकर पूरा करती है एवं बाद में प्रौढ़ बनकर बाहर आती है। दानों का सामान्य विकास रुक जाता है।
मादा छोटे व काले रंग की होती है जो वृध्दिरत फलियों में अंडे रोपण करती है। अंडों से मेगट बाहर आते हैं और दानों को खाने लगते हैं। फली के अंदर ही मेगट शंखी में बदल जाती है। जिसके कारण दानों पर तिरछी सुरंग बन जाती है और दानों का आकार छोटा रह जाता है। तीन सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।
 

 फली छेदक इल्ली

छोटी इल्लियां फलियों के हरे उत्तकों को खाती है व बड़े होने पर कलियों, फूलों, फलियों व बीजों पर नुकसान करती है। इल्लिया फलियों पर टेढ़े-मेढ़े छेद बनाती है।
इस की कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है। इल्लियां पीली, हरी, काली रंग की होती है तथा इनके शरीर पर हल्की गहरी पट्टियां होती है। अनुकूल परिस्थितियों में चार सप्ताह में एक जीवन चक्र पूर्ण करती है।

फल्ली का मत्कुण

 मादा प्राय: फल्लियों पर गुच्छों में अंडे देती है। अंडे कत्थई रंग के होते हैं। इस कीट के षिषु एवं वयस्क दोनों ही फली एवं दानों का रस चूसते हैं, जिससे फली आड़ी-तिरछी हो जाती है एवं दानें सिकुड़ जाते हैं। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करते हैं।

प्लू माथ 

इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है। प्रकोपित दानों के पास ही इसकी विष्टा देखी जा सकती है। कुछ समय बाद प्रकोपित दाने के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है।
मादा गहरे रंग के अंडे एक-एक करके कलियों व फली पर देती है। इसकी इल्लियां हरी तथा छोटै-छोटे काटों से आच्छादित रहती है। इल्लियां फलियों पर ही शंखी में परिवर्तित हो जाती है। एक जीवन चक्र लगभग चार सप्ताह में पूरा करती है।
 

ब्रिस्टल बीटल

ये भृंग कलियो, फूलों तथा कोमल फलियों को खाती है जिससे उत्पादन में काफी कमी आती है। यह कीट अरहर, मूंग, उड़द, तथा अन्य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है। भृंग को पकड़कर नष्ट कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है।

 कीट प्रंबधन  

 कीटों के प्रभावी नियंत्रण हेतु समन्वित प्रणाली अपनाना आवष्यक है

  कृषि कार्य द्वारा :

  • गर्मी में खेत की गहरी जुताई करेंäÆ 
  • शुध्द अरहर न बोयें 
  • फसल चक्र अपनाये
  • क्षेत्र में एक ही समय पर बोनी करना चाहिये 
  • रासायनिक खाद की अनुषंसित मात्रा का प्रयोग करें। 
  • अरहर में अंतरवर्तीय फसलें जैसे ज्वार, मक्का या मूंगफली को लेना चाहिये।

यांत्रिकी विधि द्वारा :

  • प्रकाष प्रपंच लगाना चाहिये 
  • फेरोमेन प्रपंच लगायेä 
  • पौधों को हिलाकर इल्लियां को गिरायें एवं उनकी इकट्ठा करके नष्ट करें। 
  • खेत में चिड़ियाओं के बैठने की व्यवस्था करें।

जैविक नियंत्रण द्वारा -  

  • 1. एन.पी.वी. 200 एल.ई. प्रति एकड़ / यू.वी. रिटारडेंट 0.1 प्रतिषत / गुड़ 0.5 प्रतिशत मिश्रण को शाम के समय छिड़काव करें। बेसिलस थूरेंजियन्सीस 400 ग्राम प्रति एकड़ / टिनोपाल 0.1 प्रतिषत / गुड 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

जैव-पौध पदार्थों के छिड़काव द्वारा : 

  • निंबोली सत 5 प्रतिषत का छिड़काव करें।
  • नीम तेल या करंज तेल 10-15 मि.ली. / 1 मि.ली. चिपचिपा पदार्थ (जैसे सेडोविट, टिपाल) प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
  • निम्बेसिडिन 0.2 प्रतिषत या अचूक 0.5 प्रतिषत का छिड़काव करें।

रासायनिक नियंत्रण द्वारा : 

  • आवश्यकता पड़ने पर ही कीटनाषक दवाओं का छिड़काव या भुरकाव करना चाहिये। 
  • फली मक्खी नियंत्रण हेतु संर्वागीण कीटनाशक दवाओं का छिड़काव करें जैसे डायमिथोएट 30 ई.सी. 0.03 प्रतिशत,मोनोक्रोटोफॉस 36 ई.सी. 0.04 प्रतिषत आदि।
  • फली छेदक इल्लियां के नियंत्रण हेतु- फेनवलरेट 0.4 प्रतिषत चूर्ण या क्वीनालफास 1.5 प्रतिषत चूर्ण या इंडोसल्फान 4 प्रतिषत चूर्ण का 8 से 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से भुरकाव करें या इंडोसल्फान 35 ईसी 0.7 प्रतिशत या क्वीनालफास 25 ईसी 0.05 प्रतिशत या क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 0.6 प्रतिषत या फेन्वेलरेट 20 ईसी 0.02 प्रतिशत या एसीफेट 75 डब्ल्यू.पी. 0.0075 प्रतिशत या ऐलेनिकाब 30 ई.सी 200 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति एकड़ है, या प्राफेनोफॉस 50 ईसी 400 मि.ली. प्रति एकड़ का छिड़काव करें। दोनों कीटों के नियंत्रण हेतु प्रथम छिड़काव सर्वांगीण कीटनाशक दवाई का करें तथा 10 दिन के अंतराल से स्पर्ष या सर्वांगीण कीटनाशक का छिड़काव करें। कीटनाशक के 3 छिड़काव या भुरकाव पहला फूल बनने पर, दूसरा 50 प्रतिषत फूल बनने पर और तीसरा फली बनने की अवस्था पर करना चाहिये।

  कटाई एवं गहाई :-

 जब पौधे की पत्तियां गिरने लगे एवं फलियां सूखने पर भूरे रंग की पड़ जाये तब फसल को काट लेना चाहिये। खलिहान में 8-10 दिन धूप में सुखाकर ट्रेक्टर या बैलों द्वारा दावन कर गहाई की जाती है। बीजों को 8-9 प्रतिशत नमी रहने तक सुखाकर भण्डारित करना चाहिये।

उन्नत उत्पादन तकनीकी अपनाकर अरहर की खेती करने से 6-8 क्विटल प्रति एकड़ उपज असिंचित अवस्था में और 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ उपज सिंचित अवस्था में प्राप्त की जा सकती है। 

साभार: patrika

एलोवेरा की खेती भी किसानों को लाभ देती

12 February, 2018 - 13:17

ग्वारपाठा, घृतकुमारी या एलोवेरा जिसका वानस्पतिक नाम एलोवेरा बारबन्डसिस हैं तथा लिलिऐसी परिवार का सदस्य है। इसका उत्पत्ति स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है। एलोवेरा को विभिन्न भाषाओं में अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है, हिन्दी में ग्वारपाठा, घृतकुमारी, घीकुंवार, संस्कृत में कुमारी, अंग्रेजी में एलोय कहा जाता है। एलोवेरा में कई औषधीय गुण पाये जाते हैं, जो विभिन्न प्रकार की बीमारियों के उपचार में आयुर्वेदिक एंव युनानी पद्धति में प्रयोग किया जाता है जैसे पेट के कीड़ों, पेट दर्द, वात विकार, चर्म रोग, जलने पर, नेत्र रोग, चेहरे की चमक बढ़ाने वाली त्वचा क्रीम, शेम्पू एवं सौन्दर्य प्रसाधन तथा सामान्य शक्तिवर्धक टॉनिक के रूप में उपयोगी है। इसके औषधीय गुणों के कारण इसे बगीचों में तथा घर के आस पास लगाया जाता है। पहले इस पौधे का उत्पादन व्यावसायिक रूप से नहीं किया जाता था तथा यह खेतों की मेढ़ में नदी किनारे अपने आप ही उग जाता है। परन्तु अब इसकी बढ़ती मांग के कारण कृषक व्यावसायिक रूप से इसकी खेती को अपना रहे हैं, तथा समुचित लाभ प्राप्त कर रहे हैं।
एलोवेरा के पौधे की सामान्य उंचाई 60-90 सेमी. होती है। इसके पत्तों की लंबाई 30-45 सेमी. तथा चौड़ाई 2.5 से 7.5 सेमी. और मोटाई 1.25 सेमी. के लगभग होती है। एलोवेरा में जड़ के ऊपर जो तना होता है उसके उपर से पत्ते निकलते हैं, शुरूआत में पत्ते सफेद रंग के होते हैं। एलोवेरा के पत्ते आगे से नुकीले एवं किनारों पर कटीले होते हैं। पौधे के बीचो बीच एक दण्ड पर लाल पुष्प लगते हैं। हमारे देश में कई स्थानों पर एलोवेरा की अलग- अलग प्रजातियां पाई जाती हैं। जिसका उपयोग कई प्रकार के रोगों के उपचार के लिये किया जाता है। इसकी खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए किसान भाई निम्न बातें ध्यान में रखे:-

जलवायु एवं मृदा

यह उष्ण तथा समशीतोष्ण जलवायु वाले क्षेत्रों में सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है। कम वर्षा तथा अधिक तापमान वाले क्षेत्रों में भी इसकी खेती की जा सकती है। इसकी खेती किसी भी प्रकार की भूमि में की जा सकती है। इसे चट्टानी, पथरीली, रेतीली भूमि में भी उगाया जा सकता है, किन्तु जलमग्न भूमि में नहीं उगाया जा सकता है। बलुई दोमट भूमि जिसका पी.एच. मान 6.5 से 8.0 के मध्य हो तथा उचित जल निकास की व्यवस्था हो उपयुक्त होती है।

खेत की तैयारी

ग्रीष्मकाल में अच्छी तरह से खेत को तैयार करके जल निकास की नालियां बना लेना चाहिये तथा वर्षा ऋतु में उपयुक्त नमी की अवस्था में इसके पौधें को 50 & 50 सेमी. की दूरी पर मेढ़ अथवा समतल खेत में लगाया जाता है। कम उर्वर भूमि में पौधों के बीच की दूरी को 40 सेमी. रख सकते हैं। जिससे प्रति हेक्टेयर पौधों की संख्या लगभग 40,000 से 50,000 की आवश्यकता होती है। इसकी रोपाई जून-जुलाई माह में की जाती है। परन्तु सिंचित दशा में इसकी रोपाई फरवरी में भी की जा सकती है।

निंदाई-गुडाई

प्रारंभिक अवस्था में इसकी बढ़वार की गति धीमी होती है। अत: प्रारंभिक तीन माह तक में 2-3 निंदाई गुड़ाई की आवश्यकता होती है। क्योंंकि इस काल मे विभिन्न खरपतवार तेजी से वृद्धि कर ऐलोवेरा की वृद्धि एवं विकास पर विपरीत असर डालते हैं। 8 माह के बाद पौधे पर मिट्टी चढ़ाएं जिससे वे गिरे नहीं ।

खाद एवं उर्वरक

सामान्यतया एलोवेरा की फसल को विशेष खाद अथवा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती है। परन्तु अच्छी बढ़वार एवं उपज के लिए 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद को अंतिम जुताई के समय खेत में डालकर मिला देना चाहिए । इसके अलावा 50 किग्रा. नत्रजन, 25 किग्रा. फास्फोरस एवं 25 किग्रा. पोटाश तत्व देना चाहिये । जिसमे से नत्रजन की आधी मात्रा एवं फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी रोपाई के समय तथा शेष नत्रजन की मात्रा 2 माह पश्चात् दो भागों में देना चाहिए अथवा नत्रजन की शेष मात्रा को दो बार छिड़काव भी कर सकते हैं।

सिंचाई

एलोवेरा असिंचित दशा में उगाया जा सकता है। परन्तु सिंचित अवस्था में उपज में काफी वृद्धि होती है। ग्रीष्मकाल में 20-25 दिन के अन्तराल पर सिंचाई करना उचित रहता है। सिंचाई जल की बचत करके एवं अधिक उपयोग करने के लिये स्प्रिंकलर या ड्रिप विधि का उपयोग कर सकते हैं।

पौध संरक्षण

इस फसल में साधारणतया कोई कीड़े अथवा रोग का प्रकोप नहीं होता है। परन्तु भूमिगत तनों व जड़ों को ग्रब नुकसान पहुंचाते हैं। जिसकी रोकथाम के लिये 60-70 किलोग्राम नीम की खली प्रति हेक्टर के अनुसार दें अथवा 20-25 किग्रा. क्लोरोपायरीफॉस डस्ट प्रति हेक्टर का भुरकाव करें । वर्षा ऋतु में तनों एवं पत्तियों पर सडऩ एवं धब्बे पाये जाते हैं, जो फफूंदजनित रोग है। जिसके उपचार के लिये मेन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करना उपयुक्त रहता है।

अंतरवर्तीय फसल

एलोवेरा की खेती अन्य फल वृक्ष औषधीय वृक्ष या वन में रोपित पेड़ों के बीच में सफलतापूर्वक की जा सकती है।

कटाई एवं उपज

इस फसल की उत्पादन क्षमता बहुत अधिक हैं फसल की रोपाई के बाद एक वर्ष के बाद पत्तियां काटने लायक हो जाती है। इसके बाद दो माह के अन्तराल से परिपक्व पत्तियों को काटते रहना चाहिए। सिंचित क्षेत्र मे प्रथम वर्ष में 35-40 टन प्रति हेक्टर उत्पादन होता है। तथा द्वितीय वर्ष में उत्पादन 10-15 फीसदी तक बढ़ जाता है। उचित देखरेख एवं समुचित पोषक प्रबंधन के आधार पर इससे लगातार तीन वर्षों तक उपज ली जा सकती है। असिंचित अवस्था में लगभग 20 टन प्रति हेक्टर उत्पादन मिल जाता है।

प्रवर्धन विधि एवं रोपाई

इसका प्रवर्धन वानस्पतिक विधि से होता है। व्यस्क पौधों के बगल से निकलने वाले चार पांच पत्तियों युक्त छोटे पौधे उपयुक्त होते हैं, प्रारंभ में ये पौधे सफेद रंग के होते हैं, तथा बड़े होने पर हरे रंग के हो जाते हैं। इन स्टोलन/सर्कस को मातृ पौधे से अलग करके नर्सरी या सीधे खेत में रोपित करते हैं।

Category: खेतीTags: एलोवेरा

फूलगोभी की खेती

8 February, 2018 - 12:35

यह भारत की प्रमुख सब्जी है फूलगोभी की खेती पूरे वर्ष में की जाती है। इससे किसान अत्याधिक लाभ उठा सकते है। इसको सब्जी, सूप और आचार के रूप में प्रयोग करते है। इसमे विटामिन बी पर्याप्त मात्रा के साथ-साथ प्रोटीन भी अन्य सब्जियों के तुलना में अधिक पायी जाती है
 
