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Updated: 20 hours 46 min ago

केंचुवा खाद बनाने की विधि

14 September, 2017 - 09:58

केंचुआ खाद या वर्मीकम्पोस्ट (Vermicompost) पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है।

केंचुआ खाद की विशेषताएँ : इस खाद में बदबू नहीं होती है, तथा मक्खी, मच्छर भी नहीं बढ़ते है जिससे वातावरण स्वस्थ रहता है। इससे सूक्ष्म पोषित तत्वों के साथ-साथ नाइट्रोजन 2 से 3 प्रतिशत, फास्फोरस 1 से 2 प्रतिशत, पोटाश 1 से 2 प्रतिशत मिलता है।

  • इस खाद को तैयार करने में प्रक्रिया स्थापित हो जाने के बाद एक से डेढ़ माह का समय लगता है।
  • प्रत्येक माह एक टन खाद प्राप्त करने हेतु 100 वर्गफुट आकार की नर्सरी बेड पर्याप्त होती है।
  • केचुँआ खाद की केवल 2 टन मात्रा प्रति हैक्टेयर आवश्यक है।

 

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अति महत्त्वपूर्ण जानकारी::-

14 September, 2017 - 09:36

पौधे भी इंसानों की तरह विकास करने के लिए पोषक तत्व का उपयोग करते हैं ,पौधों को अपनी वृद्धि, प्रजनन, तथा विभिन्न जैविक क्रियाओं के लिए कुछ पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है । इन पोषक तत्वों के उपलब्ध न होने पर पौधों की वृद्धि रूक जाती है यदि ये पोषक तत्व एक निश्चित समय तक न मिलें तो पौधों की मृत्यु हो जाती है । हालाकी पौधेभूमि से जल तथा खनिज-लवण शोषित करके वायु से कार्बनडाई-आक्साइड प्राप्त करके सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति में अपने लिए भोजन का निर्माण करते हैं। पौधों को 17 तत्वों की आवश्यकता होती है जिनके बिना पौधे की वृद्धि-विकास तथा प्रजनन आदि क्रियाएं सम्भव नहीं हैं।
इनमें से मुख्य तत्व कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन , नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और पोटाश है। इनमें से प्रथम तीन तत्व पौधे वायुमंडल से ग्रहण कर लेते हैं।

पोषक तत्वों को पौधों की आवश्यकतानुसार निम्न प्रकार वर्गीकृत किया गया है:-

*.मुख्य पोषक तत्व- नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश।

*.गौण पोषक तत्व- कैल्सियम, मैग्नीशियम एवं गन्धक।

*.सूक्ष्म पोषक तत्व- लोहा, जिंक, कापर, मैग्नीज, मालिब्डेनम, बोरान एवं क्लोरीन।

पौधों मे आवश्यक महत्पूर्ण पोषक तत्वो के कार्य व कमी के लक्षण:-

नत्रजन(N):-
नाइट्रोजन से प्रोटीन बनती है, जो जीव द्रव्य का अभिन्न अंग है। यह पर्ण हरित के निर्माण में भी भागलेती है।नाइट्रोजन का पौधों की वृद्धि एवं विकास में योगदान इस तरह से है:
*.यह पौधों को गहरा हरा रंग प्रदान करता है ।
*.वानस्पतिक वृद्धि को बढ़ावा मिलता है ।
*.अनाज तथा चारे वाली फसलों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है ।
*.यह दानो के बनने में मदद करता है
*.सभी जीवित ऊतकों यानि जड़, तना, पत्ति की वृद्दि और विकास में सहायक है।
*.क्लोरोफिल, प्रोटोप्लाज्मा प्रोटीन और न्यूक्लिक अम्लों का एक महत्वपूर्ण अवयव है।
*.पत्ती वाली सब्जियों की गुणवत्ता में सुधार करता है।

नत्रजन-कमी के लक्षण:-
*.पौधों मे प्रोटीन की कमी होना व हल्के रंग का दिखाई पड़ना । निचली पत्तियाँ पड़ने लगती है, जिसे क्लोरोसिस कहते हैं।
*.पौधे की बढ़वार का रूकना, कल्ले कम बनना, फूलों का कम आना।
*.फल वाले वृक्षों का गिरना। पौधों का बौना दिखाई पड़ना। फसल का जल्दी पक जाना।

