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Updated: 18 hours 51 min ago

कुंदुरी की खेती

22 April, 2017 - 05:35

कुंदरू को गर्म और आद्र जलवायु की आवश्यकता होती है पहले इसे प. बंगाल और उ,प्र. के  पूर्वी जिलों में उगाया जाता था किन्तु अब इसे नई विधिया अपनाकर हर सिंचित क्षेत्र में सुगमता से उगाया जा सकता है कुंदरू की खेती उन सभी क्षेत्रों में सफलता पूर्वक की जा सकती है जहां पर औसत वार्षिक वर्षा १००-१५० से.मि. तक होती है |

भूमि :-

भूमि का चुनाव :-

इसे भारी भूमि छोड़कर किसी भी भूमि में उगाया जा सकता है किन्तु उचित जल निकास वाली जीवांशयुक्त रेतीली या दोमट भूमि इसके लिए सर्वोत्तम मानी गई है चूँकि इसकी लताएँ पानी के रुकाव को सह नहीं पाती है अत: उचे स्थानों पर जहां जल निकास की उचित व्यवस्था हो वहीँ पर इसकी खेती करनी चाहिए |

भूमि की तैयारी :-

यदि इसे ऊँची जमीन में लगाना है तो २-३ जुताइयां देशी हल से करके उसके बाद  पाटा लगा देना चाहिए १.५ मी.पंक्ति से पंक्ति की दुरी और १.५ मी. पौध से पौध की दुरी रखकर ३० से.मी. लम्बा और ३० से. मी. चौड़ा और ३० से.मी. गहरा गड्डा खोद लेना चाहिए मिटटी में ४-५ किलो ग्राम गोबर की खाद गड्डे में भर देना चाहिए |

प्रजातियाँ :-

कुंदरू की अभी तक कोई विकसित प्रजाति नहीं है केवल स्थानीय किस्मे ही उगाई जाती है इनके फलों के आकार के आधार पर दो प्रकार की किस्मे है |

गोल या अंडाकार वाली किस्मे :-

इस प्रकार की किस्मों के फलों का आकार अंडाकार होता है तथा फल हलके एवं पीले रंग के होते है |

लम्बे आकार वाली किस्मे :-

इस किस्म के फल आकार में अपेक्षाकृत बड़े और लम्बे होते है |

बीज बुवाई :-

पौध सामग्री :-

कुंदरू का प्रसारण भी परवल की तरह लता की कलमे काटकर किया जाता है इसके लिए सामान्यत: जुलाई के महीने में ४-५ माह से एक वर्ष पुरानी लताओं की ५-७ गांठ की १५-२० से. मी. लम्बी और आधे से.मी. मोटाई की कलमे काट ली जाती है  इन कलमों को जमीन में या गोबर की सड़ी हुई खाद तथा मिटटी मिलाकर भरे हुए पालीथीन के थैलों में लगा देते है इन कलमों की समय से सिचाई तथा देखभाल करते रहने से  लगाने के लगभग ५०-६० दिनों बाद कलमों की अच्छी तरह जड़े विकसित हो जाती है और उनमे कल्ले निकल आते है |

पौधरोपण का समय एवं विधि :-

सितम्बर-अक्टूम्बर के महीने में इसकी कलमों का रोपण किया जाता है इसके लिए पहले से तैयार की गई कलमों के पालीथीन को हटाकर मिटटी सहित गड्डे में रोपण करना चाहिए परवल जैसे कुंदरू भी नर और मादा पौधे अलग-अलग होते है अत: हर एक १० मादा पौधों के बिच एक नर पौधे की कलम लगाना आवश्यक़ होता है यदि गृह वाटिका में १-२ पौधे भी कुंदरू के लगाए जाए तो उनमे फलत के लिए एक नर पौधा अवश्य लगाया जाए |

आर्गनिक खाद :-

एक वर्ष का लगाया गया कुंदरू की लता २-३ वर्ष तक फलत में रहती है इसकी लताएँ ठण्ड के दिन में सुषुप्ता अवस्था में चली जाती है और बाद में फ़रवरी - मार्च के महीने में  इनसे नई शाखाएँ निकलती है इस समय प्रति थाला में १-२ किलो ग्राम गोबर की अच्छे तरीके से सड़ी हुयी खाद, १ किलो ग्राम भू-पावर , १ किलो ग्राम माइक्रो फर्टी सिटी कम्पोस्ट, १ किलो ग्राम माइक्रो नीम , १ किलो ग्राम सुपर गोल्ड कैल्सी फर्ट , १ किलो ग्राम माइक्रो भू-पावर और १-२ किलो ग्राम अरंडी की खली इन सब खादों को अच्छी तरह मिलाकर मिटटी के साथ मिलाकर प्रति थाला में भर देना चाहिए |

सिचाई :-

कलमों का थाले में रोपण करने के बाद सिचाई की जाती है तथा बाद में आवश्यकता अनुसार सिचाई करते है ठण्ड के दिन में जब पौधे सुषुप्त अवस्था में रहते है तब सिचाई की विशेष आवश्यकता नही रहती है गर्मी के दिनों में ५-६ दिन के अन्तराल पर सिचाई की जानी चाहिए बरसात के दिनों में पौधों के पास पानी नहीं रुकना चाहिए अन्यथा पौधे सड़ना शुरू कर देते है |

 खरपतवार नियंत्रम :-

पौधों की अच्छी बढ़वार के लिए समय-समय पर निराई करना आवश्यक होता है थाले में जब भी खरपतवार उगे उन्हें खुरपी की सहायता से निकाल देना चाहिए पौधों के पास हलकी गुड़ाई करने से वायु संचार अच्छा होता है जिससे लताओं की बढ़वार शीघ्र और तेज होती है |

कीट नियंत्रण :-

कुंदरू  की फसल को बहुत से कीड़े-मकोड़े सताते है किन्तु फल की मक्खी और फली भ्रंग विशेष रूप से हानी पहुंचाते है |
फल की मक्खी :-