जलवायु 
फूलगोभी के लिए ठंडी और आर्द्र जलवायु की आवश्यकता होती है यदि दिन अपेक्षाकृत छोटे हों तो फुल की बढ़ोत्तरी अधिक होती है फुल तैयार होने के समय तापमान अधिक होने से फुल पत्तेदार और पीले रंग के हो जाते है अगेती जातियों के लिए अधिक तापमान और बड़े दिनों की आवश्यकता होती है २९.२२-३१.२२ डिग्री सेल्सियस तापमान पौधों के अधिक समुचित विकास और फूलों के उत्तम गणों के लिए सर्वोतम माना गया है फुल गोभी को गर्म दशाओं में उगाने से सब्जी का स्वाद तीखा हो जाता है | फूलगोभी की खेती प्राय: जुलाई से शुरू होकर अप्रैल तक होती है
भूमि 
जिस भूमि का पी.एच. मान 5.5 से 7 के मध्य हो वह भूमि फुल गोभी के लिए उपयुक्त मानी गई है अगेती फसल के लिए अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी  तथा पिछेती के लिए दोमट या चिकनी मिट्टी उपयुक्त रहती है साधारणतया फुल गोभी की खेती बिभिन्न प्रकार की भूमियों में की जा सकती है  भूमि जिसमे पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद उपलब्ध हो इसकी खेती के लिए अच्छी होती है हलकी रचना वाली भूमि में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद डालकर इसकी खेती की जा सकती है
 खेत की तयारी 
 पहले खेत को पलेवा करें जब भूमि जुताई योग्य हो जाए तब उसकी जुताई २ बार मिटटी पलटने वाले हल से करें इसके बाद दो बार कल्टीवेटर चलाएँ और प्रत्येक जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं |
उन्नतशील प्रजातियां
फूलगोभी की मौसम के आधार पर तीन प्रकार की प्रजातियाँ होती है। जैसे की अगेती, मध्यम और पछेती प्रजातियाँ पायी जाती हैं 
अगेती प्रजातियाँ 
पूसा दिपाली, अर्ली कुवारी, अर्ली पटना, पन्त गोभी- 2, पन्त गोभी- 3, पूसा कार्तिक, पूसा अर्ली सेन्थेटिक, पटना अगेती, सेलेक्सन 327 एवं सेलेक्सन 328 है। 
मध्यम प्रकार की प्रजातियाँ 
पन्त शुभ्रा, इम्प्रूव जापानी, हिसार 114, एस-1, नरेन्द्र गोभी 1, पंजाब जॉइंट ,अर्ली स्नोबाल, पूसा हाइब्रिड 2, पूसा अगहनी, एवं पटना मध्यम, 
पछेती प्रजातियाँ 
स्नोबाल 16, पूसा स्नोबाल 1, पूसा स्नोबाल 2, पूसा के 1, दानिया, स्नोकिंग, पूसा सेन्थेटिक, विश्व भारती, बनारसी मागी, जॉइंट स्नोबालढ्ढ 
कैसे करें पौधे तैयार
स्वस्थ पौधे तैयार करने के लिए भूमि तैयार होने पर 0.75 मीटर चौड़ी, 5 से 10 मीटर लम्बी, 15 से 20 सेंटीमीटर ऊँची क्यारिया बना लेनी चाहिए। दो क्यारियों के बीच में 50 से 60 सेंटीमीटर चौड़ी नाली पानी देने तथा अन्य क्रियाओ करने के लिए रखनी चाहिए। पौध डालने से पहले 5 किलो ग्राम गोबर की खाद प्रति क्यारी मिला देनी चाहिए तथा 10 ग्राम म्यूरेट ऑफ़ पोटाश व 5 किलो यूरिया प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से क्यारियों में मिला देना चाहिए। पौध 2.5 से 5 सेन्टीमीटर दूरी की कतारों में डालना चाहिए। क्यारियों में बीज बुवाई के बाद सड़ी गोबर की खाद से बीज को ढक देना चाहिए। इसके 1 से 2 दिन बाद नालियों में पानी लगा देना चाहिए या हजारे से पानी क्यारियों देना चाहिए।
कैसे करें बीज बुवाई
एक हेक्टेयर खेत में 450 ग्राम से 500 ग्राम बीज की बुवाई करें। पहले 2 से 3 ग्राम कैप्टन या ब्रैसिकाल प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए। इसके साथ ही साथ 160 से 175 मिली लीटर को 2.5 लीटर पानी में मिलकर प्रति पीस वर्ग मीटर के हिसाब नर्सरी में भूमि शोधन करना चाहिए।
फूलगोभी की रोपाई
फसल समय के अनुसार रोपाई एवं बुवाई की जाती है। जैसे अगेती में मध्य जून से जुलाई के प्रथम सप्ताह तक पौध डालकर पौध तैयार करके 45 सेन्टी मीटर पंक्ति से पंक्ति और 45 सेंटी मीटर पौधे से पौधे की दूरी पर पौध डालने के 30 दिन बाद रोपाई करनी चाहिए। मध्यम फसल में अगस्त के मध्य में पौध डालना चाहिए। पौध तैयार होने के बाद पौध डालने के 30 दिन बाद 50 सेंटी मीटर पंक्ति से पंक्ति और 50 सेन्टीमीटर पौधे से पौधे दूरी पर रोपाई करनी चाहिए। पिछेती फसल में मध्य अक्टूबर से मध्य नवम्बर तक पौध डाल देना चाहिए। 30 दिन बाद पौध तैयार होने पर रोपाई 60 सेन्टीमीटर पंक्ति से पंक्ति और 60 सेन्टीमीटर पौधे से पौधे की दूरी पर रोपाई करनी चाहिए।
खाद एवं उर्वरक
फुल गोभी कि अधिक उपज लेने के लिए भूमि में पर्याप्त मात्रा में खाद डालना अत्यंत आवश्यक है मुख्य मौसम कि फसल को अपेक्षाकृत अधिक पोषक तत्वों कि आवश्यकता होती है इसके लिए एक हे. भूमि में ३५-४० क्विंटल गोबर कि अच्छे तरीके से सड़ी हुई खाद एवं 1 कु. नीम की खली डालते है रोपाई के 15 दिनों के बाद वर्मी वाश का प्रयोग किया जाता है 
रासायनिक खाद का प्रयोग करना हो  120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस तथा 60 किलोग्राम पोटाश तत्व के रूप में प्रयोग करना चाहिए

सिचाई 
रोपाई के तुरंत बाद सिचाई करें अगेती फसल में बाद में एक सप्ताह के अंतर से, देर वाली फसल में १०-१५ दिन के अंतर से सिचाई करें यह ध्यान रहे कि फुल निर्माण के समय भूमि में नमी कि कमी नहीं होनी चाहिए |
खरपतवार नियंत्रण 
फुल गोभी कि फसल के साथ उगे खरपतवारों कि रोकथाम के लिए आवश्यकता अनुसार निराई- गुड़ाई करते रहे चूँकि फुलगोभी उथली जड़ वाली फसल है इसलिए उसकी निराई- गुड़ाई ज्यादा गहरी न करें और खरपतवार को उखाड़ कर नष्ट कर दें |
कीट नियंत्रण

कैबेज मैगेट
यह जड़ों पर आक्रमण करता है जिसके कारण पौधे सुख जाते है |
रोकथाम 
इसकी रोकथाम के लिए खेत में नीम कि खाद का प्रयोग करना चाहिए |
चैंपा
यह कीट पत्तियों और पौधों के अन्य कोमल भागों का रस चूसता है जिसके कारण पत्तिय पिली पड़ जाती है |
रोकथाम 
इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा को गोमूत्र के साथ मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर 750 मि. ली. मिश्रण को प्रति पम्प के हिसाब से फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |
ग्रीन कैबेज वर्म 
ये दोनों पत्तियों को खाते है जिसके कारण पत्तियों कि आकृति बिगड़ जाती है |
रोकथाम :-
इसकी रोकथाम के लिए  गोमूत्र नीम का तेल मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर 500 मि. ली. मिश्रण को प्रति पम्प के हिसाब से फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |
मंड बैकमोथयह मोथ भूरे या कत्थई रंग के होते है जो १ से. मि. लम्बे होते है इसके अंडे ०.५-०.८ मि. मी. व्यास के होते है इनकी सुंडी १ से. मी. लम्बी होती है जो पौधों कि पत्तियों के किनारों को खाती है |
रोकथाम 
इसकी रोकथाम के लिए  गोमूत्र नीम का तेल मिलाकर अच्छी तरह मिश्रण तैयार कर 500 मि. ली. मिश्रण को प्रति पम्प के हिसाब से फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें 

बिमारियों  रोकथाम के लिए बीज को बोने से पूर्व गोमूत्र , कैरोसिन या नीम का तेल से बीज को उपचारित करके बोएं |

गोभी वर्षीय फसलों को ऐसे क्षेत्र में उगाना नहीं चाहिए जिनमे इन रोगों का प्रकोप हो रहा हो सरसों वाले कुल के पौधों को इसके पास न उगायें |
कटाई 
फुल गोभी कि कटाई तब करें जब उसके फुल पूर्ण रूप से विक़सित हो जाएँ फुल ठोस और आकर्षक होना चाहिए जाति के अनुसार रोपाई के बाद अगेती ६०-७० दिन, मध्यम कटाई
फुल गोभी कि कटाई तब करें जब उसके फुल पूर्ण रूप से विक़सित हो जाएँ फुल ठोस और आकर्षक होना चाहिए जाति के अनुसार रोपाई के बाद अगेती ६०-७० दिन, मध्यम ९०-१०० दिन , पछेती ११०-१८० दिन में कटाई के लिए तैयार हो जाती है |
उपज 
यह प्रति हे. २००-२५० क्विंटल तक उपज मिल जाती है |
भण्डारण
फूलों में पत्तियां लगे रहने पर ८५-९० % आद्रता के साथ १४.२२ डिग्री सेल्सियस तापमान पर उन्हें एक महीने तक रखा जा सकता है |

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गेहू की खेती कैसे और कब

8 February, 2018 - 12:19

कुमार गौरव/पूर्णिया
जिले में श्रीविधि से गेहूं की खेती कारगर साबित हो रही है। अगर तुलना करें तो इसमें परंपरागत खेती से बुआई का खर्च चौथाई से भी कम हो रहा है और उपज डेढ़ गुना मिल रही है लेकिन इस खेती में बीज को उपचारित कर बुआई की विधि थोड़ी अलग है। रसायनिक खादों के इस्तेमाल से मुक्ति मिल रही है। अब तो किसान बुआई के लिए कतार से कतार और पौधे से पौधे के बीच एक निश्चित दूरी रखने के लिए कोनोवीडर मशीन की सहायता ले रहे हैं। यह खेती छोटे किसानों के लिए वरदान साबित हुई है। जिले में इस विधि के प्रति किसानों को जागरूक करने के लिए कृषि विभाग की ओर से विशेष पहल की जा रही है।

खेत को ऐसे करें तैयार 
खेत की तैयारी के लिए सामान्य गेहूं की खेती की तरह ही करते हैं। इसके बाद गोबर खाद 20 क्विंटल या वर्मी कम्पोस्ट 04 क्विंटल प्रति एकड़ प्रयोग करना चाहिए। यदि खेत में पर्याप्त नमी नहीं है तो जुताई से पहले एक सिंचाई अवश्य करनी चाहिए। अंतिम जुताई के पहले 27 किलो डीएपी और 13.05 किलो पोटाश प्रति एकड़ खेत में छिड़काव कर मिट्‌टी के साथ अच्छी तरह से हल की मदद से मिला लेना चाहिए।

 

किसान अपने खेतों की मिट्‌टी की जांच कराने के बाद ही उर्वरक का प्रयोग करें। बुआई से 15-20 दिन बाद सिंचाई करना जरूरी है। क्योंकि नई जड़ें बननी शुरू हो जाती हैं। इसके बाद खरपतवार निकाल दें। 35 से 40 दिन बाद दूसरी सिंचाई और 55 से 60 दिन बाद तीसरी सिंचाई तथा अगली सिंचाई 60, 80 और 100 दिनों के अंतराल पर की जाती है। बुआई के 40 दिनों के बाद तीसरी सिंचाई के तुरंत बाद 15 किलो यूरिया, 13 किलो पोटाश प्रति एकड़ की दर से खेतों में डालें। दो तीन दिनों के बाद कोनोवीडर से खर पतवार निकाल देना चाहिए। यह ध्यान रखें कि बाली में दाना बनने के समय पानी की कमी नहीं हो।

श्री विधि के लिए बीज उपचार की विधि 
बीज उपचार के बारे जिला कृषि समन्वयक सुनील कुमार झा कहते हैं कि दस किलो बीज में से मिट्‌टी कंकड़ और खराब बीज को छांट लें। 20 लीटर पानी को बर्तन में गुनगुना करें (60 डिग्री सेंटीग्रेड) छांटे हुए बीज को गुनगुने पानी में डाल दें। इस पानी में पांच किलो वर्मी कम्पोस्ट, 04 किलो गुड़, 04 लीटर गोमूत्र मिलाकर आठ घंटे तक छोड़ दें। आठ घंटे के बाद इस मिश्रण को एक कपड़े से छान लें। इसके बाद बीज में बैविस्टीन 20 ग्राम मिलाकर 12 घंटे के लिए अंकुरित होने के लिए गीले कपड़े में बांधकर छोड़ दें। इसके बाद अंकुरित बीज को बोने के लिए इस्तेमाल करें

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सरसों की खेती

8 February, 2018 - 12:12

सरसों एवं राई की गिनती भारत की प्रमुख तीन तिलहनी फसलों (सोयाबीन, मूंगफली एवं सरसो) में होती है । राजस्थान में प्रमुख रूप से भरतपुर सवाई माधोपुर, अलवर करौली, कोटा, जयपुर आदि जिलो में सरसों की खेती की जाती है। सरसों में कम लागत लगाकर अधिक आय प्राप्त की जा सकती है।

इसके हरे पौधों का प्रयोग जानवरों के हरे चारे के रूप में लिया जा सकता है। साथ ही पषु आहार के रूप में बीज, तेल, एंव खली को काम में ले सकतें हैं क्यो कि इनका प्रभाव षीतल होता है जिससे यें कई रोगो की रोकथाम में सहायक सिध्द होते है इसकी खली में लगभग 4 से 9 प्रतिषत नत्रजन 2.5 प्रतिषत फॉस्फोरस एवं 1.5 प्रतिषत पोटाष होता है। अत: कई देशों में इसका उपयोग खाद की तरह किया जाता ह किन्तु हमारे देष में यह केवल पशुओ को खिलाई जाती है।

इसके सूखे तनों को ईधन के रूप में उपयोग लिया जाता है। सरसों के बीज में तेल की मात्रा 30से 48 प्रतिषत तक पायी जाती है। सरसों राजस्थान की प्रमुख तिलहनी फसल है जिससे तेल प्राप्त होता है। सरसोें का तेल बनाने मालिष करने, साबुन ,ग्रीस बनाने तथा फल एंव सब्जियों के परीरंक्षण में का आता है।

जलवायु तथा मृदा : 

भारत में सरसों की खेती षरद ऋतु में की जाती है। इस फसल को 18 से 25 सेल्सियस तापमान की आवष्यकता होती है। सरसों की फसल के लिए फूल आते समय वर्षा, अधिक आर्द्रता एवं वायुमण्ड़ल में बादल छायें रहना अच्छा नही रहता है। अगर इसस प्रकार का मोसम होता हें तो फसल पर माहू या चैपा के आने का अधिक प्रकोप हो जाता हैं।

सरसों की खेती रेतीली से लेकर भारी मटियार मृदाओ में की जा सकती है। लेकिन बलुई दोमट मृदा सर्वाधिक उपयुक्त होती है। यह फसल हल्की क्षारीयता को सहन कर सकती है। लेकिन मृदा अम्लीय नही होनी चाहिए।

सरसों की उन्नत किस्में:

आर एच 30 : सिंचित व असिचित दोनो ही स्थितीयों में गेहूु चना एवं जौ े साथ खेती के लिए उपयुक्त इसस किस्म के पौधों 196 सेन्टीमीटर ऊचे, एवं 5से6 प्राथमिक ष्षाखाओं वाले होते है। यह किस्म देर से बुवाई के लिए भी उपयुक्त है। इसमें 45से50 दिन में फूल आने लगते है। और फसल 130से135 दिन में पक जाती है। एवं इसके दाने मोटे होते है। यदि 15से20 अटुम्बर तक इसकी बुवाई कर दी जाये तो मोयले के प्रकोप से बचा जा सकता है।

टी 59 (वरूणा) : मध्यम कद वाली इस किस्म की पकाव अवधि 125 से 140 दिन फलिया चौडी  छोटी एवं दाने मोटे काले रंग के होते है। इसकी उपज असिचित 15से18 दिन हेक्टर होती है। इसमें तेल की मात्रा 36 प्रतिषत होती है।

पूसा बोल्ड : मध्यम कद वाली इस किसम की षाखाओं फलियों से हुई व फलियों मोटी होती है। यह 130से140 दिन में पककर 20से25 क्विंटल हैक्टर उपज देती है। इसमें तेल की मात्रा 37से38 प्रतिषत तक पायी जाती है।

बायो 902 (पूसा जयकिसान)  : 160से180 से. मी. ऊँची इस किस्म में सफेद रोली ,मुरझान व तुलासितस रोगो का प्रकोप अन्य किस्मों की अपेक्षा कम होता है। इसकी फलिया पकने पर दाने झड़ते नही एवं इसका दाना कालापन लिए भूरे रंग का होता है।ै इसकी उपज 18से20 क्विं. हेक्टर, पकाव अवधि 130से140 दिन एवं तेल की मात्रा 38से40 प्रतिषत होती है। इसके तेल में असंतृप्प्त वसीय अल कम होते है, इसलिए इसका तेल खाने के लिए उपयुक्त होता है।

वसुन्धरा (आर.एच. 9304) : समय पर एवं सिंचित क्षेत्र में बोई जाने वाली इस किस् का पपौधा 180से 190 से. मी. ऊँचा होता है। 130से 135 दिन में पकने वाली इस किस्म की पैदावार 25से27 क्विं.। हेक्टर तक होती है। यह किस्म आड़ी गिरने तथा फली चटखने से प्रतिरोध है तथा सफेद रोली से मध्यम प्रतिरोधी है।

अरावली (आर.एन.393) : 135 से 138 दिन में पपकने वाली इस किस्म की ऊँर्चा मध्यम होती है। तेल की मात्रा 42 प्रतिषत एवं 55से 60 दिन में फूल आने वाली इस किस्म की औसत ैदावार 22से25 क्विं. हेक्टर तक होती है। यह सफेद रोली से मध्यम प्रतिरोधी है।

जगन्नाय (बी. एस. एल.5) : यह किस् समय से बुवाई के लिए सिचित क्षैत्र के लिए उपयुक्त है। यह मध्यम ऊँचाई वाली (165 से 170 से.मी.) 125 से 130 दिन में पककर तैयार हो जाती है बीज स्लेटी से काले रंग का मध्यम मोटा होता है । तल की मात्रा 39से40 प्रतिषत तथा औसत पैदावार 20से22 क्विं. हैक्टर होतर है। यह किस्म पत्ती धब्बा रोग तथा सफेद रोली के मध्य प्रतिरोधी है आड़ी गिरने व फली चटखने से पप्रतिरोधी होती है।