फॉस्फोरस(P):-

*.फॉस्फोरस की उपस्थिति में कोशा विभाजन शीघ्र होता है। यह न्यूक्लिक अम्ल, फास्फोलिपिड्स वफाइटीन के निर्माण में सहायक है। प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
*.यह कोशा की झिल्ली, क्लोरोप्लास्ट तथा माइटोकान्ड्रिया का मुख्य अवयव है।
*.फास्फोरस मिलने से पौधों में बीज स्वस्थ पैदाहोता है तथा बीजों का भार बढ़ना, पौधों में रोग व कीटरोधकता बढती है.
*.फास्फोरस के प्रयोग से जड़ें तेजी से विकसित तथा सुद्दढ़ होती हैं । पौधों में खड़े रहने की क्षमता बढ़ती हैं।
*.इससे फल शीघ्र आते हैं, फल जल्दीबनते है व दाने शीघ्र पकते हैं।
*.यह नत्रजन के उपयोग में सहायक है तथा फलीदार पौधों में इसकी उपस्थिति से जड़ों की ग्रंथियों का विकास अच्छा होता है।
*.पौधों के वर्धनशील अग्रभाग, बीज और फलों के विकास हेतु आवश्यक है। पुष्प विकास में सहायकहै।
*.कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक है। जड़ों के विकास में सहायक होता है।
*.न्यूक्लिक अम्लों, प्रोटीन, फास्फोलिपिड और सहविकारों का अवयव है।
*.अमीनों अम्लों का अवयव है।

फॉस्फोरस-कमी के लक्षण:-

*.पौधे छोटे रह जाते हैं, पत्तियों का रंग हल्काबैगनी या भूरा हो जाता है।फास्फोरस गतिशील होने के कारण पहले ये लक्षण पुरानी (निचली) पत्तियों पर दिखते हैं।
*.दाल वाली फसलों में पत्तियां नीले हरे रंग की हो जाती हैं ।
*.पौधो की जड़ों की वृद्धि व विकास बहुत कम होताहै कभी-कभी जड़े सूख भी जाती हैं 
*अधिक कमी में तने का गहरा पीला पड़ना, फल व बीजका निर्माण सही न होना।
*.इसकी कमी से आलू की पत्तियाँ प्याले के आकार की, दलहनी फसलों की पत्तियाँ नीले रंग की तथा चौड़ी पत्ती वाले पौधे में पत्तियों का आकार छोटा रह जाता है।

पोटैशियम(K):-

*.जड़ों को मजबूत बनाता है एवं सूखने से बचाता है। फसल में कीट व रोग प्रतिरोधकता बढ़ाता है। पौधे को गिरने से बचाता है।
*.स्टार्च व शक्कर के संचरण में मदद करता है। पौधों में प्रोटीन के निर्माण में सहायक है।
*.अनाज के दानों में चमक पैदा करता है। फसलो की गुणवत्ता में वृद्धि करता है । आलू व अन्य सब्जियों के स्वाद में वृद्धि करता है । सब्जियों के पकने के गुण को सुधारता है । मृदामें नत्रजन के कुप्रभाव को दूर करता है।
*.एंजाइमों की क्रियाशीलता बढाता है।
*.ठण्डे और बादलयुक्त मौसम में पौधों द्वारा प्रकाश के उपयोग में वृद्धि करता है, जिससे पौधों में ठण्डक और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों को सहन करने की क्षमता बढ़ जाती है।
*.कार्बोहाइड्रेट के स्थानांतरण, प्रोटीन संश्लेषण और इनकी स्थिरता बनाये रखने में मददकरता है।
*.पौधों की रोग प्रतिरोधी क्षमता में वृद्धि होती है।
*.इसके उपयोग से दाने आकार में बड़े हो जाते है और फलों और सब्जियों की गुणवत्ता में वृद्धि होती है।