यह मक्खी फलों में छिद्र करती है और उनमे अंडे देती है जिसके कारण फल सड़ जाते है कभी -कभी यह मक्खी फूलों को हानी पहुंचाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

फली भ्रंग :-

यह धूसर रंग का गुबरैला होता है जो पतियों में छेद करके उन्हें हानी पहुंचाता है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

रोग नियंत्रण :-

कुंदरू में विशेष प्रकार से चूर्णी फफूंदी नामक रोग अधिक लगता है -

चूर्णी फफूंदी :-

यह रोग एक प्रकार की फफूंदी के कारण होता है जिसके कारण पत्तियों और तनों पर आटे के समान   फफूंदी जम जाती है और पत्तियां पीली पड़कर व मुरझाकर मर जाती है |

रोकथाम :-

इसकी रोकथाम के लिए नीम का काढ़ा या गौमूत्र को माइक्रो झाइम के साथ मिलाकर अच्छी तरह से मिश्रण तैयार कर इसको २५० मि.ली.के साथ प्रति पम्प में डालकर फसल में तर-बतर कर छिडकाव करें |

तुड़ाई :-

पहले पौधे मार्च-अप्रैल के महीने में फल आना शुरू होता है और मई से उपज मिलने लगती है जो अक्टूम्बर तक चलती है कुंदरू के पूर्ण रूप से विकसित होने पर कच्ची अवस्था में ही फलों की तुड़ाई करने पर फल सख्त हो जाते है और अन्दर का गुदा लाल हो जाता है जो सब्जी के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता है |

उपज :-

कुंदरू  की उपज इसकी प्रजातियों के अनुसार भिन्न-भिन्न होती है लेकिन इसकी औसत उपज २४० क्विंटल प्रति हे. है |

Tags: कुंदुरीCategory: खेती

कीवी फल की खेती

20 April, 2017 - 22:28

डॉ.शर्मा ने बताया कि हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षत्रों जिनकी समुद्रतल से ऊंचाई 900 से 1800 मीटर है काफी संभावनाएं है। किवीफल के पौधों को फलने के लिए 600 से 800 घंटे की चिल्लिंग रिक्वॉयरमेंट होती है। बसंत ऋतु में अंकुर निकलने के समय कोहरा नहीं पडऩा चाहिए। इसके अलावा तेज़ गर्मी 40 डिग्री सेल्सियस आंधी से पत्तियों फ़लों को नुकसान पहुंचता है। 

गुठलीदार फलों का बेहतर विकल्प किवी 

नौणीयूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. हरीचंद शर्मा ने बताया कि बदलते जलवायु के परिवेश में इन फलों के उत्पादन में किसानों को काफी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। गुठलीदार फलों के बगीचे काफी पुराने हो चुके है और बागवानों ने भी इस पर ध्यान देना बंद कर दिया है। इन परिस्थितियों को देखते हुए पिछले दो दशकों में कीवी सोलन, सिरमौर, कुल्लू मंडी के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प है। यह फल प्राय: अक्टूबर से दिसंबर तक पक कर तैयार हो जाता है। इस फल की भंडारण क्षमता बहुत अच्छी है। डॉ. शर्मा ने कहा कि भारत में किवीफल में किसी गंभीर रोग अथवा कीट का प्रकोप नहीं देखा है। कीटनाशकों या रसायनों का छिड़काव नहीं करना पड़ता, जिससे स्वास्थ्य की दृष्टि से काफी लाभदायक है। 

नौणी यूनिवर्सिटी में किवी फल से लदा बगीचा। 

यशपाल कपूर | सोलन

हिमाचलप्रदेश के मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में किवीफल आर्थिकी को पंख लगा सकते हैं। यहां मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में आड़ू, पलम, खुरमानी की बागबानी कर रहे हैं, यह सभी फल टिकाऊ नहीं होते। ऐसे में किवी फल आर्थिक दृष्टि से लाभदायक फल के रूप में उभर कर सामने आया है। इसके लिए नौणी यूनिवर्सिटी के फल विज्ञान विभाग ने तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का हिमाचल ही नहीं अपितु पूर्वोत्तर भारत के राज्य जिनमें मुख्यत: अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम मेघालय में किवी भी लाभ उठा रहे हैं। यहां किवी की व्यावसायिक खेती की जा रही है। यूनिवर्सिटी द्वारा विकसित की गई तकनीक से प्रति हैक्टेयर किवीफल के बगीचे से 6 गुणा अधिक आमदनी प्राप्त की जा सकती है। एक हैक्टेयर बगीचे से 24 लाख के आमदनी ली जा सकती है। सेब के एक हैक्टेयर में बगीचा लगाने से मात्र 8.9 लाख कमाए जा सकते हैं, जबकि सब्जी उत्पादन जिनमें मुख्यत टमाटर से मात्र 2 से 2.5 लाख तक की ही आमदनी की जा सकती है। किवी को चाइनीज़ गूज़बैरी के नाम से भी जाना जाता है। यद्यपि इस फल का मूल स्थान चीन है, लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से इसका उपयोग न्यूजीलैंड ने किया। हिमाचल प्रदेश में वर्ष 1990 के दशक में कुल्लू, मंडी, सोलन, चंबा सिरमौर जिलों में काफी बगीचे लगाए गए, लेकिन तकनीकी जानकारी के अभाव में किवीफल की बागवानी उतनी लाभकारी सिद्ध नहीं हुई, जितनी इसकी संभावनाएं थी। इसका मुख्य कारण फलों के आकार गुणवता का कम होना था जो विदेश से आयात किए गए फल की उपेक्षा कम थे। डॉ यशवंत सिंह परमार यूनिवर्सिटी नौणी सोलन के फल विज्ञान विभाग के एचओडी डॉ नरेन्द्र शर्मा ने बताया कि किवी पर यूनिवर्सिटी में दो दशकों सेें शोध कार्य किया गया। शोध में यह पाया की किवी के पौधों को 17-18 बार सिंचाई करने की आवश्यकता होती है। जिन क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता कम है। वहां पौधों में घास या अन्य किसी प्रकार की पलवार (मल्चिंग) लगाने से पानी की आवश्यकता को कम किया जा सकता है। डॉ. शर्मा ने बताया कि यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय स्तर के बगीचे तैयार किए गए हैं। इनमें आधुनिक तकनीकें जैसे ट्रेनिंग स्ट्रक्चरर, टपक सिंचाई, एंटी हैल नेट सोलर फैंसिंग का उपयोग किया गया है। इस विभाग में काफी मात्रा में पौधे तैयार किए गए। डॉ. एचसी शर्मा ने बताया कि यूनिवर्सिटी इस फल के ज्यादा से ज्यादा अच्छी किस्म के पौधे तैयार करके के किसानों को उपलब्ध करवाएगा ताकि इस फल को और बढावा मिल सकें। 