लक्ष्मी (आर .एच. 8812) : समय से बंवाई एवं सिचिंत क्ष्ैत्र के लिए उपयोगी किस् अधिक ऊचाई वाली (160 से 180 से. मी. ) यह किस्म 140 से 150 दिन में पककर तैयार हो जाती है। पत्तियॉ छोटी एव पतली लेकिन फली आने पर भार के कारण आड़ी पडने की सम्भावना होती है फलियॉ मोटी एवं पकने पर चटखती नी है। दाना काला तथा मोटा होता है। तेल की मात्रा 401 प्रतिषत होती है। तथा औसत पैदावार 22से 25 क्विं. हैक्टयर होती है यह किस्म पत्ती धब्बा रोग एवं सफेद रोली से मध्यम प्रतिरोधी है।

स्वर्ण ज्योति (आर. एच. 9820) : देर से बाुेई जाने एवं सिंचित क्ष्ैत्र के लिए उपयुक्त। पौधा मध्यम ऊँचाई का (135 से 140) दिन में फूल आने वाली यह किस्म 135से 140 दिन में पककर तैयार हो जाती है तेल की मात्रा 39 से 42 प्रतिषत होती है। यह किस्म 15 नवम्बर तक बोई जाने पर भी अच्छी पैदावार देती है इसकी औसत पैदावार 13से15 क्वि. हैक्टयर होती है। यह आड़ी गिरने एवं फली छिटकने से प्रतिराधी, पाले के लिए मध्यम सहनषील एवं सफेद रोली से मध्य प्रतिरोधी है।

आषीर्वाद (आर. के. 01से03) : यह किस्म देरी से बुवाई के लिए (25 अक्टुबर से 15 नवम्बर तक) उपयुक्त पायी गई है। इसका पौधा 130से140 से. मी. ऊँचा होता है। तेल की मात्रा 39से42 प्रतिषत होती है। यह किस्म आड़ी गिरने एवं फली छिटकने से प्रतिरोधी पाले से मध्यम प्रतिरोधी 120से130 दिन में पककर 13से15 क्विं. हैक्टयर उपज देती है

खेत की तैयारी :

सरसों के लिए भुरभुरी मृदा की आवष्यकता होती है। इसे लिए खरीफ की कटाई के बाद एक गहरी जुताई करनी चाहिए तथा इसके बाद तीन चार बाार देषी हल से जुताई करना लाभप्रद होता है। जुताई के बाद पाटा लगाकर खेत को तेयार करना खहिए असिंचित क्षैत्रों में वर्षा के पहले जुताई करके खरीफ मौसम में खेत पड़ती छोडना चाहिए जिससे वर्षा का पानी का संरक्षण हो सके । जिसके बाद हल्की जुताइयॉ करके खेत तैयार करना चाहिए । यदि खेत में दीमक एवं अन्य कीटो का प्रकोप अधिक हो तो, नियंत्रण हेतु अन्तिम जुताई के समय क्यूनालफॉस 1.5 प्रतिषत चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टयर की दर ससे देना चाहिए। साथ ही, उत्पादन बढ़ाने हेतु 2से3 किलरग्राम एजोटोबेक्टा एवं पी.ए.बी कल्चर की 50 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मीकल्चर में मिलाकर अंतिम जुर्ता से पुर्ण खेत में ड़ालना चाहिए।

सरसों की बुवाई :

सरसों की बुवाई के लियें उपयुक्त तापमान 25 से 26 सैल्सियस तक रहता है। बारानी में सरसों की बुवाई 15 सितम्बर से 15 अक्टुबंर तक कर देनी चाहिए। सिंचित क्षैत्रो में अक्टूबर के अन्त तक बंवाई की जा ससकती हैं सरसों की बुवाई कतारो में करनी चाहिए। कतार से कतार की दूरी 30 सें. मी. तथा पौधों से पौधें की दूरी 10 सें. मी. रखनी चाहिए। सिंचित क्षैत्र में बीज की गहराई 5 से. मी. तक रखी जाती है। असिचित क्षैत्र में गहराइ्र नमी के अनुसार रखनी चाहिए।

बुंवाई के लिए शुष्‍क क्षैत्र में 4 से 5 कि.ग्रा तथा सिंचित क्षैत्र में 2.5 कि. ग्रा बीज प्रति हैक्टर पर्याप्त रहता है।  बुवाइे से पहले बीज को 2.5 ग्राम मैन्कोजेब प्रति कि.ग्रा. बीज की दर से उपचारित करें।

खाद व उर्वरक प्रबन्धन :

सिंचित फसल के लिए 8से10 टन सड़ी गोबर की खाद प्रति हेक्टर की दर से बुवाई के 3से 4 सप्ताह पुर्व खेत मे डालकर खेत की तैयारी करें एवं बारानी क्षत्र में वर्षा े पुर्व 4से5 टन सडी खाद प्रति हैक्टर खेत में डाल देवें।

एक दो वर्षा के बाद खेत में समान रूप से फैलाकर जुताई करे। सिंचित क्षैत्रों में 80 कि.ग्रा. नत्रजन 30से40 किग्रा फॉस्फोरस एवं 375 किग्रा. जिप्सम या 60 किग्रा गन्धक पुर्ण प्रति हैक्टर की दर से डालें। नत्रजनकी आधी व फॉस्फोरस की पूरी मात्रा बुवाई के समय देवे,षेष आधी मात्रा प्रथम सिचाई के समय देवे।

सिंचाई :

सरसों की फसल में सही समय पर सिंचाई देने पर पैदावार में बढोत्तरी होती है। यदि वर्षा अधिक होती है। तो फससल को सिचाई की आवष्यकता नही होती है। परन्तु यदि वर्षा समय पर न होतो 2 सिंचाई आवष्यक है प्रथम सिंचाई बांई के 30 से 40 कदन बाद एवं दितीय सिचाइ 70 सें 80 दिन की अवथा में करे । यदि जल की कमी हो तो एक सिचाई 40से50 दिन की फसल में करें।

निराई गुडाई एवं खरपतवार नियन्त्रण :

पौधों की संख्या अधिक होतो बुवाई के 20 से 25 दिन बाद निराई के साथ छटाई कर पौधें निकालने चाहिए तथा पौधों के बीच 8 से 10 सेन्टी मीटर की दूर रखनी चाहिए। सिचाई के बाद गुडाई करने से खरपतवार अच्छी होगी।

प्याजी की रोकथाम के लियें फ्लूम्लोरेलिन एक लीटर सक्रिय तत्व प्रति हैक्टर भूमि में मिलावें। जहा पलेना करके बुवाई की जानी हो वहों सूखी बुवाई की स्थिति में पहलें फसल की बुवाई करे इसकें बाद फ्लूम्लोरेलिन का छिड़काव कर सिचाई करनी चाहिए।

फसल की कटाई :

सरसों की फल 120से150 दिन में पककर तैयार हो जाती है इस फसल में उचित समय पर कटाई करना अत्यन्त आवष्यक है क्यो कि यदि समय पर कटाई नहीं की जाती है। तो फलि‍याँ चटकने लगती है। एवं उपज में 5 से 10 प्रतिषत की कमी आ जाती है।

र्जैसे ही पौधे की पत्तियों एवं फलियों का र्रंग पीला पड़ने लगें कटाई क लेनी चाहिए। कटाई के समय इस बात का विषष ध्यान रखे की सत्यानाषी खरपतवार का बीज, फल के साथ न मिलने पाये नही तों इस फसल के दूषित तेल से मनुष्य में ड्रोपसी  नामक बीमारी हो जायेगी।

सरसों  केवल टहनियों को काटकर बंडलों में बाधकर खलियान में पहुॅचा देवें एवं कुछ दिन तक फसल को सुखानें के बाद उचित नमी की अवस्था ें आने पर दाने बोरियों में भरकर भण्डार ग्रह में पहुँचा देना चाहिए।

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बैंगन की खेती कैसे करे

8 February, 2018 - 12:06

बैंगन भारत का देशज है। प्राचीन काल से भारत से इसकी खेती होती आ रही है। ऊँचे भागों को छोड़कर समस्त भारत में यह उगाया जाता है।
बैगन एक सब्जी है। बैंगन भारत में ही पैदा हुआ और आज आलू के बाद दूसरी सबसे अधिक खपत वाली सब्जी है। विश्व में चीन (54 प्रतिशत) के बाद भारत बैंगन की दूसरी सबसे अधिक पैदावार (27 प्रतिशत) वाले देश हैं। यह देश में 5.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में उगाया जाता है।
बैंगन का पौधा २ से ३ फुट ऊँचा खड़ा लगता है। फल बैंगनी या हरापन लिए हुए पीले रंग का, या सफेद होता है और कई आकार में, गोल, अंडाकार, या सेव के आकार का और लंबा तथा बड़े से बड़ा फुटबाल गेंद सा हो सकता है। लंबाई में एक फुट तक का हो सकता है।

बेगन की किस्मे :-

 बैगन की बहुत सारी किस्मे होती है में कुछ विशेष किस्मों के बारे में यहाँ पर बताउगा जो hiybird है। और अच्छा उत्पादन देने वाली होती है।
1 पूसा hibird 5-
    इसमे पौधा बड़ा और अच्छी शाखाओ युक्त होता है। ये फसल 80 से 90 दिनों आ जाती है।
प्रति हेक्टर 450 से 600 किवंटल होती हे 
2 पूसा hibird 6 :-
गोल फल लगते है। 85 से 90 दिनों की औसत प्रतिहेक्टेर 500से 600 किवंटल
3 पूसा hibird 9:-
85 से 90 दिनों में फल लगते हे 
औसत 400 से 500 किवंटल प्रतिहेक्टेर
इसके अलावा पूसा क्रांति,पूसा भैरव,पूसा बिंदु,पूसा उत्तम ,पूसा उपकार,पूसा अंकुर, जो की प्रतिहेक्टेर 200 से 400किवंटल तक उत्पादन देते है। 
कैसे करे नर्सरी तैयार :-

नर्सरी तैयार करने के लिए खेत की मिट्टी को अच्छे से देसी खाद (गोबर) को मिट्टी की सतह पर बिखेर कर फिर जुताई करे। (अपने खेत की मिट्टी का परीक्षण अवश्य करावे ताकि उचित मात्रा में खाद दे सके) जुताई होने के बाद उठी हुई क्यारियां बना ले फिर एक हेक्टेयर के लिए hibird बीज 400ग्राम तक  काफी होता है। बनी हुई क्यारियों में  1से.मी. की गहराई में 6 से 7 सेमी. की दुरी पर बीजो को डाल दे।  फिर उसे पर्याप्त मात्रा में पानी देते रहे ।
कब करे बुआई :-

उसे तो इस फसल को पुरे वर्ष में सभी ऋतुओ में लगाया जा सकता हे लेकिन में आपको माह से बता देता हू।
नर्सरी मई जून में करने पर बुआई 1 या डेढ़ माह में यानि जून या जुलाई तक कर सकते है
जो नर्सरी नवम्बर में लगाते हे उसे जनवरी में शीतलहर और पाले का प्रकोप से बचा कर लगा सकते है
जो नर्सरी फरवरी और मार्च में लगाते है उसे मार्च लास्ट और अप्रैल तक की जा सकती है
कैसे करे खेत तैयार:-

नर्सरी में पौधे तैयार होने के बाद दूसरा महत्वपूर्ण कार्य होता हे खेत को तैयार करना । मिट्टी परीक्षण करने के बाद खेत में एक हेक्टेयर के लिए 4 से 5 ट्रॉली पक्का हुआ गोबर का खाद बिखेर दे उसके बाद 2 बेग यूरिया 3 बेग सिंगल सुपर फासपेट और पोटेशियम सल्फेट की मात्रा ले कर जुताई करे। फिर खेत में 70सेमी. की दुरी पर क्यारियां बना लीजिये अब पोधो को 60×60सेमी. या 60×50 में पोधो की रोपाई करे।
बैगन की फसल में लगने वाले रोग 
नर्सरी में लगने वाले रोग:-
आन्द्रगलन(डम्पिंगऑफ़)
यह एक कवक है जो पोधो को बहार से निकलने से पूर्व ही ख़त्म कर देता है। और बहार निकलने के बाद भी पोधो को सूखा देता है।

 

Category: खेतीTags: बैंगन

आंवला की उन्नत किस्म से और औषधियो की खेती

21 January, 2018 - 10:04

आवंला का फल विटामिन सी का प्रमुख स्रोत है, तथा शर्करा एवं अन्य पोषक तत्व भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. इसके फलो को ताजा एवं सुखाकर दोनों तरह से प्रयोग में लाया जाता है इसके साथ ही आयुर्वेदिक दवाओं में आंवला का प्रमुख स्थान है. यह भारत का ही देशज पौधा है. आंवला एक ऐसा औषधीय गुण वाला फल है, जिसकी मांग आयुर्वेद में हमेशा से रही है। आज के भाग दौड़ की जिंदगी में लोग एलोपैथिक दवाओं को छोड़ आयुर्वेदिक दवाओं से रोगों का इलाज़ कराने में बेहतरी समझते हैं। आंवला के सर्वोत्तम गुणकारी होने के कारण इसकी मांग भी बढ़ने लगी है। यही कारण है कि आज बड़ी बड़ी कंपनियों में इसकी मांग होने लगी है।जहां तक इसके औषधीय गुण की बात है तो इसमें विटामिन सी प्रचूर मात्रा में पाया जाता है।अपने इसी गुण के कारण इससे कई तरह की दवाईयां जैसे त्रिफला चूर्ण,चय्वनप्राश,ब्रम्हा रसायन मधुमेधा चूर्ण बनती है।
औषधीय विशिष्ट लक्षण-स्कर्वी रोधी,मूत्रवर्धक,दात्तरोधी,जैविक रोधी और जिगर को पूष्ट बनाता है। इस लिए इसकी खेती में लाभ है आंवला एक अत्यधिक उत्पादनशील प्रचुर पोषक तत्वों वाला तथा अद्वितीय औषधि गुणों वाला पौधा है

 भूमि का प्रयोग  

बलुई भूमि के अतिरिक्त सभी प्रकार की भूमियो में आंवला कि खेती की जा सकती है आंवला का पौधा काफी कठोर होता है  अत सामान्य भूमि जिसका PH मान 9 तक हो उनमे भी आंवला कि खेती कि जा सकती है रेतीली मिट्टी में ना उगायें जिन प्रदेश में बारिस कम होती है वहां आसानी से उगाया जा सकता है।

जलवायु का उपयोग

आंवला उष्ण जलवायु का बृक्ष है इसकी खासियत ये भी है कि इसे शुष्क प्रेदश में आसानी से उगाया जा सकता है। उपोष्ण जलवायु में भी सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है इसके बृक्ष लू और पाले से अधिक प्रभावित नहीं होते है यह 0.46 डिग्री से तापमान सहन करने कि क्षमता रखता है पुष्पन के समय गर्म वातावरण अनुकूल होता है 

गड्ढो कि खुदाई और भराई किस प्रकार करें 

उसर भूमि में जून में 8-10 मीटर कि दूरी पर एक से सवा मीटर के गड्ढे खोद लेना चाहिए यदि कड़ी परत अथवा कंकर कि तह हो तो उसे खोद कर का अलग कर देना चाहिए अन्यथा बाद में पौधों के बृद्धि पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता - मई है बरसात के मौसम में इन गड्ढो में पानी भर देना चाहिए तथा एकत्रित पानी को निकाल कर फेंक देना चाहिए प्रत्यक गड्ढे में 50-60 किलो सड़ी हुयी गोबर कि खाद , 15-20 किलो ग्राम बालू ,8 10 किलो ग्राम जिप्सम और आर्गनिक खाद का मिश्रण लगभग 5 किलो ग्राम भर देना चाहिए भराई के 15-25 दिन बाद अभिक्रिया समाप्त होने पर ही पौधा का रोपण करना चाहिए व सामान्य भूमि में प्रत्येक गड्ढे में 40-50 किलो ग्राम सड़ी गोबर कि खाद और 2 किलो नीम की सड़ी खाद  का मिश्रण और ऊपर वाली मिटटी मिलाकर भर देना चाहिए गड्ढे जमीन के तह से 15-20 से.मी. उंचाई तक भरना चाहिए .

 पौधा रोपण का तरीका 

पौध रोपण के लिए गड्ढे जून में खोदते है गड्ढे का 1 गुणा 1 गुणा 1 मीटर आकार रखते है  गड्ढे की दूरी किस्म के अनुसार 8-10 मीटर रखते है पौधे वर्गाकार बिधि से लगाते है गड्ढे कि भराई के समय प्रति 25 किलो ग्राम गोबर कि सड़ी खाद और 5 नीम की खली का मिश्रण 2 गड्ढा किलो और गड्ढे से निकाली हुयी मिटटी 10 मिलाकर से.मी. उचाई तक भरकर सिंचाई कराते है ताकि गड्ढे कि मिटटी अच्छी तरह से बैठ जाये इन्ही गड्ढो में जुलाई से सितम्बर के बीच में या उचित सिंचाई का प्रबंध होने पर जनवरी से मार्च के बीच में पौध रोपण का कार्य किया जाता है रोपण कार्य जनवरी से फ़रवरी में करने पर अच्छी सफलता मिलती है चूँकि आंवले में स्वयं बंध्यता पाई जाती है अत: कम से कम दो किस्मे अवश्य लगाते है जो एक दूसरे के लिए परागण कर्ता का कार्य करती है आंवला के बाग में 5% परागड़ किस्मे लगाने से अच्छी उपज प्राप्त होती है 

ब्यावासयिक प्रजातियाँ 

आंवला के ब्यावासयिक जातियों में चकिया , फ्रांसिस , कृष्ण , कंचन नरेंद्र आंवला -5,4,7 एवं गंगा , बनारसी उल्लेखनीय है ब्यवसायिक जातियों - चकैया एवं फ्रांसिस से काफी लाभार्जन होता है .
बनारसी, कृष्णा, NA, फ्रांसिस, 7NA, AA 6 , चकैया,
उपोरोक्त किस्म के अतिरिक्त आगरा से निकली किस्म बलवंत आंवला तथा गुजरात से बिकसित -1 आनंद , आनंद -2, आनंद -3 भी उगाई जा रही है .