पोटैशियम-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियाँ भूरी व धब्बेदार हो जाती हैं तथा समय से पहले गिर जाती हैं।
*.पत्तियों के किनारे व सिरे झुलसे दिखाई पड़तेहैं।
*.इसी कमी से मक्का के भुट्टे छोटे, नुकीले तथा किनारोंपर दाने कम पड़ते हैं। आलू में कन्द छोटे तथा जड़ों का विकास कम हो जाता है!
*पौधों में प्रकाश-संश्लेषण की क्रिया कम तथा श्वसन की क्रिया अधिक होती है।

कैल्सियम calcium (Ca):-

*.यह गुणसूत्र का संरचनात्मक अवयव है। दलहनी फसलों में प्रोटीन निर्माण के लिए आवश्यक है।
*.यह तत्व तम्बाकू, आलू व मूँगफली के लिए अधिक लाभकारी है।
*.यह पौधों में कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
*.कोशिका भित्ति का एक प्रमुख अवयव है, जो कि सामान्य कोशिका विभाजन के लिए आवश्यक होता है।
*.कोशिका झिल्ली की स्थिरता बनाये रखने में सहायक होता है।
*.एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
*.पौधों में जैविक अम्लों को उदासीन बनाकर उनकेविषाक्त प्रभाव को समाप्त करता है।
*.-कार्बोहाइट्रेड के स्थानांतरण में मदद करता है !

कैल्सियम-कमी के लक्षण:-

*.नई पत्तियों के किनारों का मुड़ व सिकुड़ जाना। अग्रिम कलिका का सूख जाना।
*.जड़ों का विकास कम तथा जड़ों पर ग्रन्थियों की संख्या में काफी कमी होना।
*.फल व कलियों का अपरिपक्व दशा में मुरझाना।

मैग्नीशियम magnesium (Mg):-*

*.क्रोमोसोम, पोलीराइबोसोम तथा क्लोरोफिल का अनिवार्य अंग है।
*.पौधों के अन्दर कार्बोहाइड्रेट संचालन में सहायक है।
*.पौधों में प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा के निर्माण मे सहायक है।
*.चारे की फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।
*.क्लोरोफिल का प्रमुख तत्व है, जिसके बिना प्रकाश संश्लेषण (भोजन निर्माण) संभव नहीं है।
*.कार्बोहाइट्रेड-उपापचय, न्यूक्लिक अम्लों के संश्लेषण आदि में भाग लेने वाले अनेक एंजाइमों की क्रियाशीलता में वृद्धि करता है।
*.फास्फोरस के अवशोषण और स्थानांतरण में वृद्दि करता है।

मैग्नीशियम-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियाँ आकार में छोटी तथा ऊपर की ओर मुड़ी हुई दिखाई पड़ती हैं।
*.दलहनी फसलों में पत्तियो की मुख्य नसों के बीच की जगह का पीला पड़ना।

गन्धक (सल्फर) sulfur (S):-

*.यह अमीनो अम्ल, प्रोटीन (सिसटीन व मैथिओनिन), वसा, तेल एव विटामिन्स के निर्माण में सहायक है।
*.विटामिन्स (थाइमीन व बायोटिन), ग्लूटेथियान एवं एन्जाइम 3ए22 के निर्माण में भी सहायक है। तिलहनी फसलों में तेल की प्रतिशत मात्रा बढ़ाता है।
*.यह सरसों, प्याज व लहसुन की फसल के लिये आवश्यक है। तम्बाकू की पैदावार 15-30प्रतिशत तक बढ़ती है।
*.प्रोटीन संरचना को स्थिर रखने में सहायता करता है।
*.तेल संश्लेषण और क्लोरोफिल निर्माण में मदद करता है।
*विटामिन के उपापचय क्रिया में योगदान करता है।

गन्धक-कमी के लक्षण:-

*.नई पत्तियों का पीला पड़ना व बाद में सफेद होना तने छोटे एवं पीले पड़ना।
*.मक्का, कपास, तोरिया, टमाटर व रिजका में तनों का लाल हो जाना।
*.ब्रेसिका जाति (सरसों) की पत्तियों का प्यालेनुमा हो जाता हैं।