 

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किन्नू की खेती

19 April, 2017 - 22:24

उत्तर भारत में नीम्बूवर्गीय फलों में किन्नू की खेती प्रमुख है | इसकी खेती हरियाणा, पंजाब, राजस्थान व हिमाचल प्रदेश में की जाती है | किन्नू स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है | इसमें विटामिन सी के आलावा विटामिन ए, बी तथा खनिज तत्व भी अच्छी मात्रा में पाए जाते हैं | किन्नू अधिक उत्पादन देने वाली नींबू वर्गीय फलों की संकर किस्म है | इसका रस खून बढ़ने , हड्डियों की मजबूती तथा पाचन में लाभकारी होता है | इसमें खटास व मिठास का अच्छा संतुलन होता है | फल जनवरी में पकता है | इसका उत्पादन 80-100 क्विंटल प्रति एकड़ है | पौधे तैयार करना : पौधे लगाने का समय : गड्ढों में लगायें पौधे : उर्वरकों का उचित इस्तेमाल : कटाई - छंटाई : फलों को गिरने से बचाएं : कीड़े व उनसे बचाव : कैसे करें उपचार :

 

अच्छी आमदनी के चलते पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के किसान किन्नू के रकबे में बढ़ोतरी कर रहे हैं। इन राज्यों के अद्र्ध-शुष्क जलवायु क्षेत्रों में किन्नू का रकबा बढ़ रहा है। दक्षिणी राज्यों में किन्नू के फलते-फूलते बाजार से उत्तरी राज्यों के किसानों को इसका रकबा बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन मिला है। अनुमानों के मुताबिक इन तीनों राज्यों में किन्नू का रकबा करीब 4,000 हेक्टेयर है।

 

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कपास और गेहूं की खेती करने वाले किसान भी अच्छी आमदनी की वजह से किन्नू की खेती की ओर रुख कर रहे हैं। किन्नू का रकबा हर साल पंजाब में 2,200 एकड़, हरियाणा में 1,100 एकड़ और राजस्थान में 700 एकड़ बढ़ रहा है। किन्नू के पेड़ों पर हर दूसरे साल फल लगते हैं, इसलिए चालू वर्ष ऑफ सीजन है। इस वजह से फल लगने की अवस्था वाले नए पौधों की संख्या में इजाफा होने के बावजूद उत्पादन पिछले साल से थोड़ा कम रह सकता है।

 

किसानों ने कहा कि पंजाब में कृषि शिक्षा की बेहतर व्यवस्था होने से उन्हें किन्नू का रकबा बढ़ाने में मदद मिली  है।  कम उत्पादन की वजह से पिछले साल की तुलना में किन्नू के दाम 10 फीसदी बढ़ सकते हैं। दक्षिण में खट्टे फलों की बड़ी मांग होती है। संतरा सितंबर माह तक उपलब्ध होता है। इसके बाद दो महीने तक माल्टा उपलब्ध रहता है। माल्टा का सीजन खत्म होने के बाद इसकी भरपाई किन्नू से होती है, जिसकी आवक दिसंबर में शुरू होती है और यह फरवरी तक उपलब्ध रहता है।

 

पंजाब के किन्नू उत्पादक क्षेत्रों (अबोहर, फाजिल्का और होशियारपुर) और हरियाणा के (सिरसा, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी और झज्जर) के किसानों ने 3-4 वर्षों पहले आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु के बाजार में अपनी उपज बेचनी शुरू की थी और अब वे अच्छा पैसा कमा रहे हैं।  पंजाब में बागवानी निदेशक और किन्नू के नोडल अधिकारी गुरकंवल सिंह सरोठा ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि राज्य सरकार इस साल सिट्रस प्लांट को पूरी क्षमता पर चलाएगी, जिसमें छोटे आकार के किन्नू की खपत होगी। इससे बाजार में आपूर्ति कम पहुंचेगी, जिससे कीमतें बढ़ेंगी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के विविधिकरण मिशन के तहत किन्नू के रकबे में बढ़ोतरी पर जोर दिया जा रहा है। पंजाब में किन्नू की उत्पादकता 22 टन प्रति हेक्टेयर है।

 

हरियाणा में बागवानी विभाग के महानिदेशक अर्जन सिंह सैनी ने कहा कि किन्नू हरियाणा में पैदा होने वाला सबसे बड़ा रसदार फल है। इस फसल को धान की तुलना में कम सिंचाई की जरूरत होती है और आमदनी प्रति हेक्टेयर में 1 से 2 लाख रुपये तक होती है, जो कृषि प्रबंधन पर निर्भर करता है। इस वजह से किसान खाद्यान्न के साथ ही किन्नू उत्पादन में भी आगे आ रहे हैं। खुदरा बाजारों में किन्नू 60 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता है, जबकि किसानों को प्रति किलोग्राम के 8-10 रुपये मिलते हैं। इस वजह से प्रगतिशील किसानों ने अपनी उपज की सीधा विपणन करना शुरू कर दिया है। पंजाब के होशियारपुर के ऐसे ही एक किसान दीपक पुरी ने बताया कि छोटे किसान भी समूह बनाकर और राज्य सरकार की मदद से कारोबारियों तक सीधे पहुंचकर ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं।