खाद एवं उर्वरक

50कु.गोबर की सड़ी खाद 20 किलो ग्राम नीम  50 किलो ग्राम अरंडी कि खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिश्रण 2 किलो प्रति पौधा 6 से 12 साल के पौधे में से 1 साल 5 साल तक पौधों के लिए से 3 से 5 किलो प्रति पौधा साल में दो बार - जनवरी फ़रवरी और दूसरा आधा जुलाई माह में जब फलो का विकास हो रहा हो देना अत्यंत आवश्यक 12 साल के ऊपर के पौधों को उम्र के हिसाब से प्रति वर्ष आधा किलोग्राम के हिसाब से देना चाहिए जैसे कोई पौधा है 20 साल का है उसको 10 किलो ग्राम खाद देना चाहिए है . फूल आने से 15-20 दिन पहले एमिनो एसिड फोल्विक एसिड पोटेसियम होमोनेट 1 : 2 : 2 के अनुपात में मिलाकर 250 से 300 मिली. 20 लीटर पानी में मिलाकर तर बतर करके छिड्काब करें 
रासायनिक खाद की दशा में

नाईट्रोजन 90 225 किलोग्राम
फॉस्पोरस 120 300 किलोग्राम
पोटाश 48 120 किलोग्राम प्रति एकड

 सिंचाई किस प्रकार 

सामान्यत पौधों को शीत ऋतु में 10-15 दिन के अंतर पर तथा ग्रीष्म ऋतु में 7 दिन के अंतर पर सिंचाई करते है फूल आने के समय - फरवरी मार्च में सिंचाई नहीं करनी चाहए अप्रैल से जून तक सिंचाई का बिशेष महत्व है टपक सिंचाई से आंवला में अच्छी उपज होती है तथा खरपतवार भी कम उगते है .

कटाई छटाई करें

तीन चार स्वस्थ्य और मुख्य तनों को छोड़कर दिसंबर में छंटनी कर दें अच्छी उपज हेतु निराई गुड़ाई करते रहना अति आवश्यक है थाले कि सफाई के लिए अच्छी तरह से गुड़ाई कर खरपतवार निकालते रहते है थाले के चारो ओर पलवार बिछा देने से खरपतवार कम हो जाते है तथा नमी संरक्षित रहती है

कीट नियंत्रण

छाल भक्षक कीट
उन उद्यानों में जहाँ - देख रेख कम होती है इसका प्रकोप ज्यादा होता है यह शाखाओ व तने में छेद कर उनके अन्दर पहुँच कर हानी पहुंचाता है इसके नियंत्रण के लिए प्रभावित भाग को खुरच कर साफ कर देते है तथा कीट द्वारा बनाये गए छिद्र में मिटटी का तेल डाल कर ऊपर से गीली मिटटी लगा देते है .
गांठ बनाने वाला कीट
यह कीट जुलाई सितम्बर माह में शाखा के शीर्ष भाग में छिद्र बनाकर भीतर बैठ जाता है प्रभवित शाखा का अग्रिम भाग बाहर कि तरफ उभार कर गांठ के रूप में दिखाई देता है फलत शीर्ष कलिका मर जाती है तथा पौधे कि वृद्धि रुक जाती है इसके नियंत्रण हेतु जिन शाखाओ में गांठ बन जाती है उन्हें काटकर नष्ट कर देते है तथा वर्षा ऋतु में नीम के पत्ती का उबला पानी घोल का छिड़काव कर देते है .
माहू 
यह मुलायम शाखाओं और पत्तियों का रस चूस कर हानि पहुचता है पौधे पर नीम के पत्ती का उबला हुआ पानी घोल का छिडकाव करने से यह कीट मर जाता है .
अनार कि तीतल
कभी कभी ये आंवले पर भी आक्रमण करती है यह फलों में छेद बनाकर नुक्सान पहुंचाती है तथा प्रभावित फल गिर कर नष्ट हो जाते है नियंत्रण के लिए प्रभावित फलो एकत्रित कर नष्ट कर देते और नीम का उबला हुआ पानी का छिड़काव करते है आंवले का बाग अनार के बाग से दूर लगना अच्छा रहता है .

रोग नियंत्रण

रतुवा 
यह रोग रेवेनेलिया इम्बलिका नामक कवक से होता है इससे पत्तियां और फल दोनों प्रभावित होते है पत्ती और फलो पर भूरे धब्बे बन जाते है तथा प्रभावित फल गिर जाते है इसकी रोकथाम के लिए उबला हुआ नीम कि पत्ती का पानी का पम्प द्वारा तर बतर कर छिड़काव करते है 
फल सडन
यह रोग पेनिसिलियम आक्जेलिकम तथा एस्पर्जिलास नाइजर कवको से होता है इसका प्रकोप मुख्यत बाजार भेजते समय या भण्डारण में होता है प्रभावित फलो पर जलशिक्त भूरे रंग के धब्बे बनाते है जो पुरे फल को ढक लेते है धब्बे पुराने पड़ने पर नीले रंग के हो जाते है नियंत्रण के लिए खरोंच लगे फलो को बाजार भेजने या भण्डारण करने के लिए नहीं रखते है फलो को बोरेक्स 4% या सुहागा के या नमक के  घोल से उपचारित करते है 
नीम का पानी 
25 ग्राम नीम कि पत्ती तोड़कर कुचलकर पीसकर 50 लीटर पानी में पकाए जब पानी 20-25 लीटर रह जाय तब उतार कर ठंडा कर सुरक्षित रख ले आवश्यकता अनुसार किसी भी तरह का - कीट पतंगे मछर , इल्ली या किसी भी तरह का रोग हो किलो 1 लीटर लेकर 15 लीटर पानी में मिलाकर पम्प द्वारा तर बतर कर छिड़काव करे .

तुड़ाई किस तरह 

फल के अनुसार नवम्बर से लेकर फरवरी तक पकते रहते है तुड़ाई उसी समय करते है जब छिलका का रंग चमक दार हरापन लिए हुए पिला हो जाय तुड़ाई हाथ से करना चाहिए जिससे फलो को खरोच न आये 

उपज के आधार

आंवला कि उपज इसकी प्रयुक्त प्रजाति भूमि स्थित तथा पोषक तत्व के प्रबंध पर निर्भर करती है परन्तु सामान्य अवस्था 10 से 12 वर्ष पुराने पेड़ से में 150 से 200 किलो ग्राम फल प्राप्त किये जाते है .
भण्डारण
कमरे के तापमान पर आंवला के फलो को 7-9 दिन तक भंडारित किया जा सकता है इसके भण्डारण काल 0-1.6 डिग्री से को . तपान तथा 85-90 % सापेक्ष आद्रता पर 18-20 दिन तक बढ़ाया जा सकता है आंवला के फल 15% नमक के घोल में 75 दिनों तक भंडारित किये जा सकते है .

 

 

Category: खेती

आवला की खेती के फायदे

21 January, 2018 - 07:28

आंवले की खेती-​ करने का तरीका :आंवले में पौषक तत्वों की मात्रा अधिक पाई जाती है | यदि इसकी खेती करते है तो इसका उत्पादन भी बहुत अधिक मात्रा में होता है | आंवले को एक अद्वितीय औषधि गुणों वाला पौधा भी कहा जाता है | इसमें शर्करा और भी अन्य पोषक तत्वों की प्रचुर मात्रा पाई जाती है | यह विटामिन सी का प्रमुख स्त्रोत है | इसके प्रयोग करने से मानव के शरीर में विटामिन सी की कमी पूरी हो जाती है | आंवला भारत का प्रमुख पौधा माना जाता है | आंवले के ताज़े रस और इसके फल को धूप में सुखाकर प्रयोग किया जाता है | आंवले को दोनों प्रकार से प्रयोग किया जाता है | हमारे भारत में आयुर्वेदिक औषधि का प्रयोग बहुत किया जाता है जिसमे आंवले को प्रमुख स्थान दिया गया है | इसमें एक आयुर्वेदिक औषधि के सभी गुण विद्यमान है |इसलिए आयुर्वेद में इसकी मांग हमेशा से रही है | आज कल के भाग दौड़ की जिन्दगी में मनुष्य एलोपेथिक दवाओं को छोडकर आयुर्वेदिक दवाओं से बिमारियों का इलाज कराते है | इसके उपयोग से मनुष्य को कोई हानी नहीं होती है | आंवला एक सबसे अच्छा और गुणकारी औषधि है इसलिए आंवले की मांग बढती ही जा रही है | इसी वजह से भारत की बड़ी – बड़ी कम्पनियियाँ इसकी मांग करने लगे है | आंवले में औषधि गुण के साथ – साथ विटामिन सी की मात्रा भी अधिक पाई जाती है | आंवले के इसी गुण के कारण इससे कई तरह की दवाईयां तैयार की जाती है | जैसे त्रिफला चूर्ण में मिलाकर च्वयनप्रश् , ब्रम्हा रासयन मधुमेधा चूर्ण आदि | इन सभी औषधि के आलावा बालों के लिए टॉनिक अथवा शैम्पू , दांतों को साफ करने के लिए दन्त मंजन और चहरे की सुन्दरता को बढाने के लिए क्रीम भी बनवाई जाती है | आंवले का सेवन करने से स्कर्वी रोग , पेशाब में कमी , जैविक रोधी आदि रोग ठीक हो जाते है और साथ ही साथ लीवर को भी ठीक रखता है | आंवले का मुरब्बा भी तैयार करके बाजारों में बेचा जाता है | जिसके खाने से आँखों का रोग ठीक हो जाता है | इसलिए इसकी खेती करने में किसान को बहुत लाभ मिलता है | आज हम इस अध्याय में आंवले की खेती किस प्रकार से करनी चाहिए|  इस बात की पूरी जानकारी हम आपको दे रहे है | जिसका उपयोग करके आप आंवले की एक अच्छी फसल तैयार करके अपनी आमदनी को बढ़ा सकते है |
.आंवले की फसल को बोने के लिए उपयुक्त जलवायु का वर्णन :-  :-  आंवला उषण जलवायु का पौधा होता है इसलिए इसे शुष्क प्रदेशो में उगाया जाता है | इस पौधे का एक गुण यह है की इसे उपोषण जलवायु में आसानी से और सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है | यह पौधा 0. 46 डिग्री सेल्सियस तापमान को भी सहन  कर सकता है | आंवले के पौधे में जब फुल उगने लगे तो इसके लिए गर्म जलवायु होनी चाहिए | गर्म जलवायु इसके बढ़ने में बहुत उचित होती है | इसके पेड़ को लू लगने और पाले पड़ने का कोई असर नहीं होता है |

आंवले की फसल को बोने के लिए उपयुक्त जलवायु का वर्णन :-  :-  आंवला उषण जलवायु का पौधा होता है इसलिए इसे शुष्क प्रदेशो में उगाया जाता है | इस पौधे का एक गुण यह है की इसे उपोषण जलवायु में आसानी से और सफलता पूर्वक उगाया जा सकता है | यह पौधा 0. 46 डिग्री सेल्सियस तापमान को भी सहन  कर सकता है | आंवले के पौधे में जब फुल उगने लगे तो इसके लिए गर्म जलवायु होनी चाहिए | गर्म जलवायु इसके बढ़ने में बहुत उचित होती है | इसके पेड़ को लू लगने और पाले पड़ने का कोई असर नहीं होता है |

|आंवले की खेती में प्रयोग होने वाली खाद और उर्वरक :- इसकी खेती में 50 किलो सड़ी हुई गोबर की खाद , 20 किलो नीम की खली , 40 से 50 किलो ग्राम अरंडी की खली आदि की आवश्कता पड़ती है | इन सभी खादों को आपस में मिलाकर खाद का एक अच्छा सा मिश्रण तैयार करें | आंवले का जो पौधा 6 से 12 साल का हो उसके लिए लगभग 2 किलो ग्राम खाद एक पौधे के लिए प्रयोग किया जाता है | इसके आलावा जो पौधा एक से तीन साल का होता है उसके लिए 3 से 5 किलो ग्राम खाद की जरूरत होती है | खाद को आंवले की फसल में साल में कम से कम दो बार अवश्य डालनी चाहिए | एक बार जनवरी या फरवरी के समय और दूसरी बार जुलाई के महीने में जब आंवले के पौधे में फलो का विकास हो रहा हो | जो पेड़ 12 साल से ऊपर का होता है उसके लिए खाद उसकी उम्र के अनुसार ही डालनी चाहिए | जैसे कोई – कोई पौधा 20 साल का भी होता है उसके लिए कम से कम 10 किलो खाद की आवश्कता होती है | आंवले की में फूल आने से कम से कम 15 या 20 दिन पहले ही एमिनो एसिड फोल्विक , एसिड पोटाशियम होमोनेट की 1 : फसल2 : 2 के अनुपात में मिलाकर एक मिश्रण बनाये | इस मिश्रण को लगभग 250 से 300 मिलीलीटर की मात्रा में लेकर २० लीटर पानी में मिलाकर पूरे खेत में छिडकाव करना चाहिए | इसके छिडकाव करने से पौधे में होने वाले हानिकारक कीट भी नष्ट हो जाते है | और पौधे का अच्छा विकास होता है | आंवले की खेती में सिंचाई करने का तरीका :- आंवले के पौधे की गर्मी के मौसम में एक सप्ताह के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए और सर्दी के मौसम में एक महीने में कम से कम दो बार सिंचाई अवश्य करनी चाहिए | टपक सिंचाई करने से आंवले की पैदावार अच्छी होती है और इसके साथ ही साथ अन्य खरपतवार भी कम उगते है | फरवरी और मार्च में जब आंवले में फूल आने लगे तो इसकी सिंचाई नहीं करनी चाहिए | जबकि अप्रैल से जून तक के समय में विशेष रूप से सिंचाई करनी चाहिए | इस प्रकार से सिंचाई करने से इसकी उपज अच्छी प्राप्त होती है |
  रासायनिक खाद की दशा में :-

नाईट्रोजन    :- 90225  किलोग्राम

फास्फोरस     :- 120300  किलोग्राम

पोटाश       :- 48120  किलोग्राम एक एकड़पौधे की कटाई और छटाई :-  आंवले की पौधे की कटाई और छटाई दिसम्बर के महीने में करनी चाहिए | छटाई करते समय इस पौधे के चार अच्छे और स्वस्थ मुख्य तनों को छोड़ दें | इसकी अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए पौधे की समय – समय पर निराई और गुड़ाई करते रहना रषे ताकि इसमें उगी हुई खरपतवार दूर जाये | जंहा पर आंवले की खेती की जा रही है वंहा पर थाले के चारों और से पलवार बिछा देना चहिए | इससे खरपतवार कम हो जाते है और भूमि में नमी बनी रहती है |

इसकी खेती को नुकसान पंहुचाने वाले कीटों पर नियंत्रण :-

छाल खाने वाले कीट :- जंहा आंवले की खेती करके छोड़ देते है और इसकी देख – रेख नहीं करते है | उन खेतो में इन कीटों का प्रभाव अधिक देखने को मिलता है | ये कीट पौधे के तने और शाखाओं के अंदर छेद करके पौधे को हानि पंहुचाते है | इसके नियंत्रण के लिए पौधे के प्रबावित भाग को खुरच कर साफ़ कर देना चाहिए | पौधे में कीट के द्वारा बनाये हुए छिद्र में मिटटी का  तेल डालकर उपर से गीली मिटटी लगा दें | इससे पौधे सुरक्षित रहते है | पौधों में गांठ बनाने वाला कीट :- जुलाई और सितम्बर के महीने में यह कीट टहनी के आगे ( शीर्ष ) के भाग में छेद बनाकर बैठ जाता है जिससे पेड़ का अग्रिम भाग बाहर की और निकल जाता है जो एक गांठ के रूप में दिखाई देने लगता है | इस बनी हुई गांठ के कारण शीर्ष की कलिका मर जाती है और पौधे की वृद्धि रुक जाती है | इसे नियंत्रित करने के लिए जिस पौधे की टहनी में गांठ बन जाये तो उन्हें काटकर हटा दें और साथ ही साथ बारिश के मौसम में नीम के पत्तों का उबला हुआ पानी को ठण्डा करके पौधे पर छिडकाव करें | ताकि गांठ पूरी तरह समाप्त हो जाये |
 