लोहा (आयरन) iron (Fe):-

*.लोहा साइटोक्रोम्स, फैरीडोक्सीन व हीमोग्लोबिन का मुख्य अवयव है।
*.क्लोरोफिल एवं प्रोटीन निर्माण में सहायक है।
*.यह पौधों की कोशिकाओं में विभिन्न ऑक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं मे उत्प्रेरक का कार्य करता है। श्वसन क्रिया में आक्सीजन का वाहक है।
*.पौधों में क्लोरोफिल के संश्लेषण और रख रखाव के लिए आवश्यक होता है।
*.न्यूक्लिक अम्ल के उपापचय में एक आवश्यक भूमिका निभाता है।
*.अनेक एंजाइमों का आवश्यक अवयव है।

लोहा-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियों के किनारों व नसों का अधिक समय तक हरा बना रहना।
*.नई कलिकाओं की मृत्यु को जाना तथा तनों का छोटा रह जाना।
*.धान में कमी से क्लोरोफिल रहित पौधा होना, पैधे की वृद्धि का रूकना।

जस्ता (जिंक) zinc (Zn):-

*.कैरोटीन व प्रोटीन संश्लेषण में सहायक है!
*.हार्मोन्स के जैविक संश्लेषण में सहायक है।
*.यह एन्जाइम (जैसे-सिस्टीन, लेसीथिनेज, इनोलेज,डाइसल्फाइडेज आदि) की क्रियाशीलता बढ़ाने में सहायक है। क्लोरोफिल निर्माण में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*.पौधों द्वारा फास्फोरस और नाइट्रोजन के उपयोग में सहायक होता है!
*न्यूक्लिक अम्ल और प्रोटीन-संश्लेषण में मदद करता है।
*.हार्मोनों के जैव संश्लेषण में योगदान करता है।
*.अनेक प्रकार के खनिज एंजाइमों का आवश्यक अंग है।

जस्ता-कमी के लक्षण:-

*.पत्तियों का आकार छोटा, मुड़ी हुई, नसों मे निक्रोसिस व नसों के बीच पीली धारियों का दिखाई पड़ना।
*.गेहूँ में ऊपरी 3-4 पत्तियों का पीला पड़ना।
*.फलों का आकार छोटा व बीज कीपैदावार का कम होना।
*.मक्का एवं ज्वार के पौधों में बिलकुल ऊपरी पत्तियाँ सफेद हो जाती हैं।
*.धान में जिंक की कमी से खैरा रोग हो जाता है। लाल, भूरे रंग के धब्बे दिखते हैं।

ताँबा (कॉपर ) copper (Cu):-

*.यह इंडोल एसीटिक अम्ल वृद्धिकारक हार्मोन के संश्लेषण में सहायक है।
*.ऑक्सीकरण-अवकरण क्रिया को नियमितता प्रदान करता है।
*.अनेक एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ाता है। कवक रोगो के नियंत्रण में सहायक है।
*.पौधों में विटामिन ‘ए’ के निर्माण में वृद्दि करता है।
*.अनेक एंजाइमों का घटक है।

ताँबा-कमी के लक्षण:-

*.फलों के अंदर रस का निर्माण कम होना। नीबू जाति के फलों में लाल-भूरे धब्बे अनियमित आकार के दिखाई देते हैं।
*.अधिक कमी के कारण अनाज एवं दाल वाली फसलों मेंरिक्लेमेशन नामक बीमारी होना।

बोरान boron (B):-

*.पौधों में शर्करा के संचालन मे सहायक है। परागण एवं प्रजनन क्रियाओ में सहायक है।
*.दलहनी फसलों की जड़ ग्रन्थियों के विकास में सहायक है।
*.यह पौधों में कैल्शियम एवं पोटैशियम के अनुपात को नियंत्रित करता है।
*.यह डी.एन.ए., आर.एन.ए., ए.टी.पी. पेक्टिन व प्रोटीन के संश्लेषण में सहायक है।
*.प्रोटीन-संश्लेषण के लिये आवश्यक है।
*.कोशिका –विभाजन को प्रभावित करता है।
*.कैल्शियम के अवशोषण और पौधों द्वारा उसके उपयोग को प्रभावित करता है।
*.कोशिका झिल्ली की पारगम्यता बढ़ाता है!