 

सहोटा ने बताया कि पंजाब सरकार उपभोक्ताओं की जागरूकता के लिए एक अभियान शुरू करने के बारे में विचार कर रही है। उन्होंने कहा, 'हमने इस साल दिसंबर में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये लक्षित ग्राहकों तक पहुंच बनाने की योजना बनाई है। हम उनसे स्वास्थ्य फायदों के लिए ज्यादा किन्नू के सेवन की अपील करेंगे। इससे आखिरकार किसानों को फायदा होगा।' किन्नू की उत्पादकता बढ़ाने के लिए राज्य सरकार ने राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत 'उत्कृष्टता केंद्र' स्थापित किए हैं।

 

Tags: किन्नूCategory: खेती

करौंदे की फसल में लागत शून्य और मुनाफा भरपूर

18 April, 2017 - 21:59

करौंदा एक बहुत सहिष्णु पौधा है | यह उष्ण तथा उपोष्ण जलवायु में उगाया जा सकता है | लेकिन अधिक बरसात और जलमग्न भूमि इसके लिए नुकसानदायक है |

 

भूमि :-

करौंदा अनेक प्रकार की भूमि में तथा कम उपजाऊ भूमि में भी उगाया जा सकता है लेकिन अच्छी बढवार और उपज (पैदावार) के लिए अच्छी भूमि होना आवश्यक है |

 

प्रवर्धन :-

करौंदे का प्रवर्धन बीज व वानस्पतिक तरीकों,जैके कटिंग,इनारचिंग तथा लेयरिंग से कर सकते है |

 

फासला :-

फरवरी-मार्च व सितम्बर-अक्टूबर के महीने में 60 गुना 60 गुना 60 गुना सेटीमीटर के गड्ढे 3 गुना 3 मीटर की दूरी पर तैयार कर पौधे लगाने चाहिए |

 

काट-छांट :-

पौधा लगते समय इसे किसी बांस का सहारा दें ताकि इसकी बढ़वार सीधी रहे | समय-समय पर अवांछित शाखाओं को निकालते रहें | फलित पौधे को बहुधा कटाई की आवश्यकता नहीं होती फिर भ अच्छे आकर देने के लिए फालतू टहनियों की काट-छांट आवश्यक हो जाती है | रोगग्रस्त शाखाओं को निकाल दें | पुरानी शाखाओं में बदलने के लिए कटाई-छंटाई करते रहे |

 

बीच की फसल :-

पौधा लगाने के पहले वर्ष खरपतवार काफी समस्या पैदा कर सकते है | जिन्हें निराई-गुड़ाई द्वारा निकालते रहना चाहिए | करौंदे की लगातार फसल में पहले 2 वर्ष तक वर्षा में तक वर्षा में उगाई जाने वाली सब्जियों की काश्त की जा सकती है |

 

खाद एवं उर्वरक :-

करौंदा के पौधे को 15-20 किलो गोबर की गली-सड़ी खाद प्रति पौधा प्रति वर्ष दें | इसे वर्षा ऋतु के आगमन पर दल दें वर्ना पौधों की बढ़वार कमजोर पड़ जाएगी |

 

सिंचाई:-

करौंदा प्राय; कम बढ़ने वाला पौधा है | एक बार भूमि में अच्छी तरह लग जाने पर इसे पानी की आवश्यकता नहीं रहती है |

 

फलन:-

करौंदा में तृतीय वर्ष से फूल व फल आने शुरू हो जाते है तथा फरवरी के महीने में फूल आते है और फल अगस्त के महीने में पककर तैयार हो जाता है | हालांकि कच्चे फल मई मास में ही मिलने शुरू हो जाते है |

 

फलों की तुड़ाई:-

कच्चे व पके फलों की तुड़ाई की जाती है | एक ही समय पर सभी फल तोडना असम्भव है | इसे दो या तीन बार करते है फलों का रंग बदलना ही फलों की परिपक्वता की निशानी है | सामान्यत: 4-5 किलो फल प्रति पौधा लिए जा सकते है |
 

 

करौंदा की खेती के बारे में जानने के लिए निचे दिए गए विडियो के लिंक पर क्लिक करें |

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करेले की सही खेती करने की विधि

17 April, 2017 - 06:54

बुआई का समय } उत्तर भारत में इसकी बिजाई फरवरी व मार्च के अलावा जून व जुलाई में की जा सकती है। 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर डाला जाता है। नालियों के बीच 1.5 मीटर एवं पौधों के बीच 1 मीटर की दूरी होनी चाहिए।

खाद }

50 टन गोबर की पकी खाद खेत तैयार करते समय डालें। 125 किलोग्राम अमोनियम सल्फेट या किसान खाद, 150 किलोग्राम सुपरफॉस्फेट तथा 50 किलोग्राम म्युरेट आॅफ पोटाश तथा फॉलीडाल चूर्ण 3 प्रतिशत 15 किलोग्राम का मिश्रण 500 ग्राम प्रति गड्ढे की दर से बीज बोने से पूर्व मिला लेते हैं। 125 किलोग्राम अमोनियम सल्फेट या अन्य खाद फूल आने के समय पौधों के पास मिट्टी अच्छी तरह से मिलाते हैं।

बुआई }

बीजों को नालियों के दोनों तरफ बुआई करते हैं। नालियों की सिंचाई करके मेड़ों पर पानी की सतह के ऊपर 2-3 बीज एक स्थान पर इस प्रकार लगाए जाते हैं कि बीजों को नमी कैपिलरी मूवमेंट से प्राप्त हो। अंकुर निकल आने पर आवश्यकतानुसार छंटाई कर दी जाती है। बीज बोने से 24 घंटे पहले भिगोकर रखें, जिससे अंकुरण में सुविधा होती है।