1.       अनार की तितल :- ये ज्यादातर अनार के पौधे को नुकसान पंहुचाते है लेकिन कभी – कभी ये आंवले के पौधे को भी हानि पंहुचाते है | ये कीट फलों के अंदर छेद बनाकर इन्हें नुकसान पंहुचती है | इसके कारण फल जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाते है | इस प्रकार के प्रभावित फलों को इक्कठा करके नष्ट कर देना चाहिये | आंवले के बगीचे को अनार के बगीचे से दूर ही लगाना चाहिए| प्रभावित पौधे पर नीम के उबले हुए पानी का छिडकाव करना चाहिए |

माहू :- यह कीट टहनी के मुलायम शाखाओं और पत्तियों का रस चूसकर पौधे को हानी पंहुचता है | इस प्रकार के कीट को नष्ट करने के लिए नीम के उबले हुए पानी का छिडकाव करना चाहिए |

पौधे के रोग पर नियंत्रण :-

१.    रतवा :- इस रोग में पौधे की पत्तियाँ और फल दोनों ही प्रभावित होते है | पौधे की पत्ती और फलों पर भूरे – भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है और इस रोग से प्रबावित फल जमीन पर गिर जाते है | पौधे में यह रोग रेवेनेलिया   इम्बिका नामक कवक से होता है | यदि इन्हें ना रोका गया तो ये कवक पौधे को बहुत ज्यादा हानी पंहुचा देते है | इसकी रोकथाम के लिए नीम की पत्तियों को पानी में उबालकर किसी पम्प के द्वारा छिडकाव करें | जिससे ये रोग ठीक हो सके |

२.    फलों में सडन :- फलों में यह रोग ज्यादातर बाजार भेजते समय या भंडार ग्रह में लगता है | इस रोग में फलों पर भूरे रंग के धब्बे पड़ जाते है जो की धीरे – धीरे पूरे फल पर हो जाते है | जब ये निशान पुराने हो जाते है तो इसका रंग नीला हो जाता है | इस रोग को फैलाने वाले कवक का नाम है :- पेनिसिलियम आक्जेलिक्म और एस्प्र्जिलास नाइजर | इस कवक के कुप्रभाव से फलों को बचाने के लिए बोरेक्स की 4 % की मात्रा को नमक या सुहागा के साथ मिलाकर उपचारित करते है | इसे नियंत्रण करने के लिए जिस फल पर खरोंच लग जाये तो उन्हें बाजार में या भंडार गृह में ना रखे |

नीम का पानी बनाने का तरीका :- नीम के पेड़ की 25 से 30 पत्तियों को तोडकर लगभग 50 लीटर पानी में उबाल लें | पकाते हुए जब पानी की मात्रा 25 लीटर की रह जाये तो इसे ठण्डा करके किसी स्थान पर सुरक्षित रख लें | नीम के इस तैयार पानी के किसी भी प्रकार का कीट , मच्छर , झिल्ली या पौधे में किसी भी प्रकार का रोग हो इस पानी के छिडकाव से ठीक हो जाता है | नीम की पत्तियों का एक लीटर पानी बनाकर इसमें 15 लीटर सादा पानी मिलाकर रोग से प्रभावित पौधे पर छिडकाव करें | इससे सभी रोग ठीक हो जाते है |

आंवले की उपज :-  सामान्य रूप से 10 से 12 साल के पुराने पेड़ से 200 से 250 किलो आंवले का फल प्राप्त किया जाता है | लेकिन इसकी उपज प्रयुक्त भूमि पर , प्रजाति पर , और पोषक तत्वों के प्रबन्ध पर आधारित है |

फल पकने के बाद तुड़ाई :- आंवले का फल नवम्बर से लेकर फरवरी तक के समय में पक जाते है | जब आंवले का फलों का छिलके का हरा रंग पीले रंग में बदल जाये तो इन फलों को हाथों से तोड़ना चाहिए | हाथों से तोड़ने पर फलों पर खरोंच नहीं आनी चहिये |

फलों के भंडारण के लिए :- आंवले के फलो के भंडारण के लिए कमरे का तापमान 1 .6 डिग्री से लेकर 85 से 90 % सापेक्ष आद्रता पर 15 से २० दिनों तक बढ़ाया जा सकता है | केवल कमरे के तापमान पर फलों को कम से कम एक सप्ताह या 10 दिन तक रख सकते है | आंवले के फल पर 10 से 15 % नमक के घोल पर लगभग 75 दिनों तक भंडारित कर सकते है |

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लीची की उन्नत तकनीक खेती

20 January, 2018 - 12:48

लीची एक तकनीक है जिसे वैज्ञानिक नाम से बुलाते हैं, जीनस लीची का एकमात्र सदस्य है। इसका परिवार है सोपबैरी। यह ऊष्णकटिबन्धीय फ़ल है, जिसका मूल निवास चीन है। यह सामान्यतः मैडागास्कर, भारत, बांग्लादेश, पाकिस्तान, दक्षिण ताइवान, उत्तरी वियतनाम, इंडोनेशिया, थाईलैंड, फिलीपींस और दक्षिण अफ्रीका में पायी जाती है।
मध्यम ऊंचाई का सदाबहार पेड़ होता है, जो कि 15-20 मीटर तक होता है, ऑल्टर्नेट पाइनेट पत्तियां, लगभग 15-25 सें.मी. लम्बी होती हैं। नव पल्लव उजले ताम्रवर्णी होते हैं और पूरे आकार तक आते हुए हरे होते जाते हैं। पुष्प छोटे हरित-श्वेत या पीत-श्वेत वर्ण के होते हैं, जो कि 30 सें.मी. लम्बी पैनिकल पर लगते हैं। इसका फल ड्रूप प्रकार का होता है, 3-4 से.मी. और 3 से.मी व्यास का। इसका छिलका गुलाबी-लाल से मैरून तक दाने दार होता है, जो कि अखाद्य और सरलता से हट जाता है। इसके अंदर एक मीठे, दूधिया श्वेत गूदे वाली, विटामिन- सी बहुल, कुछ-कुछ छिले अंगूर सी, मोटी पर्त इसके एकल, भूरे, चिकने मेवा जैसे बीज को ढंके होती है

भूमि इस प्रकार की हो 
उसर भूमि छोड़कर सभी प्रकार कि भूमियों में जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छी मात्रा में हो और जल निकास अच्छा हो लीची कि खेती सफलतापूर्वक कि जा सकती है . चिकनी दोमट मिटटी जिसमे जीवाश्म पदार्थ अच्छा हो और पानी न ठहरता हो लीची के लिए सर्वोत्तम है . हल्की अम्लीय भूमि में पेड़ों कि बृद्धि अच्छी होती है . ऐसी भूमि में लीची कि जड़ो के ऊपर कुछ गांठे पाई जाती है . जिनमे माइकोराइजा नामक कवक पाई जाती है . जिस कारण वृक्षों कि वृद्धी अच्छी होती है .
प्रजातियाँ अनेक प्रकार की है 
भारत में अभी तक लीची कि सिमित जातियां ही उपलब्ध है , जिसका मुख्य कारण इसका भारत में देर से प्रवेश है यहाँ पर व्यापारिक स्तर कि कुछ प्रमुख प्रजातियाँ दी जा रही है जो निम्न प्रकार है . : -
अर्ली सीडलेस अर्ली बेदाना

इसके फल जून के दुसरे सप्ताह में पकते है . फुल हृदयाकार से अंडाकार शक्ल के होते है . प्रति फल औसत भार 21.67 ग्राम होता है . छिलका पतले गहरे लाल रंग का होता है . प्रतिफल गुदे का भार लगभग 18 ग्राम , गुदा मुलायम रंग सफ़ेद क्रीमी तथा 13.64 प्रतिशत व अम्ल 0 शर्करा . 436 % होता है . फल खाने में स्वादिष्ट एवं सुगन्धित होता है बिज बहुत छोटा और फलत बहुत अच्छी होती है .
रोज सेंटेड
इसके फल भी जून के दुसरे सप्ताह में पकते है फल पके हृदयाकार 3.12 लगभग से.मी. लम्बे 3.05 ओर से.मी. चौड़े होते हैएक फल का औसत भार 17.45 ग्राम होता है छिलका पतला व बैगनी रंग का मिश्रित होता है गुदा मुलायम रंग में भूरा सफ़ेद तथा प्रति फल औसत भार 13.29 ग्राम होता है गुदे में शर्करा कि मात्रा लगभग 12.79 % अम्ल कि मात्रा 0.33 % होती है फल खाने से मीठा और गुलाब कि तरह खुशबू युक्त होता है बिज आकार में बड़ा होता है फल उत्पादन उपज सामान्य होता है .
अर्ली लार्ज रेड
फल जून के तीसरे सप्ताह में पकता है फल तिरक्षा हृदयाकार लगभग 3.53 सेमि . लम्बे 3.03 से.मी. चौड़े होते है तथा फल का औसत भार 20.45 ग्राम होता है छिलका पतला , गहरे लाल रंग का गुदा कड़ा भूरा सफ़ेद शर्करा 10 0.88 % 0.41 % अम्लता खुशबू अच्छी और स्वाद मीठा होता है बिज आकार में बड़ा और फलत मध्यम होता है .
मुजफ्फर पुर
इसको लेट लार्ज रेड भी कहते है इसके फल जून के चौथे सप्ताह में पकते है फल आयता कार नुकीले होते है फल कि लम्बाई लगभग 3.75 से.मी. व चौड़ाई लगभग 3.17 मी से .. . और फल का औसत भार 22 0.51 ग्राम होता है गुदे कि औसत मात्रा 16.76 ग्राम प्रति फल गुदे में शर्करा 10.17 % एवं अम्लता 0.54% होती है गुदा मुलायम , सुगंधित एवं मीठा होता है उपज प्रचुर मात्रा में होती है .
कलकतिया
यह देर से पकने वाली किस्म है इसके फल जुलाई के प्रथम सप्ताह में पकते है फल आयता कार होते है फल कि लम्बाई और चौड़ाई लगभग 3.86 से.मी. व 3.40 और फल का औसत भार से.मी. 23.85 ग्रम होता है छिलका मध्यम मोती का तथा टायरियन रोज के रंग का होता है फल में औसत गुदे कि 16.32 ग्राम व गुदे में शर्करा 10.99 % और अम्ल कि मात्रा 0.443 % होती है इसका स्वाद मीठा व बिज आकार में बड़ा होता मात्रा है फटने कि समस्या नाम मात्र कि पाई जाती है .
लेट सीडलेस
इस किस्म को लेट बेदाना के नाम से भी जाना जाता है इसके फलो के पकने का समय जून का अंत या जुलाई का प्रथम सप्ताह है फल लम्बाई में 3.70 से.मी. और चौड़ाई में 3.55 से.मी. होते है लगभग प्रति फल औसत भार 25.4 ग्राम होता है छिलका पतला तथा सिकुड़ा होता है गुदा मुलायम रसीला तथा क्रीमी रंग का होता है गुदे में शर्करा लगभग 13.86 % 0.34 % और अम्लता पाई जाती है फल खाने में सुगन्धित और मीठा होता लगभग है परन्तु बिज के पास कुछ कड़वाहट लिए हुए होता है उपज अच्छी होती है .
शाही 
यह जाती भी मुजफ्फर पुर कि भांति आकर्षक अच्छे फलोत्पादक वाली है और बिहार में ब्यावासयिक स्तर पर सफलता पूर्वक उगाई जा रही है इसका फल भी जून में अंतिम सप्ताह में पकता है फल मीठा बिज मध्यम होता है .
राम नगर,गोला
यह कलकतिया जाती का म्युटेंट है इसके फल जून के अंतिम सप्ताह में पकते है यह हर प्रकार से कलकतिया जाती से उच्च श्रेणी कि है तराई क्षेत्रो में काफी प्रचलित है फलोत्पादन अच्छा है .
पौधरोपण 
पौध लगाने का उत्तम समय जून और जुलाई का महिना है . पौधे से पौधे और लाइन से लाइन कि दूरी भूमि कि उपजाऊ शक्ति के अनुसार 10 से 12 मीटर रखनी चाहिए . मई से जून के प्रथम सप्ताह तक 10 से 12 मीटर कि दूरी पर एक मीटर व्यास और एक मीटर गहराई के गड्ढ़े खोदकर 8 से 15 दिनों तक खुले रहने चाहिए . तत्पश्चात मिटटी व अच्छी सड़ी हुई गोबर कि खाद - बराबर बराबर मात्रा में लेकर कम से 2 ग्राम आर्गेनिक खाद मिश्रण डालकर गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये और उसमे पुन किलो : मिटटी व खाद का मिश्रण डालकर भर दिया जाये कम . दोवारा भरने के बाद भी सिंचाई आवश्यक है . ताकि गड्ढ़े कि मिटटी बैठकर ठोस हो जाये तत्पश्चात जुलाई में पौधा का रोपण किया जा सकता है . यदि खेत कि मिटटी चिकनी हो तो खेत कि मिटटी खाद व बालू रेत बराबर - बराबर मात्रा में मिला देना चाहिए 

जलवायु का उपयोग 
जाड़े के दिनों में अधिक पाला तथा गर्मी के दिनों में गर्म हवाओ से लू को लीची से हानी होती है . पाले से नई और - कभी कभी पुरानी पत्तियां तथा टहनियां मर जाती है . फलों के पकने के समय लू चलने से इसके फलों में फटन आ जाती है . जिससे फल ख़राब होकर गिरने लगते है . अगेती किस्मों में फल सूर्य कि कड़ी धुप से झुलस जाते है . और फट भी जाते है . जिसे सनस्काल्ड कहते है . यह हानी उस समय अधिक होती है . जब तापक्रम 38 डि 0 से 0 से अधिक हो जाता है और हवा में आद्रता 60 प्रतिशत से कम हो जाती है . इसलिए उन क्षेत्रों में जहाँ का 38 डि 0 से 0 से अधिक हो जाये और आद्रता तापक्रम 60 प्रतिशत से कम हो जाये , लीची कि खेती सफलतापूर्वक करना संभव नहीं है . 38 डि 0 से 0 से कम तापक्रम और 150 सेमी 0 वर्षा वाले क्षेत्र जहाँ आद्रता 60 प्रतिशत से ऊपर हो , लीची कि खेती के लिए उत्तम है .

सावधानियाँ इस प्रकार 

1. पौधों के थालों में नमी बनी रहनी चाहिए वर्षा न होने कि स्थिति में नए पौधों के थाले सूखने नहीं चाहिए . दुसरे अधिक वर्षा कि स्थिति में थालो में पानी रुकना नहीं चाहिए .

2. सर्दियों में पाले से बचाना आवश्यक है जिसके लिए 10 के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए दिन प्रति .गर्मियों में लू से बचाने के लिए प्रति सप्ताह सिंचाई करते रहना चाहिए .

प्रारंभिक 3. अवस्था में में पौधों को पाले और लू से बचने के लिए पौधों को पूर्व कि ओर से खुला छोड़कर शेष तीनो दिशाओं में पुवाल , गन्ने कि पत्तियों और बॉस कि खप्पचियों अथवा अरहर आदि कि डंडियों कि मदद से ढ़क देना चाहिए

4. सूर्य कि तेज धुप से बचाने के लिए तनों को चुने के गाढ़े घोल से पोत देना चाहिए .

5. उत्तर - पश्चिम व दक्क्षिण दिशा में जमौआ या शीशम आदि का सघन वृक्ष रोपण वायु अवरोधक के रूप में किया जाना चाहिए .