बोरान-कमी के लक्षण:-

*.पौधे की ऊपरी बढ़वार का रूकना, इन्टरनोड की लम्बाई का कम होना।
*.पौधों मे बौनापन होना। जड़ का विकास रूकना।
*.बोरान की कमी से चुकन्दर में हर्टराट, फूल गोभी मे ब्राउनिंग या खोखला तना एवं तम्बाखू में टाप- सिकनेस नामक बीमारी का लगना।

मैंगनीज manganese (Mn):-

*.क्लोरोफिल, कार्बोहाइड्रेट व मैंगनीज नाइट्रेट के स्वागीकरण में सहायक है।
*.पौधों में आॅक्सीकरण-अवकरण क्रियाओं में उत्प्रेरक का कार्य करता है।
*.प्रकाश संश्लेषण में सहायक है।
*.प्रकाश और अन्धेरे की अवस्था में पादप कोशिकाओं में होने वाली क्रियाओं को नियंत्रित करता है।
*.नाइट्रोजन के उपापचय और क्लोरोफिल के संश्लेषण में भाग लेने वाले एंजाइमों की क्रियाशीलता बढ़ा देता है।
*.पौधों में होने वाली अनेक महत्वपूर्ण एंजाइमयुक्त और कोशिकीय प्रतिक्रियओं के संचालन में सहायक है।
*.कार्बोहाइट्रेड के आक्सीकरण के फलस्वरूप कार्बन आक्साइड और जल का निर्माण करता है।

मैंगनीज-कमी के लक्षण:-

*.पौधों की पत्तियों पर मृत उतको के धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
*.अनाज की फसलों में पत्तियाँ भूरे रग की व पारदर्शी होती है तथा बाद मे उसमे ऊतक गलन रोगपैदा होता है।
*.जई में भूरी चित्ती रोग, गन्ने का अगमारी रोग तथा मटर का पैंक चित्ती रोग उत्पन्न होते हैं।

क्लोरीन chloride (Cl):-

*.यह पर्णहरिम के निर्माण में सहायक है। पोधो में रसाकर्षण दाब को बढ़ाता है।
*.पौधों की पंक्तियों में पानी रोकने की क्षमताको बढ़ाता है।

क्लोरीन-कमी के लक्षण:-

*.गमलों में क्लोरीन की कमी से पत्तियों में विल्ट के लक्षण दिखाई पड़ते हैं।
*.कुछ पौधों की पत्तियों में ब्रोन्जिंग तथा नेक्रोसिस रचनायें पाई जाती हैं।
*.पत्ता गोभी के पत्ते मुड़ जाते हैं तथा बरसीम की पत्तियाँ मोटी व छोटी दिखाई पड़ती हैं।

मालिब्डेनम molybdenum (Mo):-

*.यह पौधों में एन्जाइम नाइट्रेट रिडक्टेज एवंनाइट्रोजिनेज का मुख्य भाग है।
*.यह दलहनी फसलों में नत्रजन स्थिरीकरण, नाइट्रेट एसीमिलेशन व कार्बोहाइड्रेट मेटाबालिज्म क्रियाओ में सहायक है।
*.पौधों में विटामिन-सी व शर्करा के संश्लेषण में सहायक है।

मालिब्डेनम-कमी के लक्षण:-

*.सरसों जाति के पौधो व दलहनी फसलों में मालिब्डेनम की कमी के लक्षण जल्दी दिखाई देते हैं!
*.पत्तियों का रंग पीला हरा या पीला हो जाता है तथा इसपर नारंगी रंग का चितकबरापन दिखाई पड़ता है।
*.टमाटर की निचली पत्तियों के किनारे मुड़ जातेहैं तथा बाद में मोल्टिंग व नेक्रोसिस रचनायें बन जाती हैं।
*.इसकी कमी से फूल गोभी में व्हिपटेल एवं मूली मे प्याले की तरह रचनायें बन जाती हैं।
*.नीबू जाति के पौधो में माॅलिब्डेनम की कमी से पत्तियों मे पीला धब्बा रोग लगता हैं।

अंत मे-
हम सभी किसान भाइयों से यही कहना चाहते है की इन सभी तत्वों की कमी तथा लक्षण आपको हमने आपको सविस्तार बता दिया है!इसे आप अपनी सुविधानूसार खेती की व्यक्तिगत डायरी या रजिस्टर मे भी लिख सकते हो!!

धन्यवाद.....