सिंचाई एवं निराई-गुड़ाई }

फसल की सिंचाई वर्षा पर आधारित है। साधारण प्रति 8-10 दिनों बाद सिंचाई की जाती है। फसल की प्राथमिक अवस्था में निराई-गुड़ाई करके खेत को खरपतवारों से मुक्त करना चाहिए। वर्षा ऋतु में इस फसल को डंडों या मचान पर चढ़ाना अच्छा होता है। फसल की निराई-गुड़ाई करते रहना चाहिए। करेले की फसल ड्रिप सिंचाई पर भी ले सकते हैं।

पौध संरक्षण }

कीड़े } एफिड, माइटस, रेड पमकिन, बीटिल की रोकथाम के लिए मैलाथियान एक मिली लीटर, सेविन 3 मिली लीटर प्रति लीटर या मैलाथियान या सेविन चूर्ण 5 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए। नीमयुक्त कीटनाशक का छिड़काव भी कर सकते हैं।

सावधानी }

रासायनिक कीटनाशी दवाएं जहरीली होती हैं। प्रयोग सावधानीपूर्वक करें। फल तोड़ने के 10 से 15 दिन पूर्व दवाओं का प्रयोग बंद कर देना चाहिए।

फल तोड़ना } सब्जी के लिए फलों को साधारणत: उस समय तोड़ा जाता है जब बीज कच्चे हों। यह अवस्था फल के आकार एवं रंग से मालूम की जा सकती है। जब बीज पकने की अवस्था आती है तो फल पीले-पीले हो जाते हैं और रंग बदल देते हैं।

पैदावार } 130 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हो जाती है। बीज उत्पादन के लिए प्रमाणित बीज के लिए 500 मीटर व आधारीय बीज के लिए 1000 मीटर अलगाव दूरी रखें। फल पूरी तरह पकने के बाद निकालकर बीज अलग करें व सुखाकर अपरिपक्व कच्चा बीज अलग करें।

स्त्रोत : राष्ट्रीय बागवानी अनुसंधान एवं विकास प्रतिष्ठान नासिक, महाराष्ट्र।

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कमरख के फायदे

16 April, 2017 - 04:47

कमरख का वृक्ष  २० फिट तक ऊँचा होता है | इसका फूल सफेद एव बैंगनी रंग के होते है | पका हुआ कमरख का फल शीतवीर्य , मधुर से रुचिकर , प्यास बुझाने वाला , पित्तशामक , रक्तविकारनाशक तथा शक्तिदायक होता है |

कमरख का पका फल खुनी बवासीर की श्रेष्ट दवा माना जाता है | इसकी तासीर ठंडी होती है |

 कच्चा कमरख खट्टा , वायुनाशक , मलरोधक , गरम व् पित्तकारक होता है | कमरख का कच्चा फल पचने में हल्का  होता है |

इसमें अम्ल , मधुर व् कषाय रस मिलते है | यह भोजन के प्रति रूचि व भूक बढ़ता है तथा दस्त भी ठीक हो जाते है |यह खुनी बवासीर , रक्तपित्त , संग्रहनी , स्कर्वी तथा रक्तविकार में उपयोगी है |

यह खून के गर्मी को शमन करके रक्त साफ़ करता है | गर्मी से होने वाले बुखार को दूर करता है |

घरेलू उपाय :

प्यास :

 पके हुए कमरख का सेवन करने या इसके शरबत से प्यास बुझती है |

नेत्र रोग :

 इसके रस की २-३ बूंद आँख में कुछ दिन डालने से आँख का जाला साफ़ होता है |

कमरख के पत्ते :

 कमरख के पत्ते शारीरिक जलन को दूर करते है , रक्त को शुद्ध करते है , तथा दस्त बांधने वाले होते है | ये भूक को बढ़ाते है |

कमरख के बीज :

 इसके बीज वमनकारक अर्थात उल्टी कराने में उपयोगी होते है | हमेशा पके हुए कमरख का फल ही प्रयोग में लेना चाहिए |

वमन :

 २ चम्मच कमरख का रस दिनों में ४-५ बार लेने से पित्त वमन में लाभ होता है

भूक खुलना :

 भोजन में अरुचि हो या पेट भारी रहता हो तो कमरख का एक फल नमक के साथ खाने से भूक खुलती है |

पित्ती :

 पित्ती तथा वातरोग में सुबह-शाम कमरख खाने से लाभ होता है |

अतिसार :

 कमरख का ताजा रस या शरबत पैत्तिक अतिसार में लाभदायक होता है|

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कबिट एक फल है जो बेल जैसा होता है।

15 April, 2017 - 21:45

कबिट एक फल है जो बेल जैसा होता है। इसे 'कपित्थ' या कठबेल भी कहते हैं। आयुर्वेद में कबीट को पेट रोगों का विशेषज्ञ माना गया है। इसका जहाँ शरबत इस्तेमाल किया जाता है, वहीं चटनी भी खूब पसंद की जाती है। भारत में कबीट दक्षिण भारत से लेकर ठेठ उत्तर पया जाता है। इसके अलावा यह बांग्लादेश, पाकिस्तान, श्री लंका, जावा, मलेशिया आदि में भी पाया जाता है।
मोटे तौर पर कबीट को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। पहले वर्ग में छोटे आकार के कबीट फल होते हैं जो स्वाद में बहुत खट्टे होते हैं साथ ही गले पर भी असर करते हैं। दूसरे वर्ग में वह कबीट है जो आकार में बड़ा होता है। इसका गूदा खट्टापन लिए मीठा होता है।
 