6. फलत वाले पेड़ों में सर्दियों में 15 दिन के अंतर पर और गर्मियों में फल बनने के पश्चात् लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए जल्दी जल्दी सिंचाई करते रहना चाहिए इस समय पानी कि कमी नहीं होना चाहिए . अन्यथा झड़ने और फटने का डर रहता है .
जैविक खाद

अच्छी सड़ी हुयी गोबर कि खाद पहले साल 10 किलो ग्राम दुसरे साल 20 किलो ग्राम तीसरे साल 30 किलो ग्राम 4 थे साल 40 किलो ग्राम पांचवे साल या उससे ज्यादा उम्र के पौधे को प्रति साल किलो ग्राम प्रति पौधा देते है प्रत्येक तरह का खाद देने के बाद पानी देना आवश्यक है .
 से भरपूर फुल भी आएगा और भरपूर फसल या फल सेहत मंद स्वादिष्ट तैयार होगा .
सिंचाई इस प्रकार करें
जलवायु और मिटटी कि किस्म के अनुसार लीची के बाग़ कि सिंचाई कि जाना चाहिए बलुई मिटटी में जल्दी - जल्दी और चिकनी मिटटी में कुछ देर से सिंचाई कि आवश्यकता होती है . इसी प्रकार नम जलवायु में कम और खुश्क जलवायु में अधिक अर्थात - बार बार सिंचाई कि आवश्यकता होती है . उत्तर भारत में वर्षा के बाद सर्दियों में पाले से बचाने के लिए उस समय सिंचाई अवश्य कर देनी चाहिए जब पाला पड़ने का भय हो . साधारण अवस्था में जाड़े में दो सिंचाई पर्याप्त है . फ़रवरी से जून तक 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना आवश्यक है . फलों के पकने के समय भी लगातार आद्रता बनाये रखने के लिए - बार बार सिंचाई कि आवश्यकता पड़ती है . छोटे पौधों को गर्मियों में हर सप्ताह तथा जाड़े में हर 15 दिन बाद सींचना आवश्यक है

नीम का काढ़ा 
24 नीम का पत्ती ताजा हरा तोड़कर कुचल कर पीसकर किलो 5 लीटर पानी में पकाए जब पानी 20 0-25 लीटर रह जाय उतार कर ठंडा कर 500 ग्राम प्रति पम्प पानी में मिलाकर किसी भी तरह के रोग व किट पतंगों के प्रकोप होने पर पौधे या फसल पर छिड़काव करे .
गौमूत्र 
देसी गाय का 10 लीटर गौ मूत्र लेकर कांच के बर्तन या पारदर्शी प्लास्टीक के बर्तन या जार में लेकर 10 -15 दिन धुप में रखकरआधा लीटर प्रति पम्प लेकर पानी में मिलाकर रोग ग्रस्त किट ग्रस्त पौधों या फसलो पर छिड़काव करे .
तुड़ाई ऐसे करो 
किस्म के अनुसार लीची के फल पकने के समय गुलाबी , पिला पीलापन लिए हुए हरे हो जाते है तथा उनके छिलके पर उपस्थित ग्रंथिया चपटी हो जाती है लीची के फलो को टहनी में गुच्छो सहित तोड़ना चाहिए इसमें गुच्छो को रखने और ले जाने में आसानी होती है इससे फल अच्छे और ठीक अवस्था में होते है फलो के गुच्छे टोकरियों में पत्तियां बिछा कर उन पर रखी जाती है और इस प्रकार बेचने हेतु बाजार ले जाते है फलो को यदि दूर के बाजारों में भेजना हो तो फलो को भूरा रंग आने पर ही तोड़ लेना चाहिए तथा लकड़ी कि पतियों में पैक कर बाजार भेज देना चाहिए फल तोड़ने के 24 घंटे बाद रंग बदलने लगते है तथा 3-4 दिनों बाद कत्थई रंग के हो जाते है .
उपज के प्रकार 
गुटी द्वारा तैयार पौधे 5 6 वर्षो बाद फलाना प्रारंभ कर देते है लीची में फुल मार्च महीने में आते है तथा फल मई के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम या द्वितीय सप्ताह तक पकते है लीची का पेड़ लगभग 20 वर्ष में पूर्ण बिकसित हो जाता है - और पूर्ण बिकसित पेड़ से लगभग से 3 कुंतल फल प्राप्त हो जाते है .
भण्डारण
लीची के फलो को डंठल तोड़कर भली भंति साफ कर ले पोलीथिन कि छिद्र युक्त थैलियों में बंद 40 से 43 डिग्री से करके ग्रे .. तापक्रम तक 90 आद्रता पर शीत गृह में 28 से 30 दिन तक अच्छी दशा में भण्डारण किया जा सकता है गुदे के चीनी . % 40 के घोल में बंद करके जीरो डिग्री से ग्रे . से -17.8 डिग्री से निचे ग्रे .. तापक्रम पर 270 से 360 दिनों तक अच्छी दशा में रखा जा सकता है

Category: खेती

केले की खेती

19 January, 2018 - 08:28

अगर आप केले (Banana) की खेती करने का सोच रहे है तो इस खेती के लिए वैज्ञानिक तकनीको को अपनाएं। केले की खेती से किसानो को काफी मुनाफा हो सकता है क्योंकी केला पका हो या फिर कच्चा बाज़ार में इन दोनों के अच्छे दाम मिल जाते है । केले के अच्छे उपज के लिए कुछ बातों का खास ख्याल रखना होता है जैसे की भूमि और मिट्टी का चयन , पौधे की सिंचाई, आदि । तो आइये हम जानते है  कैसे करे केले की खेती ।

केले की खेती की जानकारी

केले की खेती में अच्छे उपज की प्राप्ति उसके जलवायु पर depend करता है । पश्चमी और उत्तरी भारत में केले के बिज रोपन का सही समय मानसून के शुरुआत में होता है जो की जून या जुलाई का महिना होता है।

भूमि का चयन व तैयारी 

वैसे तो केले की खेती सभी प्रकार के मिट्टी पर की जा सकती है लेकिन दोमट मिट्टी जिसमे जल निकासी की अच्छी व्यवस्था हो तो उसे सबसे सर्वोतम माना जाता है । बीज रोपने से पहले मिट्टी पलटने वाली हल द्वारा भूमि की अच्छे से जुताई कर लेनी चाहिए साथ ही मांदा निर्माण कर के केले की खेती करने से अधिक उत्पादन होता है

बीज रोपन 

बिज रोपने से पहले भूमि को गहरा जुताई कर के उसे भुरभुरा बना लेना चाहिए और फिर उस भूमि को ट्रेक्टर या पाटा द्वारा समतल बना देना चाहिए। जब खेत अच्छे से तैयार हो जाये तो फिर उसमे 50 cm लम्बा, 50 cm चौड़ा और 50 cm गहरा गड्ढा खोद लेना चाहिए । केले के रोपन के वक़्त ऊँची जाती के पौधों को 3 m और छोटे जातियों के पौधों को 2 m की दूरी पर रोपना चाहिए

सिंचाई प्रबंधन:केले के खेती में सिंचाई की अव्यश्कता भूमि और जलवायु पर निरभर करता है। अगर पौधे को  रोपने के बाद एक दो दिन के अन्दर वर्षा ना हो रही हो तो तुरंत सिंचाई कर देनी चाहिए । जाड़े के मौसम में लगभग 10 से 12 दिनों के अंतर में और गर्मी की समय लगभग 5 से 7 दिनों के अंतर में सिंचाई करनी चाहिए ।

केले के खेती में अच्छे उपज के लिए कृषि वैज्ञानिको द्वारा बताए गए तरीको से खाद देनी चाहिए। पौधे को रोपने समय गड्ढे में गोबर (cow dung) की खाद 20 kg, nitrogen 100 gram, सल्फर (sulfur) 150 gram और पोटाश (potash) 150 gram देना चाहिए

रोग / किट पतंग 

केले के पौधे को रोगों से बचाने के लिए थोड़ी सी सावधानी बरतनी पड़ती है । तना विविं और माहू ये दोनों केले के पौधे में लगने वाले कीटो के नाम है ।

केले के पौधों को प्रभावित करने वाले रोगो का नाम है 

 

पनामा रोग:- इस रोग से 50 प्रतिशत से अधिक फसल का नुकसान हो जाता है।

बंची टॉप रोग

पण चत्ति रोग

 

केले के पौधों में लगने वाले इन रोगों और कीटो से बचने के लिए वैज्ञानिको की सलाह अनुसार फफूंदी नाशक दवाइयों का इस्तेमाल करनी चाहिए

साभार: http://www.hindiremedy.com/kele-ki-vaigyanik-kheti-jankari/Category: खेतीTags: केले की खेतीप्रति एकड़ केले की खेती लाभकल्चर केले की खेतीकेले की खेती से कमाईकेले का बीजटिशू कल्चर केलाकेला का वानस्पतिक नाम

मौसंबी की उन्नत खेती के उन्नत तरीके

18 January, 2018 - 09:22

 देश मे मुख्य रूप महाराष्ट्र मे बडे पैमाने पर इस फसल का उत्पादन किया जाता है। जिसमें अहमद नगर, पुणे , जलगाॅव, जालना, औरंगाबाद, नागपुर, अमरावती जिले अग्रणी है। इसके अतिरीक्त मध्यप्रदेश मे छिंदवाड़ा जिले मे सौसर एवं पांढुरना तहसील मे इसका उत्पादन लिया जाता है। इसके अतिरीक्त आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान, पंजाब, हरियाना राज्यो मे मौसंबी की खेती की जाती है।

मौसंबी के लिए जमीन किस प्रकार किहोनी चाहिए

सामान्य काली, 2 फिट तक गहरी वालुकामय जमीन मौसंबी के लिए उत्तम होती है। जमीन का पी. एच. मान 6.5 से 7.5 होना चाहिए। 

 मौसमी खेती की तैयारी करे ऐसे  

मौसंबी के पौधे लगाने के लिए ग्रीष्म काल मे खेत 18  ग् 18 फिट पर मार्क करके 1.5 ग् 1.5 ग् 1.5 फिट गढ्ढे कर लेने चाहिए तथा उन्हे 1 से 1.5 माहतक वैसे ही छोड देना चाहिए जिससे धुप से हानिकारक किट मर कर जाए उसके पश्चात प्रत्येक गढ्ढे मे 40 किलो गोबर की खाद या उपजाउ मिट्टी 1 किलो सुपर फास्फेट 100 ग्राम किटनाशक के मिश्रण से गढ्ढे भर देना चाहिए। पौधे लगाते समय पौधे की आॅख जमीन से 2 से 3 इंच उपर रहे इस बात का ध्यान रहे मौसंबी वर्ष भर कभी भी लगाई जा सकती है। 

मौसमी में सिंचाईके लिए निदाई गुडाई 

मौसंबी लगाने के बाद पौधे को स्थिर होने के लिए 2 महिने लगते है। पौधो को लगाने के बाद नियमीत पानी देना चाहिए। हो सके तो ड्रिप सिचाई का उपयोग करना चाहिए, पौधो को थंड के मौसम मे 15 से 20 दिन एवं एवं ग्रीष्म काल मे 8 से 10 दिन मे पानी देना चाहिए। खेत मे बरसात का पानी का संचय ना हो इसका ध्यान रखना चाहिए। 

खाद् एवं उर्वरक का प्रयोग 

     मौसंबी यह बहुवर्षीय बागवानी फसल है। अच्छी उपज लेने के लिए नियमीत खाद एवं उर्वरक देना चाहिए जिससे पौधे का पोषन अच्छी तरह हो एवं अच्छी गुणवत्ता के फल प्राप्त हो मौसंबी के पौधे को प्रथम वर्ष 10 किलो गोबर कि खाद, 1 किलो निम कि खाद, नाइट्रोजन 100 ग्राम, फास्फोरस 150 ग्राम, पोटाश 150 ग्राम देना चाहिए एवं 5 वर्ष से 30 किलो की गोबर कि खाद, 5 किलो निम खाद, नाइट्रोजन 800 ग्राम, फास्फोरस 300 ग्राम पोटाश 600 ग्राम कि निर्धारित मात्रा वर्ष मे तिन बार देना चाहिए इसके अतिरीक्त 250 ग्राम सुक्ष्म पोषक तत्व वर्ष मे एक बार देना चाहिए। इसके अतिरीक्त जिवामृत का उपयोग करना चाहिए। जिसमे 200 लि. ड्रम मे 60 किलो गाय को गोबर 500 ग्राम राइजोबियम 500 ग्राम पी.एस.बी। ट्रायकोडरमा 2 किलो गुड, 2 किलो चना, उडद, मुंग, सोयाबिन, ज्वार का 2 किलो आटा 4 दिन सडाने के बाद सिंचाई के वक्त देने से अच्छे नतिजे मिलते है। यह वर्ष मे 2 से 3 बार दे इसमे अतिरिक्त हरी खाद का उपयोग करना चाहिए।

पौधो को आकार किस प्रकार का देना

     मौसंबी को छतरी का आकार देना चाहिए जिसके लिए तने के 2.5 फिट से 4 से 6 टहनिया रखनी चाहिए प्रथम वर्ष पौधो को लकडी की सहायता से साहारा देना चाहिए। 

 

बहार पकडना 

मौसंबी मे मुख्य रूप से 3 बहार आते है। जुलै से अगस्त मृग सितंबर से नवंबर हस्त फरवरी से मार्च अंबिया 5 वर्ष बाद मौसंबी फल उत्पादन देने लायक हो जाती है। मौसंबी यह सदा हरित पौधे होने से पानी का योग्य नियोजन एवं पौधे मे बहार की अवस्था पहचानने के लिए 1.5 से 2 माह विश्राम देने पर पौधो पर भरपुर फुल आते है। इसे ही बहार कहा जाता है । पौधे मे बहार की अवस्था पहचानने के लिए 1.5 से 2 माह पौधो को पानी नही देना चाहिए। जिससे पौधो की पत्तिया पिली पडकर सुख जाती है एवं गलने लगती है। 30 प्रतिशत पत्तीया गिरने पर बहार की अवस्था पुर्ण हुई समझना चाहिए उसके पश्चात पौधे को खाद देकर सिंचाई करना चाहिए। 

     मौसंबी को छतरी का आकार देना चाहिए जिसके लिए तने के 2.5 फिट से 4 से 6 टहनिया रखनी चाहिए प्रथम वर्ष पौधो को लकडी की सहायता से साहारा देना चाहिए। 

डायबैक 
पौधे की टहनियों से इसकी शुरूवात होती है, शुरूवात में पौधे के पत्ते पिले पड़ जाते है, एवं टहनियाॅ उपर से सुखती है। समय पर उपचार नही किया तो पौधा पुरा सुख जाता है। 
    उपचार 
पौधे की सुखी टहनिया काट लेनी चाहिए एवं काॅपर आॅक्सीक्लोराइड या रेडोमिल का छिडकाव करना चाहिए तथा रोगग्रस्त पौधे कि जड़े पौधे कि जडे़ खुली करके उपरोक्त दवा पानी में मिलाकर डालनी चाहिए। 
    गमोसिस
यह फायटोप्थोरा नामक फंगस से होता है, जिससे तने में जख्म, अन्नद्रव कि, कमतरता जिवाणु, विषाणु से यह रोग होता है, जिससे तना फट जाता है एवं एक चिपचीपा द्रव रिसता है। जिससे पौधा कमजोर होता है। 

   उपचार 
पौधे की सुखी टहनिया काट लेनी चाहिए एवं काॅपर आॅक्सीफलोराइट या क्लोरोथोनोनील या रेडोमील का छिड़काव करना चाहिए। खेत में पानी रूकने न दे। पौधें तने में जखम से द्रव का रिसाव देखते ही साफ करे, एरंडी के तेल में रेडोमील या काॅपर आॅक्सीक्लोराइड का मलहम लगाने से रिसाव बंद हो जाता है। पौधे को वर्ष में 2 बार बोंर्डो पेस्ट लगाना चाहिए। 
  कैंकर 
यह भयानक रोग है, इस भयानक रोग का प्रकोप फल एवं पत्तियों में दिखाई देता है, शुरूवात में पत्तों के निचले भाग में लक्षण प्रगट होते है, जिससे पिले भुरे रंगे के धब्बे दिखाई देेते है। जिससे पत्तिया पिली पड़ कर गिर जाती है। फल धब्बे खुरदरे भुरे रंग के छिलके की गहराई तक होते है, जिससे छिलके फट जाते है। 

 
उपचार
 बरसात में रोगग्रस्त टहनिया काटकर जला देनी चाहिए, रोगग्रस्त पौधों को बरसात में कार्बेन्डाजीम 2 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करना चाहिए एवं काॅपर आॅक्सीफलोराइट 3 ग्राम $ स्ट्टोसाइक्सीन 0.25 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल बनाकर आवष्यकतानुसार छिड़काव करना चाहिए

मौसंबी पौधों की देखभाल

 

  •     पौधे लगाने के बाद एक महिने के अंदर क्लोरोपायरीफास 3 मि.ली. $ हुमिक एसीड 3 मि.ली. $ कारबौन्डाजाइम 3 ग्राम प्रति ली. पानी में घोल बनाकर 1 से 2 ली. प्रति पौधे की जड़ो में घोल डालना चाहिए। 
  •    रोग मुक्त नर्सरी से ही पौधे खरिदी करे। 
  •   पौधों की जुलाई एवं फरवरी में बाडो पेस्ट लगाए। 
  •    पौधे लगाने के 4 वर्ष तक जुलाई सप्टेंबर फरवरी में मोनोक्रोटोफास 20 मि.ली. या एसिफेट 20 ग्राम या ट्रयसोफास 30 मि.ली. 10 ली. पानी में घोल बनाकर छिड़काव करे। 
  •     पौधे की सुखी रोगग्रस्त विकृत टहनिया हर वर्ष निकालना चाहिए, उसके पष्चात् काॅपर आॅक्सीक्लोराट का छिड़काव करना चाहिए।  
  •   मौसंबी के बगीचे में 4 वर्ष तक के सोयाबीन, उडद मुंग मिर्ची कपास फसले लेनी चाहिए। 5 वर्ष के बाद कोई फसल नही लेना चाहिए। 
  •   टपक सिंचाई का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करे। 

 फलों की परिपक्वता एवंन  उत्पाद
मौसंबी 7 से 9 माह में परिपक्व हो जाते है। अंबिया बहार नवंबर एवं मृग फरवरी माह में फलो का रंग हरे से हल्का पिला फलों में चमक आ जाती है एवं फलों की कठोरता कम हो जाती है। तो समझना चाहिए कि, फल परिपक्व हो गये है। फलो की उत्पादकता 5 से 6 वर्ष पौधों से 200 से 400 फल एवं 10 वर्ष से आगे 1000 तक फल प्राप्त होते है। पौधे का जीवन अच्छी व्यवस्था होने पर 30 से 40 वर्ष उत्पादन देते है।