Category: खेतीSource: https://www.facebook.com/AgricultureHelp...

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालयकृषि मेला

14 September, 2017 - 09:29

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार द्वारा कृषि मेला (रबी) का आयोजन 18-19 सितम्बर, 2017 को किया जा रहा है रबी फसलों के उन्नतशील बीजों की बिक्री की जाएगी,मिट्टी पानी की जाँच सामान्य शुल्क पर, कृषि की नई तकनीक को जानने के लिए एचएयू, हिसार पधारे

दो दिवसीय वार्षिक कृषि मेला 18-19 को
मेले मेंलगाई जाएगी विशाल कृषि औद्योगिक प्रदर्शनी

हिसार। हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय का दो दिवसीय वार्षिक कृषि मेला 18-19 को आयोजित किया जाएगा। विश्वविद्यालय के विस्तार शिक्षा निदेशक डॉ. आरएस हुड्डा ने बताया कि मेले का मुख्य विषय सतत कृषि विकास के लिए जैविक खेती होगा जिसमें किसानों को जहरमुक्त खेती के साथ-साथ कृषि पैदावार तथा आमदनी बढ़ाने के बारे में जानकारियां दी जाएंंगी। उन्होंने बताया मेले मेंविशाल कृषि औद्योगिक प्रदर्शनी लगाई जाएगी जिसमें विश्वविद्यालय के विभिन्न विभाग, सरकारी तथा गैर सरकारी एजेंसियां भाग लेंगी और कृषि, पशुपालन व ग्रामीण परिवेश से संबंधित उन्नत व उपयोगी तकनालोजी तथा उत्पाद प्रदर्शित करेंगी। उन्होंनेे बताया कि मेले में किसानों को रबी फसलों व सब्जियों की विभिन्न उन्नत किस्मों के बीज, जैव उर्वरक तथा फलदार पौधों की नर्सरी प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। इसके अतिरिक्त मेले में आए किसानों को विश्वविद्यालय के अनुसंधान फार्म पर वैज्ञानिकों द्वारा उगाई गई खरीफ मौसम की फसलें तथा औषधीय फसलें, फार्म वानिकी, फलों और सब्जियों की अधिक पैदावार लेने के लिए उपयुक्त तकनालोजी के प्रदर्शन दिखाए जाएंगे। उनके अनुसार मेले में मिट्टी, सिंचाई जल व रोगी पौधों की वैज्ञानिक जांच के विशेष प्रबंध किए जाएंगे। उन्होंने बताया उम्दा फसल उत्पादन करने वाले किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए इस अवसर पर एक फसल प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाएगा।
यहां उल्लेखनीय है कि हर साल इस कृषि मेले में हरियाणा तथा पड़ोसी प्रदेशों से हजारों किसान और पशुपालक हिस्सा लेते हंै। उधर, सह-निदेशक (विस्तार), डॉ. कृष्ण यादव ने बताया कि मेले में लगाई जाने वाली एग्रो-इंडस्ट्रियल प्रदर्शनी में भाग लेने को लेकर प्राइवेट कंपनियों में भारी उत्साह बना हुआ है। इन कंपनियों को पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर स्टॉल आवंटित किये जा रहे हैं।

Category: सरकारी समाचार

ड्रेगन फ्रूट से होने वाले स्वास्थ्य लाभ

13 September, 2017 - 22:07

आम तौर पर ड्रेगन फ्रूट थाइलैंड, वियतनाम, इज़रायल और श्रीलंका में लोकप्रिय है। बाजार में 200 रु से 250 रु तक दाम मिलने की वजह से हाल के दिनों में भारत में भी इसकी खेती का प्रचलन बढ़ा है। कम वर्षा वाले क्षेत्र इसकी खेती के लिए उपयुक्त माने जाते हैं। ड्रेगन फ्रूट के पौधे का उपयोग सजावटी पौधे के साथ साथ ड्रेगन फ्रूट उपजाने के लिए होता है। ड्रेगन फ्रूट को ताजे फल के तौर पर खा सकते हैं साथ ही इस फल से जैम, आइस क्रीम, जैली, जूस और वाइन भी बना सकते हैं। सौंदर्य प्रसाधन के तौर पर भी इसे फेस पैक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