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ककोड़ा की खेती कैसे करें

13 April, 2017 - 05:39

हमारे देश में ककोड़ा हिमालय से ले कर कन्याकुमारी तक पाया जाता है. यह ज्यादातर गरम व नम जगहों पर बाड़ों में मिलता है. उत्तर प्रदेश में ककोड़ा की खेती बड़े पैमाने पर की जाती?है. बिहार के पहाड़ी क्षेत्रों राजमहल, हजारीबाग व राजगीर और महाराष्ट्र के नम पहाड़ी इलाकों, दक्षिण राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, ओडिशा, असम व पश्चिम बंगाल के जंगलों में यह अपनेआप ही उग आता है. ककोड़ा की पौष्टिकता, उपयोगिता व बाहरी इलाकों में इस की बढ़ती मांग के कारण अब किसान इस की खेती को ज्यादा करने लगे हैं. ककोड़ा फल की सब्जी बेहद स्वादिष्ठ होती है. जुलाई से अक्तूबर तक इस का फल बाजार में उपलब्ध रहता है और इस की बाजारी कीमत 18-20 रुपए प्रति किलोग्राम तक होती है. इस फल के बीज से तेल निकाला जाता है, जिस का उपयोग रंग व वार्निश उद्योग में किया जाता है.

ककोड़ा की जड़ यानी कंद का इस्तेमाल मस्सों का खून रोकने और पेशाब की बीमारियों में दवा के रूप में किया जाता है. इस के फल को मधुमेह के मरीजों के लिए बहुत असरदार पाया गया है. इस के फल करेले की तरह कड़वे नहीं होते.

पौष्टिक है ककोड़ा

ककोड़ा में खासतौर से पाए जाने वाले तत्त्व इस तरह हैं: नमी 84.19 फीसदी, प्रोटीन 3.11 फीसदी, दूसरे तत्त्व 0.97 फीसदी, राख 1.10 फीसदी, वसा 0.66 फीसदी, कार्बोहाइड्रेट 7.70 फीसदी, क्रूडरेशा 2.97 फीसदी, कैल्शियम 33 मिलीग्राम/100 ग्राम, फास्फोरस 42 मिलीग्राम/100 ग्राम, लोहा 4.68 मिलीग्राम/100 ग्राम, केरोटीन (विटामिन ए) 2 माइक्रोन थाइमिन 45.20 माइक्रौनराइबोफ्लोबिन 176 मिलीग्राम और नाइक्सीन 0.50 मिलीग्राम/100 ग्राम. इस के फल में एस्कारबिक अम्ल ज्यादा (275.10 मिलीग्राम/100 ग्राम) और आयोडीन 0.70 मिलीग्राम/100 ग्राम मात्रा में पाया जाता है.

पौधे तैयार करने की विधि

ककोड़ा के पौधों को बीज, कंद या तने की कटिंग से तैयार किया जा सकता है.

बीज द्वारा

पौधे तैयार करने के लिए सब से पहले बीजों को 24 घंटे तक पानी में डुबो कर रखा जाता?है. इस के बाद तैयार खेत के अंदर बो दिया जाता है. बीज से मिले पौधों में करीब 50-50 फीसदी नर व मादा पाए जाते हैं, जबकि ज्यादा उत्पादन के लिए नर व मादा पौधों का अनुपात 1:10 होना चाहिए. इस के लिए हर गड्ढे में 2-3 बीज बोए जाते?हैं और बाद में फूल आने पर नर व मादा पौधे सही अनुपात में रख लिए जाते हैं.

जड़कंद द्वारा

ककोड़ा के पौधे जड़कंद के द्वारा भी तैयार किए जा सकते हैं. कंद द्वारा तैयार पौधे काफी स्वस्थ होते हैं. सब से पहले ककोड़ा के कंद को तैयार खेत के अंदर बो दिया जाता है. रोपाई के 10-15 दिनों बाद पौधा जमीन के बाहर आ जाता है.

तने की कटिंग द्वारा

इस तरीके में ककोड़ा के पौधों को हार्मोन में भिगो कर व डुबो कर रखा जाता है. कटिंग हमेशा पौधे के ऊपरी भाग से होनी चाहिए. कटिंग करने के बाद पौधे को जुलाई व अगस्त महीने में खेत में रोपना चाहिए. 10-15 दिनों बाद ही कटिंग्स से नई पत्तियां निकलनी शुरू हो जाती हैं.

खेत की तैयारी व रोपाई

ककोड़ा सभी प्रकार की जमीनों में उगाया जा सकता?है, लेकिन जिस जमीन में पानी भरा रहता हो, उस में इसे नहीं लगाना चाहिए. इस की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी सही रहती है. सब से पहले खेत की 3 या 4 बार जुताई की जाती है, ताकि मिट्टी अच्छी तरह से भुरभुरी व बारीक हो जाए. अब खेत में अंदर 30 से 45 सेंटीमीटर गोलाई के 30 सेंटीमीटर गहरे गड्ढे तैयार करने चाहिए. गड्ढे में 2 किलोग्राम कंपोस्ट खाद, एनपीके (15:15:15 ग्राम) और 3 ग्राम फ्यूरोडान डालनी चाहिए. पौध रोपने से 1 दिन पहले गड्ढे की अच्छी तरह से सिंचाई कर देनी चाहिए. जैसे ही बारिश शुरू हो, हर गड्ढे में 2-2 पौधे लगा कर सिंचाई कर देनी चाहिए, ताकि पौधे मुरझाएं नहीं. यदि बारिश नहीं होती है, तो पत्ती निकलने तक हर रोज पौधे की सिंचाई करते रहना चाहिए. इसी तरह बीज और कंद द्वारा पौधे तैयार किए जा सकते हैं.

जहां पर सिंचाई की सुविधा है, उन इलाकों में कंद द्वारा पौधे फरवरी या मार्च में भी लगाए जा सकते हैं. इस समय तैयार फसल में अप्रैल के आखिर से सितंबर तक फूल आते रहते हैं जल्दी ही फलों का उत्पादन शुरू हो जाता है.