 मौसंबी पौधे की उपलब्धता 
संतरे एवं मौसंबी के अच्छी गुणवत्ता के पौधे हमारे क्षेत्र में जुन से आॅक्टोबर तक उपलब्ध रहते है, निबू वर्गीय पौधे की मंडी के रूप में महाराष्ट्र के ग्राम शेंदुरजना घाट, तह. वरूड, जिला-अमरावती से हर साल दुसरे प्रदेषों में लाखों पौधे किसान ले जाते है या उत्तम दर्जे के पौधे उपलब्ध कराने में हमम दत कर सकते है। 

 

Category: खेती

गाजर की खेती कैसे करें

17 January, 2018 - 10:55

गाजर के रस का एक गिलास पूर्ण भोजन है। इसके सेवन से रक्त में वृद्धि होती है।मधुमेह आदि को छोड़कर गाजर प्रायः हरेक रोग में सेवन की जा सकती है। गाजर के रस में विटामिन ‘ए’,'बी’, ‘सी’, ‘डी’,'ई’, ‘जी’, और ‘के’ मिलते हैं। गाजर का जूस पीने या कच्ची गाजर खाने से कब्ज की परेशानी खत्म हो जाती है। यह पीलिया की प्राकृतिक औषधि है। इसका सेवन ल्यूकेमिया (ब्लड कैंसर) और पेट के कैंसर में भी लाभदायक है। इसके सेवन से कोषों और धमनियों को संजीवन मिलता है। गाजर में बिटा-केरोटिन नामक औषधीय तत्व होता है, जो कैंसर पर नियंत्रण करने में उपयोगी है।इसके सेवन से इम्यूनिटी सिस्टम तो मजबूत होता ही है साथ ही आँखों की रोशनी भी बढ़ती है। 

गाजर एक मूल्यवान सब्जी है जिसका प्रयोग भारत के सभी प्रान्तों में होता है । गाजर का मूल स्थान पंजाब तथा कश्मीर है । इसकी जड़ को कच्चा, पकाकर तथा अचार बनाकर प्रयोग करते हैं । इसके अतिरिक्त हलुवा, रायता तथा जूस बनाकर प्रयोग करते हैं । गाजर के अन्दर कैरीटीन, थायेमिन, राईबोफिलेविन तथा विटामिन ‘ए’ की मात्रा अधिक पायी जाती है । हृदयरोग के लिए इसका मुरब्बा उपयुक्त रहता है ।

गाजर की खेती के लिए आवश्यक भूमि व जलवायु  
इसकी फसल को लगभग हर प्रकार की भूमि में उगाया जाता है लेकिन सबसे उपयुक्त बलुई दोमट भूमि होती है । मिट्‌टी उपजाऊ हो तथा जल-निकास का उचित प्रबन्ध हो | गाजर ठन्डे मौसम की फसल है | पाला सहन करने की  क्षमता रखती है । 15-20 डी० से० तापमान वृद्धि के लिए अच्छा रहता है । लेकिन अधिक तापमान से स्वाद बदल जाता है |

गाजर की खेती के लिए खेत की तैयारी 

गाजर के खेत की जुताई खेत खाली होने पर गर्मियों में करें तथा जिससे मिटटी को तेज धूप लगे तत्पश्चात् 3-4 जुताई हैक्टर हैरो या कल्टीवेटर द्वारा करनी चाहिए । बाद में देशी हल या ट्रैक्टर-ट्रिलर से करके पाटा चलायें जिससे मिट्‌टी भुरभुरी हो जाये । खेत तैयार होने पर छोटी-छोटी क्यारियां बनायें तथा बुवाई करें ।

बगीचों में भी 3-4 गहरी खुदाई करके देशी खाद मिलाकर क्षेत्र को तैयार करें तथा क्षेत्र खोदने के बाद में समतल करें |

गाजर की उन्नतशील किस्में 

गाजर की मुख्य किस्में हैं जिन्हें आसानी से उगाया जा सकता है-

पूसा-केसर (Pusa-Kasher)- यह एक उन्नतशील एशियाई किस्म है जिसकी जड़ें लाल, नारंगी-सी होती है । जड़ें लम्बी, पतली व कम पत्तियां होती हैं । यह अगेती किस्म है जो अधिक तापमान को सहन कर लेती है ।
पूसा-यमदिग्न (Pusa-Yamdigan)- यह किस्म अधिक उपज देती है । अन्य जड़ों से ‘कैरोटीन’ अधिक होती है । जड़ों का रंग हल्का नारंगी व केन्द्रक हल्का पीला रंग लिये होता है । गूदा खुशबू वाला, मुलायम व मीठा होता है ।
पूसा-मेधाली (Pusa-Madhale)- भा. कृ. अनु. संस्थान पूसा, न. दि. के द्वारा शीघ्र ही विकसित की गयी है । यह किस्म भी अच्छे गुण वाली है ।
नैन्टीस (Nantes)- यह किस्म एक योरोपियन किस्म है । यह ऊपर से मीठी होती है । लाल व नारंगी रंग की जड़ें होती है । जड़ें लम्बी, पतली गोलाकार तथा नीचे से पतली होती हैं । गूदा गहरे रंग का नारंगी व सुगन्धित होता है । पत्तियां अधिक होती हैं ।
चांटनी (Chantne)- यह किस्म आकर्षित करने वाली है । जड़ें लाल, नारंगी होती हैं जो गोल, पतली, मीठी व अधिक पत्तियां होती हैं ।

बीज की मात्रा, बोने का समय एवं ढंग 

गाजर के बीज की मात्रा 6-7 किलो प्रति हैक्टर आवश्यकता पड़ती है । अधिक तापमान पर बोने के लिए बीज की मात्रा अधिक बोयें । अगेती किस्मों को सितम्बर-अक्टूबर तथा मध्यम व पिछेती किस्मों को नवम्बर के अन्तिम सप्ताह तक बोना चाहिए ।

बुवाई कतारों में मेंड़ बनाकर करें । इन मेडों की आपस की दूरी 40-45 सेमी. रखें या छोटी-छोटी क्यारियां-बना कर बोयें । पौधे से पौधे का अन्तर 6.8 सेमी. रखें । गहराई हल्का बीज होने से 1.5 सेमी. रखें । अधिक गहराई से बीज गल जाता है ।

बगीचों के लिए उचित बीज की मात्रा 10-12 ग्राम. 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र के लिये पर्याप्त होता है । बीजों को कतारों में बोयें । कतारों को 30 सेमी. पर रखें तथा बीज से बीज की दूरी 6.7 सेमी. रखें । बुवाई सितम्बर से नवम्बर तक करें ।

खाद व उर्वरकों की मात्रा 

गाजर के लिये देशी गोबर की खाद 15-20 ट्रौली (एक ट्रौली 1 टन के बराबर) प्रति हैक्टर मिट्‌टी में मिलायें तथा नाइट्रोजन 60 किलो, फास्फोरस 40 किलो तथा पोटाश 80 किलो प्रति हैक्टर बुवाई से 15-20 दिन पहले मिट्‌टी में भली-भांति मिलायें । लेकिन नाइट्रोजन की आधी मात्रा को बचाकर बोने के 35-40 दिन बाद छिड़कें जिससे जड़ें अच्छी वृद्धि कर सकें ।

बगीचों के लिये 300 ग्राम यूरिया, 200 ग्राम डी.ए.पी. तथा 400 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में डालें । यूरिया की आधी मात्रा को  30-35 दिन के बाद छिड़कें । देशी खाद की आवश्यकता हो तो 5-6 टोकरी डाल कर मिट्‌टी में मिलायें ।

सिंचाई 

बुवाई के लिये पलेवा करें या नमी होने पर बोयें । बुवाई के 10-15 दिन के बाद नमी न होने पर हल्की सिंचाई करें । सिंचाई अधिक पैदावार लेने के लिए आवश्यक है । इसलिए हल्की-हल्की जल्दी सिंचाई करें ।

बगीचों में भी सिंचाई शीघ्र करें । कम पानी देने से जड़ें वृद्धि नहीं करती हैं । इसलिए पानी 2-3 दिन बाद देते रहें ।

खरपतवार नियन्त्रण 

गाजरों की निकाई-गुड़ाई खरपतवारों को निकालने के लिये करें तथा पहली गड़ाई सिंचाई करने के 4-5 दिन बाद ही करें । घास को निकालकर बाहर फेंके तथा थीनिंग भी साथ-साथ करें । पौधों की दूरी 6-8 सेमी. पर रखें । फालतू पौधों को उखाड़ दें ।

रोगों से गाजर के पौधों की सुरक्षा कैसे करें 

कीटों में अधिकतर पत्ती काटने वाला कीड़ा लगता है जो पत्तियों को काट कर क्षति पहुंचाता है । नियन्त्रण के लिये 2 ग्राम प्रति लीटर थापोडान दवा घोलकर छिड़कने से रोका जा सकता है तथा फसल को अगेती बोयें । गाजर की फसल में एक ‘पीलापन’ वाली बीमारी है जोकि पत्तियों को खराब करती है । ये विषाणु वाली बीमारी है जो लीफ होयर द्वारा फैलती है । नियन्त्रण के लिये बीजों को 0.1% मरक्यूरिक-क्लोराइड से उपचारित करके बोने पर बीमारी नहीं लगती है ।

खुदाई 

गाजर की खुदाई भी जड़ों के आकारानुसार करनी चाहिए । जब जड़ों की मोटाई व लम्बाई ठीक बाजार लायक हो जाये तो खुदाई करनी चाहिए । खुदाई के 2-3 दिन पहले सिंचाई करें तत्पश्चात् खुदाई करना आसान हो जाता है । खुदाई के समय ध्यान रहे कि जड़ों को क्षति न पहुंचे । जड़ों के कटने से बाजार मूल्य घट जाता है ।

उपज 

गाजर की फसल का ठीक प्रकार से ध्यान रखा जाये तो उपज भी 250-300 क्विंटल प्रति हैक्टर प्राप्त होती है । उपज किस्मों पर अधिक निर्भर करती है ।

बगीचों में भी 15-20 किलो गाजर 8-10 वर्ग मी. क्षेत्र में प्राप्त हो जाती है जो कि समय-समय पर किचन में काम आती रहती है ।

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मक्का की खेती की अधिक उपज अधिक आमदनी हेतु तकनीक

17 January, 2018 - 06:07

 विश्व के अनेक देशो  में मक्का की खेती प्रचलित है जिनमें क्षेत्रफल एवं उत्पादन के हिसाब से संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, चीन और  ब्राजील का विश्व में क्रमशः प्रथम, द्वितिय एवं तृतीय स्थान है । पिछले कुछ वर्षो  में मक्का उत्पादन के  क्षेत्र में भारत ने नये कीर्तिमान स्थापित किये है जिससे वर्ष 2010-11 में मक्का का उत्पादन 217.26 लाख टन के  उच्च स्तर पर पहुंच गया है मक्का को  विशेष रूप से गरीबो  का मुख्य भोजन माना जाता था परन्तु अब ऐसा नही है । वर्तमान में इसका उपयोग मानव आहार (24 %) के  अलावा कुक्कुट आहार (44 % ),पशु आहार (16 % ), स्टार्च (14 % ), शराब (1 %) और  बीज (1 %) के  रूप में किया जा रहा है । गरीबों का भोजन मक्का अब अपने पौष्टिक गुणों के कारण अमीरों के मेज की शान बढ़ाने लगा है। मक्का के दाने में 10 प्रतिशत प्रोटीन, 70 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट, 4 प्रतिशत तेल, 2.3 प्रतिशत क्रूड फाइबर, 1.4 प्रतिशत राख तथा 10.4 प्रतिशत एल्ब्यूमिनोइड पाया जाता है। मक्का के  में भ्रूण में 30-40 प्रतिशत तेल पाया जाता है। मक्का की प्रोटीन में जीन  प्रमुख है जिसमें ट्रिप्टोफेन तथा लायसीन नामक दो आवश्यक अमीनो अम्ल की कमी पाई जाती है। परन्तु विशेष प्रकार की उच्च प्रोटीन युक्त मक्का में ट्रिप्तोफेंन   एवं लाईसीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो  गरीब लोगो को  उचित आहार एवं पोषण प्रदान करता है साथ ही पशुओ  के  लिए पोषक आहार है । यह पेट के अल्सर और गैस्ट्रिक अल्सर से  छुटकारा दिलाने में सहायक है, साथ ही यह वजन घटाने में भी सहायक होता है। कमजोरी में यह बेहतर ऊर्जा प्रदान करता है और बच्चों के सूखे के रोग में अत्यंत फायदेमंद है। यह मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखता है, दाँत मजबूत रखता है, और कार्नफ्लेक्स के रूप में लेने से हृदय रोग में भी लाभदायक होता है।मक्का के स्टीप जल में एक जीवाणु को पैदा करके इससे पेनिसिलीन दवाई तैयार करते 

 भूमि की जल व हवा संधारण क्षमता बढ़ाने तथा उसे नींदारहित करने के उद्देश्य  से ग्रीष्म-काल में भूमि की गहरी जुताई करने के उपरांत कुछ समय के लिये छोड़ देना चाहिएमक्का के  में भ्रूण में 30-40 प्रतिशत तेल पाया जाता है। मक्का की प्रोटीन में जीन  प्रमुख है जिसमें ट्रिप्टोफेन तथा लायसीन नामक दो आवश्यक अमीनो अम्ल की कमी पाई जाती है। परन्तु विशेष प्रकार की उच्च प्रोटीन युक्त मक्का में ट्रिप्तोफेंन   एवं लाईसीन पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो  गरीब लोगो को  उचित आहार एवं पोषण प्रदान करता है साथ ही पशुओ  के  लिए पोषक आहार है । यह पेट के अल्सर और गैस्ट्रिक अल्सर से  छुटकारा दिलाने में सहायक है, साथ ही यह वजन घटाने में भी सहायक होता है। कमजोरी में यह बेहतर ऊर्जा प्रदान करता है और बच्चों के सूखे के रोग में अत्यंत फायदेमंद है। यह मूत्र प्रणाली पर नियंत्रण रखता है, दाँत मजबूत रखता है, और कार्नफ्लेक्स के रूप में लेने से हृदय रोग में भी लाभदायक होता है।मक्का के स्टीप जल में एक जीवाणु को पैदा करके इससे पेनिसिलीन दवाई तैयार करते है

 मक्का की खेती के लिए भूमि का चयन और तैयारी 

 मक्का की खेती लगभग सभी प्रकार की कृषि योग्य भूमियों में की जा सकती है परन्तु अधिकतम पैदावार के लिए गहरी उपजाऊ दोमट मिट्टी  उत्तम होती है, जिसमे वायु संचार व जल निकास उत्तम हो तथा जीवांश पदार्थ प्रचुर मात्रा में हों। मक्का की फसल के लिए मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 के मध्य ( अर्थात न अम्लीय और  न क्षारीय) उपयुक्त रहता हैं। जहाँ पानी जमा ह¨ने की सम्भावना ह¨ वहाँ मक्के की फसल नष्ट ह¨ जाती है । खेत में 60 से.मी के अन्तर से मादा कूंड पद्धति  से वर्षा ऋतु में मक्का की बोनी करना लाभदायक पाया गया है।

भूमि की जल व हवा संधारण क्षमता बढ़ाने तथा उसे नींदारहित करने के उद्देश्य  से ग्रीष्म-काल में भूमि की गहरी जुताई करने के उपरांत कुछ समय के लिये छोड़ देना चाहिए। पहली वर्षा होने के बाद खेत में दो बार देशी हल या हैरो से जुताई  करके मिट्टी नरम बना ल्¨ना चाहिए, इसके बाद पाटा चलाकर कर खेत समतल किया जाता है। अन्तिम जोताई के समय गोबर की खाद या कम्पोस्ट मिट्टी में मिला देना चाहिए ।

उन्नत किस्में

संकर किस्में: गंगा-1, गंगा-4, गंगा-11, डेक्कन-107, केएच-510, डीएचएम-103, डीएचएम-109, हिम-129, पूसा अर्ली हा-1 व 2, विवेक हा-4, डीएचएम-15 आदि ।

सकुल किस्में: नर्मदा मोती, जवाहर मक्का-216, चन्दन मक्का-1,2 व 3, चन्दन सफेद मक्का-2, पूसा कम्पोजिट-1,2 व 3, माही कंचन, अरून, किरन, जवाहर मक्का-8, 12 व 216 , प्रभात, नवजोत आदि ।

विशिष्ट मक्का की अच्छी उपज लेने के लिए निम्नलिखित उन्नत प्रजातियों के शुद्ध एवं प्रमाणित बीज ही बोये जाने चाहिए।

1.उत्तम प्र¨टीन युक्त मक्का (क्यूपूपूपीएम): एच.क्यू  पी.एम.1 एवं 5 एवं शक्ति-1 (संकुल)

2.पाप कार्न: वी. एल. पापकार्न, अम्बर, पर्ल एवं जवाहर

3.बेबी कार्न: एच. एम. 4 एवं वी.एल. बेबी कार्न-1

4.मीठी मक्का: मधुरप्रिया एवं एच.एस.सी. -1(संकर)- 70-75 दिन, उपज-110 से 120 क्विंटल  प्रति है., 250-400  क्विंटल  हरा चारा।