यही नहीं ड्रेगन फ्रूट व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक है। यही वजह है कि इसकी लोकप्रियता ज्यादा है।

ड्रेगन फ्रूट से होने वाले स्वास्थ्य लाभ –

ड्रेगन फ्रूट से मधुमेह को नियंत्रित करने में मदद मिली है
कोलेस्ट्रॉल को कम करने में सहायक है
इस फ्रूट में वसा और प्रोटीन अधिक मात्रा में पाए जाते हैं
इसे एंटीआक्सीडेंट का उत्तम स्त्रोत माना जाता है
अर्थेराइटिस की बीमारी से बचाता है
हृदय रोगियों के लिए उत्तम आहार
वजन नियंत्रित करने में सहायक
बुढ़ापे का असर कम करता है
अस्थमा से लड़ने में मदद करता है
विटामीन & खनीज का उत्तम स्त्रोत
ड्रेगेन फ्रूट के प्रकार : तीन प्रकार के ड्रेगन फ्रूट होते हैं।

सफेद रंग के गुदे वाला लाल रंग का फल
लाल रंग के गुदे वाला लाल रंग का फल
सफेद रेग के गुदे वाला पीले रंग का फल

ड्रेगन फ्रूट की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु :

इसके पौधे कम उपजाऊ मिट्टी और तापमान में होने वाले लगातार परिवर्तनों के बीच भी जीवित रह सकते हैं। इसके लिए 50 सेमी वार्षिक औसत की दर से बारिश की जरूरत होती है जबकि 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। बहुत ज्यादा सूर्य प्रकाश को इसकी खेती के लिए अच्छा नहीं माना जाता है। सूरज की रौशनी जिन इलाके में ज्यादा हो उन इलाकों में बेहतर उपज के लिए छायादार जगह में इसकी खेती की जा सकती है।

उपयुक्त मिट्टी :

इस फल को रेतिली दोमट मिट्टी से लेकर दोमट मिट्टी तक नाना प्रकार के मिट्टियों में उपजाया जा सकता है। हालांकि बेहतर जिवाश्म और जल निकासी वाली बलुवाई मिट्टी इसकी उपज के लिए सबसे बेहतर है। ड्रेगन फ्रूट की खेती के लिए मिट्टी का पीएच मान 5.5 से 7 तक उपयुक्त माना जाता है।

ड्रेगन फ्रूट के लिए खेत की तैयारी :

खेत की अच्छी तरह से जुताई की जानी चाहिए ताकि मिट्टी में मौजुद सारे खर पतवार खत्म हो जाएं। जुताई के बाद कोई भी जैविक कंपोस्ट अनुपातनुसार मिट्टी में दिया जाना चाहिए।

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में बुआई या पौधों को लगाने की विधि :

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में बुआई का सबसे सामान्य तरीका है काट कर लगाना। हालांकि बीज के जरिए भी इसकी बुआई की जा सकती है लेकिन चुंकि बीज पनपने में लंबा वक्त लगता है और मूल पेड़ के गुण उस पौधे में आए इसकी संभावना भी कम रहती है इसलिए इसे इसकी वाणिज्यिक खेती के अनुकूल नहीं माना जाता है। आपको गुणवत्ता पूर्ण पौधे की छंटाई से ही ड्रेगेन फ्रूट के सैंपल तैयार करने चाहिए। तकरीबन 20 सेमी लंबे सैंपल को खेत में लगाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। इनको लगाने से पहले मूल पेड की छंटाई करके इनका ढेर बना लेना चाहिए। फिर इन पौधों को सुखे गोबर के साथ मिला कर मिट्टी बालू और गोबर के 1:1:2 के अनुपात में मिलाकर रोप देना चाहिए। ये जरूर ध्यान रखा जाना चाहिए कि इन्हें रोपने से पहले इन्हें छाया में रखा जाए ताकि सूरज की तेज रोशनी ने इन सैपलिंग को नुकसान न पहुंचे। दो पौधों के रोपने की जगह में कम से कम 2 मीटर की खाली जगह छोड़ देनी चाहिए। पौधे को रोपने के लिए 60 सेमी गहरा, 60 सेमी चौड़ा गड्डा खोदा जाए। इन गड्डों में पौधों की रोपाई के बाद मिट्टी डालने के साथ साथ कंपोस्ट और 100 ग्राम सुपर फास्फेट भी डालना चाहिए। इस तरह से एक एकड़ खेत में ज्यादा से ज्यादा 1700 ड्रेगन फ्रूट के पौधे लगाए जाने चाहिए। इन पौधों को तेजी से बढ़ने में मदद करने के लिए इनके सपोर्ट के लिए लकडी का तख्त या कंक्रीट लगाया जा सकता है।