नाइट्रोजन उर्वरक का छिट्टा

10 ग्राम यूरिया 4-5 पत्ती निकलने पर हर गड्ढे में डालना चाहिए. अब फिर से 30 दिनों के अंतर पर 15 ग्राम यूरिया हर गड्ढे में डालना चाहिए. ककोड़ा के फल फूल आने के 15 से 20 दिनों के अंदर तैयार हो जाते हैं. यदि फलों को सही समय पर नहीं तोड़ा जाता है, तो वे पीले हो कर पक जाते?हैं, जिस से वे सब्जी के लिए सही नहीं रहता. इस तरह तैयार फसल से 1 पौध से 42 से 60 फल तक मिल सकते?हैं. इस के फल का उत्पादन 75 से 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पाया गया है.

कीट व रोग

ककोड़ा खरीफ की फसल में उगाया जाता है, इसलिए इस दौरान कीटपतंगों का हमला भी ज्यादा पाया जाता है. इस फसल पर भी काफी कीट व बीमारियां अब तक देखी गई?हैं, जैसे एपीलपचना बीटल (एपीलाचना प्रजाति), फ्रूटफ्लाई (लासरओपटेरा प्रजाति, डेकस मेकुलेटस), ग्रीन पंपकिन बीटल (रेफीडोपाल्पा प्रजाति), रूट नाट निमेटोड (मेलीओडोगाइन इनकोगनिटा), पाउडरी मिल्ड्यू (इरीस्फे सीकोरेसिरम), फल सड़न (पाइथियम एफारीडेरेमेंटम) वगैरह.

फसल को कीटों व बीमारियों से बचाने के लिए कार्बोफ्यूरान 3 ग्राम प्रति गड्ढा 30 दिनों के अंतराल पर इस्तेमाल में लाना चाहिए और कार्बोरिल 50 डब्ल्यूपी (2 सीसी प्रति लीटर) और मेलाथियान 50 ईसी (2 सीसी प्रति लीटर) को डाइथेन एम 45 (2.5 ग्राम प्रति लीटर पानी) के साथ पौधों पर छिड़कने से बीमारी से छुटकारा मिल जाता है.

जहां तक हो सके बीमारीरहित बीज, कंद व कटिंग्स इस्तेमाल में लाने चाहिए. किसानों को चाहिए कि वे अपने जिले व प्रदेश में मौजूद कृषि विश्वविद्यालयों व कृषि विज्ञान केंद्रों के माहिर वैज्ञानिकों से ककोड़ा उत्पादन की जानकारी हासिल कर के नई तकनीक का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल कर अच्छा उत्पादन हासिल करें.

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ककड़ी की खेती किस प्रकार करें ?

12 April, 2017 - 04:37

ककड़ी की खेती किस प्रकार करें ? बीजाई का समय : इसकी बीजाई का समय फरवरी से मार्च तक है परन्तु अगेती फसल लेने के लिए पॉलिथीन की थैलियों में बीज की जनवरी के महीने में बीजाई की जा सकती है | पौध सहित इन थैलियों को जमीन में गाद दिया जाता है |

बीज की मात्रा :

1 एकड़ भूमि में तर-ककड़ी बोने के लिए एक किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है | पौध तैयार करना : तर ककड़ी को लगभग सभी प्रकार की भूमि में उगाया जा सकता है लेकिन इसके लिए दोमट भूमि सबसे उपयुक्त है, जिसमे जल निकास की सुविधा अच्छी हो | भूमि की तैयारी के समय गोबर की खाद मिलायें व खेत की 3-4 बार जुताई करके सुहागा लगायें | बिजाई की विधि : तर ककड़ी की बीजाई 2m चौड़ी क्यारियों में नाली के किनारों पर करनी चाहिए | पौधे से पौधे का अंतर 60 cm रखें | एक स्थान पर 2-3 बीज बोयें | बाद में एक स्थान पर एक ही पौधा रखें | खाद व उर्वरक : गोबर की खाद - 6 टन , नाइट्रोजन - 20 kg, फॉस्फोरस - 10 kg और पोटाश - 10 kg | बीजाई के समय फॉस्फोरस व पोटाश की साड़ी मात्रा तथा नाइट्रोजन की आधी मात्रा डालनी चाहिए | शेष नाइट्रोजन को कड़ी फसल में दें | फलों की तोड़ाई : नरम व चिकने फलों को प्रातः अथवा शाम के समय तोड़ लिया जाता है | तोड़ते समय फलों की लम्बाई 15-30 cm होनी चाहिए | अगेती फसल से अच्छे दाम प्राप्त करने के लिए फलों को कुछ पहले तोड़ लेना चाहिए | जबकि पछेती फसल के फल कुछ देर में तोड़े जाते हैं | तर-ककड़ी की औसत पैदावार 40-50 क्विंटल प्रति एकड़ होती है

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एलोविरा की खेती केसे

11 April, 2017 - 11:32

एलोविरा की उत्त्पति का स्थान उत्तरी अफ्रीका माना जाता है।इसे कई नामो से जाना जाता है। जैसे घृतकुमारी, ग्वारपाटा, अग्रेजी में एलॉय नाम से भी जाना जाता है। ग्वारपाटा के पोधे की ऊचाई 60- 90 से.मी.तक होती है। पत्तो की लम्बाई 30-45 सेमी. तक होती है। पत्ते 4.5सेमी से 7.5सेमी तक होते है। जड़ से उपर सतह के साथ ही पत्ते निकलने लगते है। पत्तो का रंग हरा होता है। और पत्तो की किनारों पर छोटे छोटे काटे जैसे होते है। अलग अलग रोगों के हिसाब से इसकी कई सारी प्रजातिया है।