5.चारे हेतु: अफ्रीकन टाल, जे-1006, प्रताप चरी-6

बोआई किस समय पर हो 

    भारत में मक्का की बोआई वर्षा प्रारंभ होने पर की जाती है। देश के विभिन्न भागों में (खरीफ ऋतु) बोआई का उपयुक्त समय जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के प्रथम पखवाड़े तक का होता है। शोध परिणामों से ज्ञात होता है कि मक्का की अगेती बोआई (25 जून तक) पैदावार के लिए उत्तम रहती है। देर से बोआई करने पर उपज में गिरावट होती है। रबी में अक्टूबर अंतिम सप्ताह से 15 नवम्बर तक बोआई करना चाहिए तथा जायद में बोआई हेतु फरवरी के अंतिम सप्ताह से मार्च तृतीय सप्ताह तक का समय अच्छा रहता है। खरीफ की अपेक्षा रबी में बोई गई मक्का से अधिक उपज प्राप्त होती है क्योंकि खरीफ में खरपतवारों की अधिक समस्या होती है, पोषक तत्वों का अधिक ह्यस होता है, कीट-रोगों का अधिक प्रकोप होता है तथा बदली युक्त मौसम केे कारण पौधों को सूर्य ऊर्जा कम उपलब्ध हो पाती हैं।जबकि रबी ऋतु में जल एंव मृदा प्रबंधन बेहतर होता है। पोषक तत्वों की उपलब्धता अधिक रहती है। कीट,रोग व खरपतवार प्रकोप कम होता है और फसल को प्रकाश व तापक्रम इष्टतम मात्रा में प्राप्त होता है।

सही बीज का चयन 

    संकर मक्का का प्रमाणित बीज प्रत्येक वर्ष किसी विश्वसनीय संस्थान से लेकर बोना चाहिये। संकुल मक्का  के लिए एक साल पुराने भुट्टे के बीज जो  भली प्रकार  सुरक्षित रखे  गये हो , बीज के लिए अच्छे रहते है । पहली फसल कटते ही अगले  वर्ष बोने के लिए स्वस्थ्य फसल की सुन्दर-सुडोल बाले (भुट्टे) छाँटकर उन्हे उत्तम रीति से संचित करना चाहिए । यथाशक्ति बीज को  भुट्टे से हाथ द्वारा अलग करके बाली के बीच वाल्¨ दानो  का ही उपयोग अच्छा रहता है । पीटकर या मशीन द्वारा अलग किये गये बीज टूट जाते है जिससे अंकुरण ठीक नहीं होता ।  भुट्टे के ऊपर तथा नीचे के दाने बीच के दानो  की तुलना में शक्तिशाली नहीं पाये गये है । बोने के पूर्व बीज की अंकुरण शक्ति का पता लगा लेना अच्छा होता  है । यदि अंकुरण परीक्षण नहीं किया गया है तो प्रति इकाई अधिक बीज बोना अच्छा रहता है । बीज का माप, बोने की विधि, बोआई का समय तथा मक्के की किस्म के आधार पर बीज की मात्रा  निर्भर करती है ।  प्रति एकड़ बीज दर एवं पौध  अंतरण निम्न सारणी में दिया गया है ।

                                           सामान्य मक्का     क्यूपीएम    बेबी कार्न    स्वीट कार्न    पाप कार्न    चारे हेतु

बीज दर (किग्रा. प्रति एकड़)             8-10              8           10-12            2.5-3          4-5           25-30

कतार से कतार की दूरी (सेमी)         60-75         60-75           60               75             60               30

पौधे  से पौधे  की दूरी (सेमी.)            20-25         20-22       15-20            25-30         20               10

 

    ट्रेक्टर चलित मेज प्लांटर अथवा देशी हल की सहायता से  रबी मे 2-3 सेमी. तथा जायद व खरीफ में 3.5-5.0 सेमी. की गहराई पर बीज बोना चाहिए। बोवाई किसी भी विधि से की जाए परंतु खेत में पौधों की कुल संख्या 65-75 हजार प्रति हेक्टेयर रखना चाहिए। बीज अंकुरण के 15-20 दिन के बाद अथवा 15-20 सेमी. ऊँचाई ह¨ने पर अनावश्यक घने पौधों की छँटाई करके पौधों के बीच उचित फासला स्थापित कर खेत में इष्टतम पौध संख्या स्थापित करना आवश्यक है। सभी प्रकार की मक्का में एक स्थान पर एक ही पौधा  रखना उचित पाया गया है ।

बीज का उपचार इस प्रकार   

    संकर मक्का के बीज पहले  से ही कवकनाशी से उपचारित ह¨ते है अतः इनको  अलग से उपचारित करने की आवश्यकता नहीं होती है । अन्य प्रकार के बीज को थायरम अथवा विटावेक्स नामक कवकनाशी  1.5 से 2.0 ग्राम प्रतिकिलो बीज की दर से उपचारित करना चाहिए जिससे पौधों क¨ प्रारम्भिक अवस्था में रोगों  से बचाया जा सके ।

बोआई की विधियाँ

मक्का बोने की तीन विधियाँ यथा छिटकवाँ, हल के पीछे और  डिबलर विधि प्रचलित है, जिनका विवरण यहां प्रस्तुत हैः

1.छिटकवाँ विधि:  सामान्य  तौर पर किसान छिटककर बीज बोते है तथा ब¨ने के बाद पाटा या हैरो  चलाकर बीज ढकते है । इस विधि से बोआई करने पर बीज अंकुरण ठीक से नहीं ह¨ पाता है, पौधे  समान और  उचित दूरी पर नहीं उगते  जिससे बांक्षित  उपज के लिए प्रति इकाई इश्टतम पौध  संख्या प्राप्त नहीं हो  पाती है । इसके अलावा फसल में निराई-गुड़ाई (अन्तर्कर्षण क्रिया) करने में भी असुविधा होती है । छिटकवाँ विधि में बीज भी अधिक लगता है ।

2. कतार बौनी : हल के पीछे कूँड में बीज की बोआई  सर्वोत्तम  विधि है । इस विधि में कतार से कतार तथा पौध  से पौध  की दूरी इष्टतम रहने से पौधो  का विकास अच्छा होता है । उपज अधिक प्राप्त होती है । मक्का की कतार बोनी के लिए मेज प्लान्टर का भी उपयोग किया जाता है ।

वैकल्पिक जुताई-बुवाई

        विभिन्न संस्थानो  में हुए शोध परिणामो  से ज्ञात होता है कि शून्य भूपरिष्करण, रोटरी टिलेज एवं फर्ब पद्धति जैसी तकनीको को  अपनाकर किसान भाई उत्पादन लागत को  कम कर अधिक उत्पादन ले सकते है ।

जीरो टिलेज या शून्य-भूपरिष्करण तकनीक इस तरह 

          पिछली फसल की कटाई के उपरांत बिना जुताई किये मशीन द्वारा मक्का की बुवाई करने की प्रणाली को जीरो टिलेज कहते हैं। इस विधि से बुवाई करने पर खेत की जुताई करने की आवश्यकता नही पड़ती है तथा खाद एवम् बीज की एक साथ बुवाई की जा सकती है। इस तकनीक से चिकनी मिट्टी के अलावा अन्य सभी प्रकार की मृदाओं में मक्का की खेती की जा सकती है। जीरो टिलेज मशीन साधारण ड्रिल की तरह ही है, परन्तु इसमें टाइन चाकू की तरह होता है। यह टाइन मिट्टी में नाली के आकार की दरार बनाता है, जिसमें खाद एवम् बीज उचित मात्रा में सही गहराई पर पहुँच जाता है।

फर्ब तकनीक से बुवाई किस प्रकार करें 

                 मक्का की बुवाई सामान्यतः कतारो  में की जाती है। फर्ब तकनीकी किसानों में प्रचलित इस विधि से सर्वथा भिन्न है। इस तकनीक में मक्का को ट्रेक्टर चलित रीजर-कम ड्रिल से मेंड़ों पर एक पंक्ति में बोया जाता है। पिछले कुछ वर्षों के अनुसंधान में यह पाया गया हैं कि इस तकनीक से खाद एवम् पानी की काफी बचत होती है और उत्पादन भी प्रभावित नही होता हैं। इस तकनीक से बीज उत्पादन के लिए भी मक्का की खेती की जा रही है। बीज उत्पादन का मुख्य उद्देश्य अच्छी गुणवता वाले अधिक से अधिक बीज उपलब्ध कराना है।

खाद और उर्वरक का प्रयोग

 मक्का की भरपूर उपज लेने के लिए संतुलित मात्रा में खाद एंव उर्वरकों का प्रयोग आवश्यक है। मक्के को  भारी फसल की संज्ञा दी जाती है जिसका भावार्थ यह है कि इसे अधिक मात्रा  में पोषक तत्वो  की आवश्यकता पड़ती है । एक हैक्टर मक्के की अच्छी फसल भूमि से ओसतन 125 किग्रा. नत्रजन, 60 किग्रा. फॉस्फ¨रस तथा  75 किलोग्राम पोटाश ग्रहण कर लेती है।अतः मिट्टी में इन प¨षक तत्वो  का पर्याप्त मात्रा  में उपस्थित रहना अत्यन्त आवश्यक है । भूमि में नाइट्रोजन की कमी होनेपर पौधा  छोटा और  पीला रह जाता है, जबकि फॉस्फ़ोरस कम होने पर फूल व दानो  का विकास कम होता है । साथ ही साथ जडो  का विकास भी अवरूद्ध ह¨ जाता है । भूमि में पोटाश की न्यूनता पर  कमजोर पौधे  बनते है, कीट-रोग का आक्रमण अधिक होता है । पौध  की सूखा सहन करने की क्षमता कम हो  जाती है । दाने पुष्ट नहीं बनते है । मक्के की फसल में 1 किग्रा नत्रजन युक्त उर्वरक देने से 15-25 किग्रा. मक्के के दाने प्राप्त होते हैं। मक्के की फसल में पोषक तत्वो  की पूर्ति के लिए  जीवाशं तथा रासायनिक खाद का मिलाजुला  प्रयोग बहुत लाभकारी पाया गया है। खाद एंव उर्वरकों की सही व संतुलित मात्रा का निर्धारण खेत की मिट्टी परीक्षण के बाद ही तय किया जाना चाहिए।

    मक्का बुवाई से 10-15 दिन पूर्व 10-15 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी हुई गोबर की खाद खेत में अच्छी तरह मिला देना चाहिए। मक्का में 150 से 180 किलोग्राम नत्रजन, 60-70 किलो ग्राम फास्फ़ोरस, 60-70 किलो ग्राम पोटाश तथा 25 किलो ग्राम जिंक सल्पेट प्रति हैक्टर देना उपयुक्त पाया गया है। संकुल किस्मो  में नत्रजन की मात्रा  उपरोक्त की 20 प्रतिशत कम देना चाहिए । मक्का की देशी किस्मो  में नत्रजन, स्फुर व पोटाश की उपरोक्त मात्रा  की आधी मात्रा  देनी चाहिए । फास्फोरस, पोटाश और जिंक की पूरी मात्रा तथा 10 प्रतिशत नाइट्रोजन को  आधार डोज (बेसल) के रूप में बुवाई के समय देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन की मात्रा को चार हिस्सों में निम्नलिखित विवरण के अनुसार देना चाहिए।

20 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में चार पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।

30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल में 8 पत्तियाँ आने के समय देना चाहिए।

30 प्रतिशत नाइट्रोजन फसल पुष्पन अवस्था में हो या फूल आने के समय देना चाहिए तथा

10 प्रतिशत नाइट्रोजन का प्रयोग दाना भराव के समय करना चाहिए।

सिचाई हो समय पर 

    मक्के की प्रति इकाई उपज  पैदा करने के लिए अन्य फसलो  की अपेक्षा अधिक पानी लगता है । शोध परिणामों में पाया गया है कि  मक्के में वानस्पतिक वृद्धि (25-30 दिन) व मादा फूल आते समय (भुट्टे बनने की अवस्था में) पानी की कमी से उपज में काफी कमी हो जाती है। अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए मादा फूल आने की अवस्था में किसी भी रूप से पानी की कमी नहीं होनी चाहिए। खरीफ मौसम में अवर्षा की स्थिति में आवश्यकतानुसार दो से तीन जीवन रक्षक सिंचाई चाहिये।

    छत्तीसगढ़ में  रबी मक्का के लिए 4 से 6 सिंचाई की आवश्यकता होती है। यदि 6 सिंचाई की सुविधा हो तो 4-5 पत्ती अवस्था, पौध  घुटनों तक आने  से पहले व तुरंत बाद, नर मंजरी आते समय, दाना भरते समय तथा दाना सख्त होते समय सिंचाई देना लाभकारी रहता है। सीमित पानी उपलब्ध होने पर एक नाली छोड़कर दूसरी नाली में पानी देकर करीब 30 से 38 प्रतिशत पानी की बचत की जा सकती है। सामान्य तौर पर मक्के के पौधे 2.5 से 4.3 मि.ली. प्रति दिन जल उपभोग कर लेते है। मौसम के अनुसार मक्के को पूरे जीवन काल(110-120 दिन) में 500 मि. ली. से 750 मि.ली. पानी की आवश्यकता होती है। मक्के के खेत में जल भराव  की स्थिति में फसल को भारी क्षति होती है। अतः यथासंभव खेत में जल निकाशी की ब्यवस्था करे।

खरपतवारो से फसल की सुरक्षा  इस प्रकार करें 

    मक्के की फसल तीनों ही मौसम में खरपतवारों से प्रभावित होती है। समय पर खरपतवार नियंत्रण न करने से मक्के की उपज में 50-60 प्रतिशत तक कमी आ जाती है। फसल खरपतवार प्रतियोगिता के लिए बोआई से 30-45 दिन तक क्रांन्तिक समय माना जाता है। मक्का में प्रथम निराई 3-4 सप्ताह बाद की जाती है जिसके 1-2 सप्ताह बाद बैलो  से चलने वाले  यंत्रो  द्वारा कतार के बीच की भूमि गो ड़ देने से पर्याप्त लाभ होता है । सुविधानुसार दूसरी गुड़ाई कुदाल आदि से की जा सकती है । कतार में बोये गये पौधो  पर जीवन-काल में, जब वे 10-15 सेमी. ऊँचे हो , एक बार मिट्टी चढ़ाना  अति उत्तम होता है । ऐसा करने से पौधो  की वायवीय जड़ें  ढक जाती है तथा उन्हें  नया सहारा मिल जाता है जिससे वे लोटते (गिरते)नहीं है । मक्के का पोधा  जमीन पर लोट   जाने पर साधारणतः टूट जाता है जिससे फिर कुछ उपज की आशा रखना दुराशा मात्र ही होता है ।

प्रारंम्भिक 30-40 दिनों तक एक वर्षीय घास व चैड़ी पत्ती वाले खरपतवारों  के नियंत्रण हेतु एट्राजिन नामक नीदनाशी 1.0 से 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर को 1000 लीटर पानी में घोलकर बुआई के तुरंत बाद खेत में छिड़कना चाहिए। खरपवारनाशियो  के छिड़काव के समय मृदा सतह पर पर्याप्त नमी का होना आवश्यक रहता है। इसके अलावा एलाक्लोर 50 ईसी (लासो) नामक रसायन 3-4 लीटर प्रति हक्टेयर की दर से 1000 लीटर पानी में मिलाकर बोआई के बाद खेत में समान रूप से छिड़कने से भी फसल में 30-40 दिन तक खरपतवार नियंत्रित रहते हैं। इसके बाद 6-7 सप्ताह में एक बार हाथ से निंदाई-गुडाई व मिट्टी चढ़ाने का कार्य करने से मक्के की फसल पूर्ण रूप से खरपतवार रहित रखी जा सकती है।

कटाई-गहाई का उचित समय 

    मक्का की प्रचलित उन्नत किस्में बोआई से पकने तक लगभग 90 से 110 दिन तक समय लेती हैं। प्रायः बोआई  के 30-50 दिन बाद ही मक्के में फूल लगने लगते है तथा 60-70 दिन बाद ही हरे भुट्टे भूनकर या उबालकर खाने लायक तैयार हो  जाते है । आमतौर पर  संकुल एंव संकर मक्का की किस्मे पकने पर भी हरी दिखती है, अतः इनके सूखने की प्रतिक्षा न कर भुट्टो कर तोड़ाई करना  चाहिए।     एक आदमी दिन भर में 500-800 भुट्टे तोड़ कर छील सकता है । गीले भुट्टों  का ढेर लगाने से उनमें फफूंदी  लग सकती है जिससे दानों की गुणवत्ता खराब हो जाती है। अतः भुट्टों को छीलकर धूप में तब तक सुखाना चाहिए जब तक दानों में नमी का अंश 15 प्रतिशत से कम न हो जाये। इसके बाद दानों को गुल्ली से अलग किया जाता है। इस क्रिया को शैलिंग कहते है।

उपज एंव भंडारण रस प्रकार 

    सामान्य तौर पर सिंचित परिस्थितियों में संकर मक्का की उपज 50-60 क्विंटल ./हे. तथा संकुल मक्का की उपज 45-50 क्विंटल ./हे. तक प्राप्त की जा सकती है। मक्का के भुट्टो  की पैदावार लगभग 45000-50000 प्रति हैक्टर अती है । इसके अलावा 200-225 क्विंटल हरा चारा प्रति हैक्टर भी प्राप्त होता है ।

Category: खेती

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