ड्रेगेन फ्रूट की खेती में खाद एवं उर्वरक का इस्तेमाल :

ड्रेगेन फ्रूट के पौधों की वृद्धि के लिए जिवाश्म तत्व प्रमुख भूमिका निभाते हैं। प्रत्येक पौधे के सटिक वृद्धि के लिए 10 से 15 किलो जैविक कंपोस्ट/जैविक उर्वरक दिया जाना चाहिए। इसके बाद प्रत्येक साल दो किलो जैविक खाद की मात्रा बढ़ाई जानी चाहिए। इस फसल को समुचित विकास के लिए रासायनिक खाद की भी जरूरत पड़ती है। वानस्पतिक अवस्था में इसको लगने वाली रासायनिक खाद का अनुपात पोटाश:सुपर फास्फेट:यूरिया = 40:90:70 ग्राम प्रति पौधे होता है। जब पौधों में फल लगने का समय हो जाए तब कम मात्रा में नाइट्रोजन और अधिक मात्रा में पोटाश दिया जाना चाहिए ताकि उपज बेहतर हो। फूल आने से लेकर फल आने तक यानि की फुल आने के ठीक पहले (अप्रेल), फल आने के समय( जुलाई – अगस्त) और फल को तोड़ने के दौरान ( दिसंबर) तक में इस अनुपात में रासायनिक खाद दिया जाना चाहिए : यूरिया:सुपर फास्फेट:पोटाश =50ग्राम:50 ग्राम:100 ग्राम प्रति पौधे। रासायनिक खाद प्रत्येक साल 220 ग्राम बढ़ाया जाना चाहिए जिसे बढ़ाकर 1.5 किलो तक किया जा सकता है।

ड्रेगेन फ्रूट के खेती की खासियत ये है कि इसके पौधों में अब तक किसी तरह के कीट लगने या पौधों में किसी तरह की बीमारी होने का मामला सामने नहीं आया है। ड्रेगेन फ्रूट के पौधे एक साल में ही फल देने लगते हैं। पौधों में मई से जून के महीने में फूल लगते हैं और अगस्त से दिसंबर तक फल आते हैं।

फूल आने के एक महीने के बाद ड्रेगेन फ्रूट को तोड़ा जा सकता है। पौधों में दिसंबर महीने तक फल आते हैं। इस अवधि में एक पेड़ से कम से कम छह बार फल तोड़ा जा सकता है। फल तोड़ने लायक हुए हैं या नहीं इसको फलों के रंग से आसानी से समझा जा सकता है। कच्चे फलों का रंग गहरे हरे रंग का होता जबकि पकने पर इसका रंग लाल हो जाता है। रंग बदलने के तीन से चार दिन के अंदर फलों को तोड़ना उपयुक्त होता है लेकिन अगर फलों का निर्यात किया जाना हो तो रंग बदलने के एक दिन के भीतर ही इसे तोड़ लिया जाना चाहिए। इस तरह से प्रति एकड़ पांच से छह टन ड्रेगन फ्रूट का उत्पादन लिया जा सकता है।

कुल मिलाकर ड्रेगेन फ्रूट के पौष्टिक गुणों को देखते हुए स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार में इसकी भारी मांग है। इसलिए ड्रेगेन फ्रूट की खेती व्यवसायिक तौर पर बड़ी लाभप्रद मानी जाती है।

 

 

साभार https://www.facebook.com/AgricultureHelplineHaryana/posts/1791452150884245

Category: खेतीGallery:  Sep 13 2017 0 ड्रेगन फ्रूट By villagedevelopment Gallery image: 

ड्रेगन फ्रूट

13 September, 2017 - 22:03
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