एलोवीरा का उपयोग:- 

Aloevera में कई सारे औषधीय गुण होते है।इसलिए इसका उपयोग आयुवेदिक में बड़े पैमाने से होता आ रहा है। आज के दोर में कई सारी नेशनल और इंटर नेशनल कंपनियाँ इसका उपयोग चिकित्सा के साथ साथ सौंदर्य प्रसाधन के जैसे फेसवास क्रीम शेम्पू  दन्त पेस्ट अन्य कई सारे product में इसका इस्तेमाल होता है।इसलिए इसकी मांग बडने लगी है। यह पोधा गमले में भी अच्छी तरह से चलता है। मैने भी इसे अपने घर पर लगा रखा है। क्यों की यह जलने पर इसके पत्तो में से गुद्दा और रस लगाने से काफी ज्यादा relif मिलती है।कई सारे लोग इसे मकानों की छत और gardan में शोकियाना तोर पर भी लगाते है। इसकी बढती मांग की वजह से इसकी खेती व्यावसायिक रूप में शुरू हो गयी है।

एलोवीरा की खेती के लिए khet की तैयारी:-

वेसे एलोविरा के पौधे किसी भी प्रकार की उपजाऊ अनुपजाऊ मिट्टी में आसानी से उग जाते है।बस आपको बस एक बात का ध्यान रखना है की पोधा अधिक जल भराव और पाला पड़ने वाली जगह पर नही लगाना है।सबसे पहले खेत की 2 बार अच्छे से जुताई कर उसमे प्रति हेक्टेयर 10 से 20 टन के बीच में अच्छी पकी हुई गोबर की खाद डाले साथ में 120 किलोग्राम यूरिया+150किलोग्राम फास्फोरस+30किलोग्राम पोटाश इनको खेत में समान रूप से बिखेर देवे फिर एक बार हलकी जुताई करा के पाटा लगा कर मिट्टी को समतल बना ले। फिर खेत में 50×50 सेमी. की दूरी पर उठी हुई क्यारी बना ले।

पोधो की रोपाई एवं रखरखाव:- 

पोधो की रोपाई किसी भी समय की जा सकती है। लेकिन अच्छी उपज प्राप्त करने के लिए जून जुलाई और फरवरी से मार्च के बीच कर सकते है। एलोवीरा की रोपाई प्रकंदों से होती है इसलिए उनकी लम्बाई 10 से 15 सेमी के होने चाहिए। अच्छी उपज के लिए अनुशासित किस्में  सिम-सितल एल 1,2,5 और 49 है।जिसमे जेल की मात्रा ज्यादा पाई जाती है। प्रकंदों की दुरी 50×50 रख के बीच में दुरी 30सेमी की रख कर रोपाई करनी चाहिए।

घर्तकुमारी की सिचाई:- 

सालभर में इसे मात्र 4 या 5 बार सिचाई की आवश्यकता होती है। सिचाई के लिए स्प्रिकलर और ड्रीप प्रणाली अच्छी रहती है। इससे इसकी उपज में बढ़ोत्तरी होती है।गर्मी के दिनों में  25 दिनों के अंतराल में सिचाई करनी चाहिए।

निदाई गुड़ाई:- 

खतपतवार की स्थिति देख कर निदाई गुड़ाई आवश्यक हो जाती है वर्ष भर में 3 या 4 निदाई करनी चाहिये निदाई के बाद पोधो की जड़ो में मिट्ठी चढ़ानी चाहिए ताकि पौधे गिरे नही।

रोग और किट नियन्त्रण:-

वेसे तो इस फसल पर कोई विशेष किट और रोगों का प्रभाव नही होता है।लेकिन कही कही तनो के सड़ने और पत्तो पर दब्बो वाली बीमारियाँ का असर देखा गया है।जो एक फफूंद जनक रोग होता है उसके उपचार के लिए मेंन्कोजेब 3 ग्राम प्रति लीटर के हिसाब से छिडकाव करना चाहिए।

एलोविरा की कटाई और उत्पादन:-

यह फसल एक वर्ष बाद काटने योग्य हो जाती है। कटाई के दौरान पोधो की सबसे पहले निचली ठोस 3 या 4 पत्तो की कटाई करे उसके उपरांत लगभग एक महीने के बाद उस से उपर वाली पत्तियों की कटाई करनी चाहिए कभी भी उपर की नई नाजुक पत्तियों की कटाई नही करे। कटे हुए पत्तों में फिर से नई पत्तिया बननी शुरू हो जाती है।प्रति हेक्टेयर 50 से 60 टन ताजी पत्तिया प्रतिवर्ष मिल जाती है। दूसरे वर्ष में 15 से 20 प्रतिशत वर्धी होती है। बाज़ार में इन पत्तियों की बाजार में अनुमानित कीमत 3 से 6 रूपये किलो होती है। एक स्वस्थ पोधे की पत्तियो का वजन 3 से 5 किलो तक हो जाता है।

 

कटाई के बाद प्रबंधन और प्रसस्करण:-

स्वस्थ पत्तियों की कटाई के बाद साफ़ पानी से धो कर पत्तियों के निचले हिस्से में ब्लेड या चाकू से कट लगा कर थोड़े समय के लिए छोड़ देते है। जिसमे से पीले रंग का गाडा चिपचिपा प्रदार्थ-रस (जेल) निकलता है उसे एक पात्र में इक्कठा कर के वाष्पीकरण विधि से इस रस को सुखा लिया जाता है।इस सूखे हुए रस को जातिगत और अलग अलग विधि से तेयार करने के बाद अलग अलग नामों से जाना जाता है। जैसे सकोत्रा,केप,जंजीवर,एलोज,अदनी आदि ।

एलोविरा की खेती करने के क्या फ़ायदा है:-

  • *इसकी खेती किसी भी जमींन पर आसानी से की जा सकती है।
  • *कम खर्च और और सस्ती खेती। गरीबी किसान को फ़ायदा।
  • *सिचाई और दवाई का कम खर्च।
  • *बंजर और अनूउपयोगी जमीन का उपयोग हो जाता है।
  • *इसे कोई भी पशु नही खाता है इसे खेत की मेड पर चारों तरफ लगाने से दूसरी फसल की भी सुरक्षा हो जाती है
  • *एक बार लगाने के बाद 5 सालों तक आसानी से फसल ले सकते है।
  • *अन्य फसलो की तुलना में मिट्टी का हास कम होता है।
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